भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 394

(३८०)

कवीरपंथो—

मैंने देखो० ॥ न्याय मीमाँसा सारुय पतञ्जल, वैशेषिकहू विचारी। प्रक्रिया सहित वेदान्त व्यासकृत, षट दर्शन निधारौ ॥ परख वाकी सबसे है न्यारी ॥ मैंने देखो० ॥ शिव सनकादि और ब्रह्मादिक, गौतम शुक् ब्रह्मचारी। गोरखदत्त वशिष्ठ श्रेष्ठ जग, ये महान आचारी ॥ बुद्धि इन सबकी हारी। मैंने देखो० ॥ निज पदके रंग बोरि दियो मोहि, आंति भेद सब टारी। तापर ज्ञान गुलाल सुरङ्गी, मारि कुम्कुमन डारी ॥ भरमकी अँगिया फारी ॥ मैंने देखो० ॥ धर्मिनि गुरुके चरण कमलपर, तन मन धन सब वारी। बजन लगी तिहुँ लोक बधार्ई, मँगन लगी फगुवारी ॥ भक्ति मोहि दीजे तुम्हारी। मैंने देखो० ॥ १५ ॥

आज निज घटबिच फाग मचैहों। तजि मोह मान करूणा निधानके, ध्यान चरणमें लगैहों ॥ टे० ॥ यक स्वर साधि तँबूरा तनको, स्वासके तार मिलैहों। मोद मृदंग मँजीरा मनसा, विनयको बीन बजैहों ॥ भजन सत नामको गैहों ॥ आज निज० ॥ भक्ति उमंग रंग केसरको लै प्रभुपै ढरकैहों। प्रेम सनेह गुलाल अरगजा, उन्हींके शीश चढैहों ॥ सुरतिकी सुरति बनेहों ॥ आज निज० ॥ सार विचार शृंगार साजि मति, सन्मुख आनि नचैहों। विविध प्रकार रिझाय नाथको, फगुवा लै करि रहें ॥ अखंड मुख पाय अघैहों ॥ आज निज० ॥ कीच उलीच नीच कर्मनको, निरगुनपर वपैहों। पातिक जाति राख करि कारिखँ, विमुखके मुखपै लगैहों ॥ तबै धर्मदास कहैहों ॥ आज निज घट बिच फाग मचैहों ॥ १६ ॥

जड़ चेतनकी उरझी गॉठ, ये तो सुरझत नहि सुरझाई ॥ टे० ॥ अमल अचल अव्यय अविनाशी, जेहि श्रुति गुण बहु गाई। सो

१ व्यवस्था. २ भिन्न. जुदी. ३ सुन्दर रङ्गकी ४ बुद्धि. ५ प्रसन्नकरि. ६ काजल.