भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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बनाऊँ । अनहत नाद झांझ डफ वीना ढोल मृदंग बजाऊँ । लोभको नाच नचाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ त्रिविधि कर्मकी धूरि उड़ाऊँ रथ दिनेश ठहराऊँ ॥ जलप्रवाह स्थिर करि सरितनको, विधिको वेद भुलाऊँ ॥ ध्यान शंकरको डिगाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ तन अरपों मन वारों चरणपर, सब धन धाम लुटाऊँ। साहिब कवीरसे फगुवा मै लेऊँ तो धर्मदास कहाऊँ ॥ मुक्तिको पन्थ चलाऊँ सतगुरु० ॥ १३ ॥

मैं तो जात हती निज बाँटे २, मोहि सतगुरु होरी खेलाई ॥ टे० ॥ कृपाकी केसर घोरि बोरि तन, चूनरि रंगमें भिगाई । शब्द कुम्कुमा मारि हजारन, ज्ञान गुलाल उड़ाई ॥ जाय नभ ऊपर छाई । मोहि सतगुरु० ॥ आय विवेक अबीर पन्यो, मेरे नयनन अति सुखदाई । विविध प्रकार उपाय कियो, नहि निकस्यो रह्यो समाई ॥ कछू मोसे बन नहि आई ॥ मोहि सतगुरु० ॥ त्यागि दियो धन धाम काम सब, बास एकान्त सोहाई । मिल्यो अचानक आय प्राणपति, कर गहि कण्ठ लगाई ॥ भूल गई सब चतुराई । मोहि सतगुरु० ॥ सगरो शृंगार बिगार दियो मेरो, भरमकी गाँठ छुड़ाई । लाजकी बात न जात कही कछु, निज उपदेश हटाई ॥ दियो एक मन्त्र सुनाई । मोहि सतगुरु० ॥ अँस्ति भाँति प्रिय रूप है तोरो, सब तेरो प्रभुताई । गाय कवीर अबीर उड़ायो, धर्मनि अति सुख पाई ॥ बजी तिहुँ लोक बधाई ॥ मोहि सतगुरु० ॥ १४ ॥

आज मैंने देखो अँनोखो खिलारी । मोसे करि झकंझोरी होरी खेले वरजोरी, मोरी सर्गरो भिजोय दीनी सारी ॥ टे० ॥ लोक वेद मग जात अचानक, रोकत गैल हमारी । कर गहि कँगन मोहके तोरत, अरु मारत पिचकारी ॥ देत गुरुगंमकी गारी ।

१ रज. २ भाग ३ सत. ४ चित. ५ आनन्द. ६ अद्भुत. ७ छाना सपटी. ८ संपूर्ण. ९ गुक्का ज्ञान.