भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 396

(३८२)

कवीरपंथी-

यासे कौन उपाई । होरी अनो० ॥ प्रकृति पुरुष विवेक निपुन, मृग नयनी नयन नचाई । बोली पकरि लेहूँ मैं याको, पै पकरन नहिं पाई ॥ सिथिलता तनपर छाई । होरी अनो० ॥ ठानि यक अद्वैतवाद कहि, फगुवा लेहो चुकाई । साहिब कवीर कृपाल दया- निधि, जड चेतन समुझाई ॥ दियो पारख परखाई । होरी अनो० ॥ ८ ॥

इति शब्दावली तीसरे खण्डका तीसरा विभाग ॥

सत्यनाथ ।

शब्दावली तीसरे खण्डका चौथा भाग

“चौका आरती माहात्म्य” की प्रारम्भिक विज्ञप्ति ॥

कवीरपंथमें चौका आरती एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें धर्मके सर्व अंगोंका समावेश हो जाता है । यद्यपि वर्तमानकालमें, प्रायः रोजगारी कडिहारोंने इसे, अपने रोजगारका एक साधन बना रक्खा है, तथापि इसके भेदके सम्बन्धने वालोंका अभी तक अभाव नहीं हुआ है, किन्तु अधिकारीकी कमीसे उन्हें इसके भेदको प्रकट करनेका अवसरही नहीं मिलता । और इसके भेदके न जाननेवाले अज्ञानता वश, प्रायः इसकी निन्दा उठाया करते हैं । और रोजगारी कडिहारोंकी कृपासे सेवक सतियोंकी भी बुद्धि ऐसी कुंठित हो रही है कि, उन्हें इसके भेदको जाननेकी जिज्ञासाही नहीं उठती । क्योंकि, जिनमें उनकी श्रद्धा है वे या तो