भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

शब्दावली

(३८१)

मायावश बँध्यो आपही, शुक् मरकटका नाई ॥ अमृत चौरासी जाई। ये तो सुरझ० ॥ तीरथ व्रत आचार विविध विधि, जपतप आदि उपाई। ज्यों २ करत यत्न छूटनको, त्यों २ होय हटैताई ॥ परत फन्दू अधिकॉई ॥ ये तो सुर० ॥ यद्यपि मूषा तदपि छूटत नहिं, मोहैजनि तम पाई। देखि न परत ज्ञान दीपक विन, छूटि सकै किमि भाई ॥ अनिरवैचनी प्रभुताई। ये तो सुरझ० ॥ सतगुरु कृपा ग्रन्थि छूटनकी, युक्ति कवीर बताई। आत्मम अनु- भवैके प्रकाश करि, सहज मुक्ति होय जाई ॥ मिटत संभ्रम ससुंदाई ॥

होरी अनोखी ये भाई। सुनो साधो चित लाई ॥ टे० ॥ उतँसे अखिल वेद श्रुति बनिता, बहु प्रकारकी आई। कोइ भोरी कोइ बाल किशोरी, कोई जहरकी बुझाई ॥ भरी सब गुण चतुराई। होरी अनोखी ॥ इतँसे गुरु मुख शब्द यथार्थ, परखरूप सुखदाई। सरैल मनोहर शान्त मोहप्रद, झील सहित तहँ जाई ॥ पररूप फाग मचाई। होरी अनो० ॥ कर्मविधोंयक नवप्रेमदा यक, ले गुलाल कर धाई। ताकी पकरि बाँह सब चुनरि, निज रंग माँहि भिजाई ॥ तबै रहगई खिसियाँई। होरी अनो० ॥ दूजी अवसर जानि ठानि निज, मनमें अति हटताई। आगू चली अबीर उड़ावन, रपटि गिरी अकुलाई ॥ मानो कोई मूँठ चलाई ॥ होरी अनो० ॥ तीजी ईश मनाय विविध विधि, ले पिचकारी धाई। नहिं वश चलयो फिरी पाछे पुनि, देखि रही सकुँचाई। हाथ मीजत पछिताई। होरी अनो० ॥ योगयुक्ति आँगर चौथी पुनि, अनहत ढोल बजाई। गावत ऐसो अनोखो खिलारी, देख्यो सुन्यो नहीं माई ॥ करों

१ तोतां. २ कठिना. ३ विशेष. ४ मिथ्या. ५ अज्ञानजन्य अंधकार. ६ सत असतसे विलक्षण. ७ साक्षात्. ८ भय. ९ समूह. १० उघरते. ११ तरुण. १२ इधरते. १३ सोधा १४ विधानकर्ता. १५ नवीन स्त्री. १६ लज्जित हो १७ मंत्रमारा. १८ ईश्वरका स्मरण कर. १९ सकुचित हो २० कुशल.

कबीरपंथी शब्दावली · पृष्ठ 395, कुल 968 में से · BharatKosha