कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(३७९)
बनाऊँ । अनहत नाद झांझ डफ वीना ढोल मृदंग बजाऊँ । लोभको नाच नचाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ त्रिविधि कर्मकी धूरि उड़ाऊँ रथ दिनेश ठहराऊँ ॥ जलप्रवाह स्थिर करि सरितनको, विधिको वेद भुलाऊँ ॥ ध्यान शंकरको डिगाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ तन अरपों मन वारों चरणपर, सब धन धाम लुटाऊँ। साहिब कवीरसे फगुवा मै लेऊँ तो धर्मदास कहाऊँ ॥ मुक्तिको पन्थ चलाऊँ सतगुरु० ॥ १३ ॥
मैं तो जात हती निज बाँटे २, मोहि सतगुरु होरी खेलाई ॥ टे० ॥ कृपाकी केसर घोरि बोरि तन, चूनरि रंगमें भिगाई । शब्द कुम्कुमा मारि हजारन, ज्ञान गुलाल उड़ाई ॥ जाय नभ ऊपर छाई । मोहि सतगुरु० ॥ आय विवेक अबीर पन्यो, मेरे नयनन अति सुखदाई । विविध प्रकार उपाय कियो, नहि निकस्यो रह्यो समाई ॥ कछू मोसे बन नहि आई ॥ मोहि सतगुरु० ॥ त्यागि दियो धन धाम काम सब, बास एकान्त सोहाई । मिल्यो अचानक आय प्राणपति, कर गहि कण्ठ लगाई ॥ भूल गई सब चतुराई । मोहि सतगुरु० ॥ सगरो शृंगार बिगार दियो मेरो, भरमकी गाँठ छुड़ाई । लाजकी बात न जात कही कछु, निज उपदेश हटाई ॥ दियो एक मन्त्र सुनाई । मोहि सतगुरु० ॥ अँस्ति भाँति प्रिय रूप है तोरो, सब तेरो प्रभुताई । गाय कवीर अबीर उड़ायो, धर्मनि अति सुख पाई ॥ बजी तिहुँ लोक बधाई ॥ मोहि सतगुरु० ॥ १४ ॥
आज मैंने देखो अँनोखो खिलारी । मोसे करि झकंझोरी होरी खेले वरजोरी, मोरी सर्गरो भिजोय दीनी सारी ॥ टे० ॥ लोक वेद मग जात अचानक, रोकत गैल हमारी । कर गहि कँगन मोहके तोरत, अरु मारत पिचकारी ॥ देत गुरुगंमकी गारी ।
१ रज. २ भाग ३ सत. ४ चित. ५ आनन्द. ६ अद्भुत. ७ छाना सपटी. ८ संपूर्ण. ९ गुक्का ज्ञान.
(३८०)
कवीरपंथो—
मैंने देखो० ॥ न्याय मीमाँसा सारुय पतञ्जल, वैशेषिकहू विचारी। प्रक्रिया सहित वेदान्त व्यासकृत, षट दर्शन निधारौ ॥ परख वाकी सबसे है न्यारी ॥ मैंने देखो० ॥ शिव सनकादि और ब्रह्मादिक, गौतम शुक् ब्रह्मचारी। गोरखदत्त वशिष्ठ श्रेष्ठ जग, ये महान आचारी ॥ बुद्धि इन सबकी हारी। मैंने देखो० ॥ निज पदके रंग बोरि दियो मोहि, आंति भेद सब टारी। तापर ज्ञान गुलाल सुरङ्गी, मारि कुम्कुमन डारी ॥ भरमकी अँगिया फारी ॥ मैंने देखो० ॥ धर्मिनि गुरुके चरण कमलपर, तन मन धन सब वारी। बजन लगी तिहुँ लोक बधार्ई, मँगन लगी फगुवारी ॥ भक्ति मोहि दीजे तुम्हारी। मैंने देखो० ॥ १५ ॥
आज निज घटबिच फाग मचैहों। तजि मोह मान करूणा निधानके, ध्यान चरणमें लगैहों ॥ टे० ॥ यक स्वर साधि तँबूरा तनको, स्वासके तार मिलैहों। मोद मृदंग मँजीरा मनसा, विनयको बीन बजैहों ॥ भजन सत नामको गैहों ॥ आज निज० ॥ भक्ति उमंग रंग केसरको लै प्रभुपै ढरकैहों। प्रेम सनेह गुलाल अरगजा, उन्हींके शीश चढैहों ॥ सुरतिकी सुरति बनेहों ॥ आज निज० ॥ सार विचार शृंगार साजि मति, सन्मुख आनि नचैहों। विविध प्रकार रिझाय नाथको, फगुवा लै करि रहें ॥ अखंड मुख पाय अघैहों ॥ आज निज० ॥ कीच उलीच नीच कर्मनको, निरगुनपर वपैहों। पातिक जाति राख करि कारिखँ, विमुखके मुखपै लगैहों ॥ तबै धर्मदास कहैहों ॥ आज निज घट बिच फाग मचैहों ॥ १६ ॥
जड़ चेतनकी उरझी गॉठ, ये तो सुरझत नहि सुरझाई ॥ टे० ॥ अमल अचल अव्यय अविनाशी, जेहि श्रुति गुण बहु गाई। सो
१ व्यवस्था. २ भिन्न. जुदी. ३ सुन्दर रङ्गकी ४ बुद्धि. ५ प्रसन्नकरि. ६ काजल.
शब्दावली
(३८१)
मायावश बँध्यो आपही, शुक् मरकटका नाई ॥ अमृत चौरासी जाई। ये तो सुरझ० ॥ तीरथ व्रत आचार विविध विधि, जपतप आदि उपाई। ज्यों २ करत यत्न छूटनको, त्यों २ होय हटैताई ॥ परत फन्दू अधिकॉई ॥ ये तो सुर० ॥ यद्यपि मूषा तदपि छूटत नहिं, मोहैजनि तम पाई। देखि न परत ज्ञान दीपक विन, छूटि सकै किमि भाई ॥ अनिरवैचनी प्रभुताई। ये तो सुरझ० ॥ सतगुरु कृपा ग्रन्थि छूटनकी, युक्ति कवीर बताई। आत्मम अनु- भवैके प्रकाश करि, सहज मुक्ति होय जाई ॥ मिटत संभ्रम ससुंदाई ॥
होरी अनोखी ये भाई। सुनो साधो चित लाई ॥ टे० ॥ उतँसे अखिल वेद श्रुति बनिता, बहु प्रकारकी आई। कोइ भोरी कोइ बाल किशोरी, कोई जहरकी बुझाई ॥ भरी सब गुण चतुराई। होरी अनोखी ॥ इतँसे गुरु मुख शब्द यथार्थ, परखरूप सुखदाई। सरैल मनोहर शान्त मोहप्रद, झील सहित तहँ जाई ॥ पररूप फाग मचाई। होरी अनो० ॥ कर्मविधोंयक नवप्रेमदा यक, ले गुलाल कर धाई। ताकी पकरि बाँह सब चुनरि, निज रंग माँहि भिजाई ॥ तबै रहगई खिसियाँई। होरी अनो० ॥ दूजी अवसर जानि ठानि निज, मनमें अति हटताई। आगू चली अबीर उड़ावन, रपटि गिरी अकुलाई ॥ मानो कोई मूँठ चलाई ॥ होरी अनो० ॥ तीजी ईश मनाय विविध विधि, ले पिचकारी धाई। नहिं वश चलयो फिरी पाछे पुनि, देखि रही सकुँचाई। हाथ मीजत पछिताई। होरी अनो० ॥ योगयुक्ति आँगर चौथी पुनि, अनहत ढोल बजाई। गावत ऐसो अनोखो खिलारी, देख्यो सुन्यो नहीं माई ॥ करों
१ तोतां. २ कठिना. ३ विशेष. ४ मिथ्या. ५ अज्ञानजन्य अंधकार. ६ सत असतसे विलक्षण. ७ साक्षात्. ८ भय. ९ समूह. १० उघरते. ११ तरुण. १२ इधरते. १३ सोधा १४ विधानकर्ता. १५ नवीन स्त्री. १६ लज्जित हो १७ मंत्रमारा. १८ ईश्वरका स्मरण कर. १९ सकुचित हो २० कुशल.
(३८२)
कवीरपंथी-
यासे कौन उपाई । होरी अनो० ॥ प्रकृति पुरुष विवेक निपुन, मृग नयनी नयन नचाई । बोली पकरि लेहूँ मैं याको, पै पकरन नहिं पाई ॥ सिथिलता तनपर छाई । होरी अनो० ॥ ठानि यक अद्वैतवाद कहि, फगुवा लेहो चुकाई । साहिब कवीर कृपाल दया- निधि, जड चेतन समुझाई ॥ दियो पारख परखाई । होरी अनो० ॥ ८ ॥
इति शब्दावली तीसरे खण्डका तीसरा विभाग ॥
सत्यनाथ ।
शब्दावली तीसरे खण्डका चौथा भाग
“चौका आरती माहात्म्य” की प्रारम्भिक विज्ञप्ति ॥
कवीरपंथमें चौका आरती एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें धर्मके सर्व अंगोंका समावेश हो जाता है । यद्यपि वर्तमानकालमें, प्रायः रोजगारी कडिहारोंने इसे, अपने रोजगारका एक साधन बना रक्खा है, तथापि इसके भेदके सम्बन्धने वालोंका अभी तक अभाव नहीं हुआ है, किन्तु अधिकारीकी कमीसे उन्हें इसके भेदको प्रकट करनेका अवसरही नहीं मिलता । और इसके भेदके न जाननेवाले अज्ञानता वश, प्रायः इसकी निन्दा उठाया करते हैं । और रोजगारी कडिहारोंकी कृपासे सेवक सतियोंकी भी बुद्धि ऐसी कुंठित हो रही है कि, उन्हें इसके भेदको जाननेकी जिज्ञासाही नहीं उठती । क्योंकि, जिनमें उनकी श्रद्धा है वे या तो
शब्दावली
(३८३)
व्यापारी हैं अथवा सीधे साधे संत। व्यापारी, पहले तो आपही इसके महान आशयको नहीं समझते और जो कोई थोड़ा बहुत ग्रन्थ पोथियोंसे समझता भी है, तो वह अपने रोजगारमें विघ्न पड़नेके डरसे सबक सतियोंको बतलाना नहीं चाहता और जो सीधे हैं वे कुल्हेडीकी रस्ती घसीटते चले जा रहे हैं, उनको जब स्वतःही खबर नहीं है, तब दूसरोंको क्या बतलायेंगे। और मेरे जैसे लोग जो खुल्लमखुल्ला भेद बतानेको तय्यार हैं। अधिकारी जित्तासुओंके अभावसे इस साखीका स्मरण कर करके निराशा अनुभव करते हैं—
परबत परबत मैं फिरा, नैन गवाँया रोय । सो बूटी पाऊँ नहीं, जोरे सजीवन होय ॥
तथापि यदि संत गुरुकी दयादृष्टि हुई तो सुझ अर्कचनसे जितना करते बन रहा है सेवा करता जा रहा हूँ और जो बनेगा करता जाऊँगा, इसका उपक्रम आरम्भ हो चुका है और कबीरधर्मदर्शन ग्रन्थमाला निकालना आरम्भ हो गया है। प्रथम भाग माहात्म्य दर्शन छप चुका है।
श्रीवैकटेश्वर प्रेसके मालिक रायबहादुर सेठ रङ्गनाथजी तथा लघुभ्राता परमसज्जन बुद्धिमान् धर्मपरायण श्री बाबू श्रीनिवासजीका कबीर मात्रको कृतज्ञ होकर, पंथी सदगुरुसे प्रार्थना करना चाहिये कि, वे धन जन और धर्मसे पूर्ण रहकर सत्यमार्गकी उन्नतिमें सहायता देते रहें ॥
सम्बत् १९५८ वि. से ही साकेतवासी सेठ खेमराजजीने मेरे दिये हुए ग्रन्थोंका, प्रकाशन करके सत्यधर्मका कितना उपकार किया है, वह किसीसे छिपा नहीं है।
इसका विषय विशेष प्रस्तावनामें लिखना है, इस लिये यहाँही समाप्त करता हूँ।
श्रीवैकटेश्वरप्रेस, बम्बई ता. ७-८-३१
भवदीय—
आप सबोंका पूर्व परिचित रसीपुर शिवहर वाले-स्वामी - श्रीयुगलानन्दविहारी. (कबीरआश्रम पो०, खरसिया.) (जि० बिलासपुर (सी० पी०)
सत्यनाम ।
अथ चौका आरती माहात्म्य प्रारम्भः ।
सत्यनाम स्वकृत विभू, अदली आदि अचिन्त । अजर पुरुष सुनीन्द्र प्रभू, मायापार अनन्त ॥ १ ॥ करुणामय कवीर कही, ज्ञानी पुरुष सुजान । योगजीत सतगुरु सही, मेटे काल गुमान ॥ २ ॥ सुरति शब्दको योग जो, परगट कीन जहान । योग सैंतायन नामते, कहते ताहि सुजान ॥ ३ ॥ जाकर शिष धर्मदासजू, पूरण सुकृत रूप । पायी दया कवीरकी, भये सो आप अनूप ॥ ४ ॥ सत सुकृत प्रतापते, भये जगत आदर्श । नाम देह भव काटई, मिटे काल उत्कर्श ॥ ५ ॥ कह कवीर धर्मदाससे, बचन मोर समरथ्य । ताहि गहे सो वंश है, चढे मुक्ति के रथ्य ॥ ६ ॥ वंश व्यालिस जगतमें, माने बचन हमार । आप तरे जग तारई, देवे शब्द अहार ॥ ७ ॥ शब्द अहार जो छाडई, अखज काल ढिंग जाय । गुरु सीढि ते ऊतरे, काल निरञ्जन खाय ॥ ८ ॥ दुखित जीव जग जानिके, प्रगट भये गुरु देव । चौका विधि प्रगट करी, तत्त्व लखाये भेव ॥ ९ ॥ सत्यलोकको याँन है, आत्म ज्ञानको मूल । काल जालते काढिके, हरे सकल भव झूल ॥ १० ॥ ता महिमा निज मुख कही, सत्य गुरु सत्य कवीर । पूछी सो धर्मदासने, जीव लगावन तीर ॥ ११ ॥
इति मंगला चरण ।
अथ चौका आरती-
माहात्म्य (अनुरागसागरसे) धर्मदास बचन ॥
धर्मदाम पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन सुभागा ॥ हे प्रभु नहीं रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण बरनि न जाई ॥ १ ॥ महिमा अमित अहै तुव स्वामी । केहि विधि बरनों अन्तर्यामी ॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहि
१ विमान.
शब्दावली
(३८५)
तुम लीन उबारी ॥ २ ॥ अब चौका भेद कहो सुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुख धामी ॥ जो तुम कहौ करौ मैं सोई । तामहँ फेर न परिहैं कोई ॥ ३ ॥
कबीर वचन ।
गेही भक्ति आरति आने । प्रति पाख आरती ठाने ॥ प्रति पाख आरति नहीं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥ ४ ॥ पाख दिवस नहीं होवे साजू । प्रति पूनोकर आरति काजू ॥ पूनो पान लेइ धर्मदासा । पावे सिष होय सुख बासा ॥ ५ ॥ चन्द्र कला बोडस पुर आवे । ताहि समय परवाना पावे ॥ यथाशक्ति सेवा सहिदाना । हंसा पहुँचे लोक ठिकाना ॥ ६ ॥
धर्मदास वचन ।
धर्मनि विनय करी कर जोरी । होइ प्रभु अब दयाल बहोरी ॥ आरति चौका किहि विधि होई । काकासाज लगे प्रभु सोई ॥ ७ ॥
कबीर वचन ।
आरति साज धर्मनि सुनो, तुमसे कहौ बखान ।
विधि विधान ते जो करे, पावे सुक्ति ठिकान ॥ १ ॥
धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भाग चले जमराजा ॥ सात हाथको वस्तर लाओ । स्वंत चँदेवा वस्त्र तनाओ ॥ १ ॥ घर आँगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ । तापर आँटाको चौक पुराओ । सवा सेर तन्दुल लै आओ ॥ २ ॥ स्वेत सिंधासन तहां विछायी । नाना सुगन्ध धरू तहँ लायी ॥ स्वेतै मिठाई स्वेतै पाना । पूंगी फल स्वेतहिं परमाना ॥ ३ ॥ लौंग इलायची कपूर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥ जिब पीछे नरियर लै आओ । यह सब साज सु आनि धराओ ॥ ४ ॥ संत साधु को बैठक दीजौ । यथा शक्ति सन्मान सु कीजौ ॥ करि
कबीरपंथी- शब्दावली १३
(३८६)
कवीरपंथी—
आरति सतगुरु लौ लाओ । भावभक्ति बहु प्रीति बढाओ ॥६॥ चरण धोइ चरणामृत लीजो । शरधा सहित सुपूजन कीजो ॥ विनु शरधा नहिं आरति कीजे । अनशरधा तहैं काल भनीजे ॥ ६ ॥ अनशरधा अगुवानी जहैंवाँ । काल बसे नहिं सतगुरु तहैंवाँ ॥ शरधा प्रेम बसे जेहि ठाकैं । सोई जानो सतगुरु गाकैं ॥ ७ ॥
कहैं कवीर धर्मनि सुनो, शरधाको व्यवहार ।
विनु शरधा नहिं पाइये, सत् लोक निज द्वार ॥ २ ॥
शरधा ते सतगुरु सन्माने । यथाशक्ति द्रव्य लेह आने ॥ नाना वासन वस्त्र विधाना । सोना रूपा बहुविधि नाना ॥ १ ॥ कपट छोड़ि शक्ति निज देखे । परमार्थ स्वार्थ बहुविधि पेखे ॥ गुरु पूजा संतन सनमाना । पहिलि विधि आरति कर जाना ॥ २ ॥ नारि पुरुष सबहीं इकठाईं । ले नरियर सब सन्मुख आईं ॥ सह मरजाद सु सीस चढावे । सतगुरु ध्यान मगन हूँ जावे ॥ ३ ॥ सतगुरु आज्ञा देह चढाईं । इक टक दृष्टि गुरु पहुँ लाईं ॥ मोरत नरियर बास उडावे । जमका पला तुरत छुट जावे ॥ ४ ॥ साँचा सतगुरु साँचा चेला । साँचहिं साँच भया इक मेला ॥ घटका परिचय सतगुरु देवे । देही देह परख कर लेवे ॥ ५ ॥ दूजा मेटि एक लौ लावे । देखत काल तुरत मरिजावे ॥ काल दयाल को जाने भेवा । जो सतगुरु सोई निज देवा ॥ ६ ॥ पूजा दूजा काल पसारा । बिना एक नहिं होय उबारा ॥ चौका आरति भेद बतावे । छाड़ि अनेक एक लौ लावे ॥ ७ ॥
कह कवीर धर्मनि सुनो, यह चौका बिस्तार ।
गुरु कृपासे छूटईं, ततछन काल पसार ॥ ३ ॥
पान प्रसाद गुरु ते पाईं । सह परिवार भक्ति चित लाईं ॥ आरति ज्योति घरे घर फेरे । कंटक काल सबहिं खदेरे ॥ १ ॥
शब्दावली
(३८७)
पुनि सतगुरु सह संतन बैठारे । नाना भाँति करे जेवनारे ॥ महा- प्रसाद पुनि संतन लीजे । युग बन्ध मिलि सो सेवा कीजे ॥ २ ॥ बितु सेवा नहिं जीव उबारा । ताते तन मन संतन वारा ॥ तनसे सेव करे बहु भांती । मनसे त्यागे भेद विजाती ॥ ३ ॥ गुरु संत सब इक सम जाने । माने वचन कवीर परमाने ॥ कहै कवीर हम साधु सरूपा । हमहीं गुरु हंसन कर भूपा ॥ ४ ॥ मोमें गुरुमें अरु संतन भाई । रंक्क भेद न जाने कोई ॥ भेद करे सो भवमें डूबे । जमकर मार पड़े सो खावे ॥ ५ ॥ साधु सोई जो सीधा चाले । है निर्पच्छ सत्य प्रतिपाले ॥ संत सोई जो सत मत जाने । काल दिशा को नाहिं परमाने ॥ ६ ॥ गुरु सोई जो सत परखावे । असत छुड़ाई लोक पठावे ॥ सो संत गुरु भेद नहिं भाई । साधु स्वरूप हमहीं निरमाई ॥ ७ ॥
धर्मदास तुम पूछिया, चौका विधि विस्तार ।
सो मैं तुमसे भाषिया, अब का करहु विचार ॥ ४ ॥
सुनत बचन धर्मनि निज बोले । अस संशय मम हिय महँ डोले ॥ कलक जीव रंक बहु होई । इतना साज न साजे सोई ॥ १ ॥ ताकर निरणय कहिये स्वामी । किहिं विधि तरे जीव अनुगामी ॥ सकलो जीव तुम्हारे देवा । कैसे कहौं करै सब सेवा ॥ २ ॥ धर्मनि सुनौ रंक परभाऊ । छठै मास आरति लौ लाऊ ॥ छठै मास नहिं आरति भेवा । वरष माँहिं गुरु चौका सेवा ॥ ३ ॥ सम्भवत माहिं चूक जो जायी । तबै संत साकट ठहरायी ॥ सम्भवत माहिं आरती करई । ताकर जीव धोख नहिं परई ॥ ४ ॥ नाम कवीर जपे लौ लाई । तुमरो नाम कहै गोहराई ॥ तुमरी चाल चले धर्मदास । संतहिं सेवे भक्ति पिपासु ॥ ५ ॥ व्रत अखंडित गुरु पद गहई । गुरु पद प्रीति होई निस्तरई ॥ ऐसी धारन रंक
(३८८)
कवीरपंथी—
परभाऊ । गुरु प्रतापसे लोक सिधाऊ ॥ ६ ॥ समरथ राखि करै जो चोरी । काल निरंजन तहैं डारे डोरी ॥ कूर कपटकी राह चलावे । सतका मारग सो नहिं पावे ॥ ७ ॥
यथा शक्ति सबही करै, छोड़ि कपट व्यवहार ।
शक्ति राखि चोरी करै, बूढ़े काली धार ॥ ६ ॥
सुनहु धर्मनि जगत व्यवहारा । सत्यनाम सो विरक्ति अपारा ॥ देखि बड़ाई भगतिहिं लागे । माया मोह हियेमें पागे ॥ गुरु सेवा ते जीव चुरावे । समधि सोर महाँ दरब लुटावे ॥ देखि साधु दुआर निज भाई । नहिं समझे निज भाग्य बड़ाई ॥ २ ॥ आय परेकी सेवा करई । भाव भक्ति नहीं मन धरई ॥ विवाह सराधमें लाख लुटावे । संत देह मनही पछतावे ॥ ३ ॥ बहु विधि नाना विषय कमावे । देत दान हिये दुख पावे ॥ ऐसी विधि संसार भुलाना । सो नहिं समझे निज कल्याणा ॥ ४ ॥ ताते तुमको कहत हम भाई । योग देख करहु चित लाई ॥ विनु साधन नहिं जीव उबारा । विनु अधिकार न साधन सारा ॥ जहाँ अधिकार तहाँ सब होवे । भाव भक्तिसो ज्ञान सँजोवे ॥ ५ ॥ विनु अधिकार न कोई माने । गजमुक्ता घोंधा करि जाने ॥ जहाँ अधिकार तहाँ उपदेशा । थोडहु करे बहुत परवेशा ॥ ६ ॥ चौका आरति सब कर लेखा । जस अधिकारी तसहिं विवेखा ॥ चौका आरति समझे जोई । संशय मिटे काल मिट सोई ॥ ७ ॥
संशय काल शरीरमें, विषम काल है दूर ।
सतगुरुकी संधी मिले, जागि करै सब धूर ॥ ६ ॥
संशय मिटे योगके धारे । धारि शब्द सब योग सँवारे ॥ जैसे मन संसारहीं राता । काल बान जस बना विधाता ॥ ७ ॥ ऐसे गुरु शब्दहिं मनराते । गुरु वाणी छोरे काल कलाते ॥ बंदीछोर
शब्दावली
(३८९)
गुरु कर नाऊँ । शब्दहि भेद मैं तोहि बताऊँ ॥ २ ॥ विना योग न मिटै जिव फेरा । सतगुरु शब्द कहै जिव टेरा ॥ गुरुके शब्द सुरति जब जूटे । तवहीं काल ठगौरी छूटे ॥ ३ ॥ संशय मिटै योगके धारे । धर्मनि तुम मन करौ विचारे ॥ शब्द सुरति योग यह जानो । गुरुके शब्द सुरत ठहरानो ॥ ४ ॥ गुरु शब्द निश्चय जब होई । छूटे काल जाल निज सोई ॥ संशयको खण्डन यह योगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥ ५ ॥ जीवन काज जाहिते होई । सोई जतन करो सब कोई ॥ सब जिव होई न एक समाना । कर्महि योग अधिकार पिछाना ॥ ६ ॥ जस अधिकार जाहि कर होई । तैसे माने शब्द बिलोई ॥ चौका आरति सबहि बतावे । अपन पराइट भेद लखावे ॥ ७ ॥
चौका आरति जो लखे, ज्ञानी मूढ प्रवीन ।
सतगुरु भेद बतावई, पावे अम्बर चीन ॥ ७ ॥
चौका आरति भेद बतावे । जेहि समझे तेहि लोक पठावे ॥ जैसी रचना लोक विचारा । घटके भीतर सबहि सँवारा ॥ १ ॥ घटका भेद गुरु पहिचाने । चौका आरति सबहि विधाने ॥ चौका आरति जो कोइ बूझे । काल दयाल सब तेहि सूझे ॥ २ ॥ ज्ञान कर्म औ योग विचारा । चौका महाँ सबही विस्तारा ॥ सत्य लोक औ काल पसारा । सबहीं भेद किया निरुआरा ॥ ३ ॥ भक्ति उपासन निज कर राखा । जेहि समझे फल मुक्ति चाखा ॥ अगम अलख सब गुरु समझावे । सुरति निरति ते दर्शन पावे ॥ ४ ॥ शब्द परतीत देख सत लोका । गुरुकी दया मिटै सब धोखा ॥ एके सुरति निरति जो धारे । गुरु परतापसो लोक सिधारे ॥ ५ ॥ यहि निहतत्व मता जो धारे । सुरति निरति सो दीप निहारे ॥ घटमें चौका कर उजियारा । पल पल निरखे सतगुरु द्वारा ॥ ६ ॥
(३९०)
कवीरपंथी—
जाते सहज योग नहिं होई। सो तो आरति साजे लोई॥ संतभेष जो कोइ काछे। ताको देहु योग मति आछे ॥ ७ ॥
गेही लीने आरती, संत सोई सो योग।
ईडा पिंगला साधिके, मुख मन राधे भोग ॥ ८ ॥
ज्ञानसागरका प्रमाण ॥
जैसे ग्रेहीके मन नेहा। तैसे साधे जो सनेहा॥ आसन हठ पर नारि न जावै ॥ ग्रेही रहै न भेष बनावै ॥ १ ॥ देखी देखा भेष बनावै। राधे जोग तो शोभा पावै ॥ भेषै धरे सूरता चाही। कादर भेषकी हाँसी आही ॥२॥ जाते नहिं मन सूरमा होई। तातें गिरही थाप्यो सोई ॥ गिरहीमें छल मता अपारा। तातें सत्य भक्ति चित धारा ॥३॥ सेवा संत करे जो कोई। आरति भक्ति महाफल होई ॥ धन्य संत जो आरति साजा। काल जँजाल गृहते भाजा ॥४॥ आरति समान भक्ति नहीं दूजा। सब ते भली संतकी पूजा ॥ चरणामृत संतनको लेई। सुरति निरति चरणन चित देई ॥५॥ विना योग नहिं होय उबारा। कै नेवर कै दीपक बारा ॥ तातें सहज योग मैं भाखा। शिरनी पान महात्म राखा ॥६॥ आरति तो नानाविधि साजे। पान मिष्ठान भक्त भय भाजे ॥ जो कछु आहि जोगकर भाऊ। सब साखी आरति परभाऊ ॥७॥
संत आरती जोग मत, करहिं गगनमें वास।
ग्रेही जोग न जानहीं, कर आरति परकास ॥ ९ ॥
वह देही यह ग्रेही व्यवहारा। काया संयम दै अनुसारा ॥ निसदिन सुरति रु निरति बिचारा। तातें मंदिर सेत सँवारा ॥१॥ पाचौं तत्त्व तीन गुन साधे। ताते मन बिच आरति राधे ॥ इंगला पिंगला सुष्मनि वासा। मन वच कर्म आरति प्रकासा ॥ २ ॥ बांधै मूल नामको साधे। दुबिधा मिटै एक अवराधे ॥ एके घर
शब्दावली
(३९१)
कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरतिमें दीसा ॥३॥ उघरै संपुट गुरुकी दाया । नरिअरको देखै परभाया ॥ तत्त मूल नरिअरमो जाना । ज्ञानवंत भजि हो निर्बाना ॥ ४ ॥ अनहद बाजे त्रिकुटी ताला । तातें भक्ति जो होय रिसाला ॥ बिन करताल पखावज बाजे । अनहद धुन निसदिन तहैं गजै ॥ ५ ॥ अष्ट दल कमल फूल जो फूला । तातें सुमिरन किय समतूला ॥ सुन अति जोग छतीसौ रागा । तातें भांति भांति पद जागा ॥६॥ जो करतमें देह बिसारै । यहि संसारमें काज सम्हारै ॥ योग समाधि छूटत नहिं देखा । आरति मेंटै कर्म विशेषा ॥ ७ ॥
उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेंट सु होय ।
गुरुकी दया परगट हो, संपुट उघरै सोय ॥ १० ॥
प्रतिदिन जो समाधि मन लावै । तातें सदा आरति गावै ॥ जोग हीन तत्व नहिं लहई । तातें पान बढौना चहई ॥१॥ देखो मन बहु रंग अपारा । तातें पढ़ुप सेज बिस्तारा ॥ देह समाधि गंध बहु होई । साधे अग्र प्रबल है सोई ॥ २ ॥ चौका सेत हंस भल छाजे । सेत सिंघासन छत्र बिराजे ॥ मन औ पवन आहिं दुइ धारा । तातें पवन अनिल घृत जारा ॥३॥ जोग जुगत बिन संग न होई । पाले पवन पाहन है सोई ॥ गगन बाव योग अमीरस चाखा । तातें महाप्रसाद जो भाषा ॥ धन्य अंकूर जीव है सोई । परिचय योग करै तन जोई ॥४॥ गरजे जो जायी । दीप शिखर द्वारै ठहरायी ॥५॥ लावै योग न होय आरती करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥ मूल नाम और सब शाखा । पुढ़प जोग महातम राखा ॥६॥ जोगी दृष्टि भाव बहु करई । घट दृष्टिमें सुमिरन अनु- सरई ॥ मूल नाम मुक्ति फल योगा । सो नरिअर मिष्टानक भोगा ॥७॥
(३९२)
कबीरपंथी—
परचै में मन बांधे, करे जोग मन बास ।
संतन आरति जोग मन, दीपक करे प्रकास ॥ ११ ॥
देह विसार जोग फल चाखा । मन बच कर्म नरिअर सत भाखा ॥ उज्जल मंदिर सेत सम्हारा । सेतहिँ रूप साज्यो पनवारा ॥ १ ॥ सुक्ति पदारथ अबेधा हीरा । तेहि पाये कोई गहिर गंभीरा ॥ चंदन काष्ठ सिंहासन चाही । सुमिरण नाम इकोतर आही ॥ २ ॥ उत्तम पान बढौना चाही । दूटा भाँगा नाहि निवाही ॥ नरियर चहिये निरमल भाई । महा सुक्ति फल होय सदाई ॥ ३ ॥ और कष्ट बात संपुट आही । काचा जीव सुनि बिचले ताही ॥ ताते सहज बतायो भाऊ । परिचय जीवहिँ परम सुभाऊ ॥ ४ ॥ अथवा जो इतना नहिँ होई । सहज आरती थापो सोई ॥ सवा सेर आनो मिष्टाना । तत्त सवासौ आनो पाना ॥ ५ ॥ प्रति पूनौ जो आरति करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥
धर्मदास बचन ।
हे प्रभु पूनोंका अधिकारा । दया करौ दुख भंजन हारा ॥ ६ ॥
साहिब कबीर बचन ।
तुम कहैं दीन्ह यही दिन पाना । तासौ पूनौ आरति ठाना ॥ अथवा सबई अर्थ नहिँ जाना । दोई आरति थाप प्रमाना ॥ ७ ॥
योग आरती फल बडा, सत्त बचन परकास ।
दुविधा निश्चय मेटई, सत्तलोक होय बास ॥ १२ ॥
गुरुका कर्तव्य ॥
सत्तभाव देखहु मति धीरा । लगन साधि देख निज बीरा ॥ १ ॥ बिना लगन करो मत शिक्षा । जोती खेती आदि भल दिशा ॥ उत्सर बीज डार जो कोई । निरफल खेत किसानी होई ॥ २ ॥ उत्सर बीजका ऐसा भाऊ । बोया बीज सो बुथा जाऊ ॥ काँचे जिव कहैं वस्तु न दीजे । परिचय जीव तात गहि लीजे ॥ ३ ॥
शब्दावली
(३९३)
ता कहँ कैसी करह जमराजा । देह धरै तो गुरु कहँ लाजा ॥ बिना लगन मगन भयौ जानी । ऐसो अहै शिष्य सहिदानी ॥ ४ ॥ पूरा जब शिष्य जो होई । गुरु देव भेद बतावे सोई ॥ अथवा जो गुरु अंतर राखै । गुरु में धोख संतमें भाखै ॥५॥ लीक करी औ पंथ बतावै । शोभा अधिक गुरु सो पावै ॥ जस बाना तस होवै करनी । ता गुरुके सम और न बरनी ॥ ६ ॥ सदा लीन नाम जो भाखै । पांच आत्मा अनुरुचि राखै ॥ पांचमें करे पच्चीसों नारी । जे बस किये योग अधिकारी ॥ ७ ॥
जो ऐसी बनि आवै, औरो बनिहै सार ।
तातैं ग्रेही थापिया, कडिहारी संसार ॥ १३ ॥
मरत तजो जस कांचरि साँपा । तातैं सबको मेटब दापा ॥ करो शिष्य जो यहि विधि कोई । पुरइनि पान रहै जनु सोई ॥ ११ ॥
गुरुवाके लक्षण ।
आप स्वार्थी भेष बनावै । मनकी दशा ताहि चित लावै ॥ तृष्णा युक्त करै गुरुवाई । जमसों बाँचे कौन उपाई ॥२॥ निश्चय मानो शब्द हमारा । पर द्रोही कैसा कडिहारा ॥ आप अबूझ औरन समझावै । साखि रमैनी झगरो लावै ॥ ३ ॥ सेवा साधु नहीं बनि आवे । तृष्णा कारण भेष बनावे ॥ अहै न सीहँ स्वान सियारा । परचै बिना कैसे कडिहारा ॥ ४ ॥ पर नारी औ मन्थन कर्मा । यह तो भेद काल को मर्मा ॥
गुरुवाको सिखावन ।
मारह मनसा होइ सो होई । नातर नारि करे पुनि लोई ॥५॥ गिरही माहिं मुक्ति कर भेवा । गुरुकी भक्ति साधुकी सेवा ॥ जोपे सहज भाव कडिहारा । शिष्य कियेका का अधिकारा ॥ ६ ॥ साँचा हो गुरु भगती साधे । साधु संतसो प्रीति अराधे ॥ साधु संत संग रहनी आवे । विन रहनी नहिं जीव तरावे ॥ ७ ॥
(३९४)
कवीरपंथी—
साधु संतकी अधिक महिमा, रहनि कुण्ड नहाइये ।
काम कोध विकार परिहरि, बहुरि न भवजल आइये ॥ १४ ॥
येही साधु मुक्ति फल बासा । सो सब बचन कहौ परकासा ॥ नाम गहै राखे सत करमा । गहि सुकृत छोडे सब भरमा ॥ १ ॥ मद अरु मांम सदाको त्यागे । जीवदया सब विधि अनुरागे ॥ पाछल चूकको एक उपाऊ । साधु सेवा अरु सवै सतभाऊ ॥ २ ॥ करे आरती मन बिच करमा । पर घर तजे जान निज भरमा ॥ गिरही माहिं जो रहैं उदासा । निश्चय सत्तलोकमें बासा ॥ ३ ॥ नाम पाइ जो अवज्ञा करई । भाव विहीन जग अनुसरई ॥ जो कोइ चूके साधुन सेवा । ताकर फल भाखों कछु भेवा ॥ ४ ॥ जाई सो लोक नाम परतापा । तजे देह जिमि कांचरि साँपा ॥ देख जाई हंसनक पांती । ता मध्ये अस बैठ अजाती ॥ ५ ॥ जाते चूक परे सिवकाई । ताते शोभा हीन लजाई ॥ जो कोई याकी करे उछेदा । ताते मैं समझाऊं भेदा ॥ ६ ॥ यही तरे सो कौन विशेषा । गुरुको अचरज यौ बड़ देखा ॥ गुरु नहीं कोई थहि भवसागर । सतगुरु आप अजरमनि आगर ॥ ७ ॥
ऐसी महिमा प्रकट है, जैसे सिंधुका नीर ।
सरिता सब कडिहार भये, सतगुरु सिंधु कवीर ॥ १५ ॥
जपत आहिं जो नाम हमारा । तातें नाम धरा कडिहारा ॥ ले कडिहार जिवनका भारा । तेहि न सूझ किमि उतरे पारा ॥ १ ॥ सरिता माँहि बारि जो होई । जीव जन्तु सुख पावे सोई ॥ सरिता लहै पुण्य परमारथ । सत कडिहारी परस्वारथ ॥ २ ॥ अथव नीर अथाह न होई । सहज योग भाखौ पुनि सोई ॥ नदीमें सोह सदा जो वारी । ऐसी उत्पति आहि हमारी ॥ ३ ॥ प्यासा जाय नदीके पासा । बिन पानी सो जाय पियासा ॥ प्यासा पानी नदी न पावे ।
शब्दावली
(३९५)
जहँ पानी तहँ तृषा बुझावै ॥ ४ ॥ इक जिव गेही आप उबारा । बारि नदी नहिं तस कडिहारा ॥ बांधे अन्न करे शूरमाई । तिनके त्रास दुर्जन डरपाई ॥ ५ ॥ काछे रहै शूर का साजा । आय समय कादर होइ भाजा ॥ तेहि विश्वास रहै नहिं कोई । स्वारथ पिंड परै जन सोई ॥ ६ ॥ ता कहँ होइ पुन्य परमारथ । नाम गहै जन्मै होय स्वारथ ॥ कडिहार सोइ जो शूरा होई । भाखों ताहि आप सम सोई ॥ ७ ॥
कडिहारी औ गृही को, कोई ना जाने अंत । बिन परचे विषमाद है, हरषत परचे संत ॥ १६ ॥
गिरहीका धार्मिक नियम संयम ॥
भाषों संयम संतके भाऊ । अस गेही जो करै उपाऊ ॥ प्रात नेम जो करै अस्नाना । हो प्रकुछित कमल विगसाना ॥ १ ॥ मद रु मांस कहँ त्यागै दोऊ । मिथ्या जीव घात पुनि सोऊ ॥ सत आसन परनिन्दा त्यागी । भली बुरी सँ रहत बिरागी ॥ २ ॥ जाइ तहाँ पर जहँ हितकारी । उचट न परै लह अन्तर भारी ॥ शुधावंत हितकारी होई । अति प्रिय जान समोवहि सोई ॥ ३ ॥ यहि सम दूसर व्रत नहिं जाना । ते जन पूनों आरत ठाना ॥ कहाँ जान दासातन जोई । भागी जीव पावहि निज सोई ॥ ४ ॥ शिष्य होय जो तन मन वारे । गुरु आज्ञा कबहुँ नहिं हारे ॥ गुरु दै शब्द सुक्ति जेहि होई । तेहि समान दूसर नहिं कोई ॥ ५ ॥ गुरु समान जानु नहिं आना । साधू गुरु एक सम जाना ॥ गुरुमत पावे गुरुसम होई । भेद भाव तहाँ नहीं कोई ॥ ६ ॥ सत सतलोक गुरु मत जानो । भेद भाव कछुओ मति आनो ॥ तहाँ न नारि पुरुष कर भाऊ । हंसहिं हंस एक सदभाऊ ॥ ७ ॥
साखी-तन मन गुरुको दीजिये, सुक्ति पदार्थ जान ।
गुरुकी सेवा सुक्ति फल, यह गेही सहिदान ॥ १७ ॥
(३९६)
कबीरपंथी—
चौका आरती पठन फल ।
चौका आरति माहात्म्य यह, पढे सुनै जो कोय । मोक्ष मुक्ति फल पावई, युगल लोक सुख होय ॥१॥ चौका आरति माहात्म्य, संछेप कियो बखान । एकहि दिनमें लिखनभौ, क्षमियो संतसुजान ॥२॥ अभिलाषा तो बड अहै, करु विस्तार महान । नहि अवसर नहि स्थान है, सूच्छम कियो बयान ॥३॥ धर्म कबीर दर्शन विषय, लिखिहौं कछु विस्तार । स्पष्ट वर्णन मद्य विषै, निरखि मिले सुखसार ॥४॥ युगलानन्द है दास निज, संत साधु गुरु केर । विद्वद्वरसे विनति अस, क्षमा करो निज हेर ॥५॥
इति कबीराश्रमाचार्य्यं स्थानी श्रीयुगलानन्द विहारी द्वारा संगृहित संयोजित सम्पादित चौका आरती महात्म्य सम्पूर्ण शुभम्.
सत्यनामः ।
कबीरपंथके धार्मिक सामान्य एकादश नियम.
१-अनादि, अनूप, अजर, अमर, अभय, सच्चिदानंदस्वरूप, निर्मल, निर्वाकार, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् जो महानप्रभु परमात्मा है, उसके अतिरिक्त और किसी देवी देवताकी उपासना न करनी चाहिये.
२-आचार्य्य, गुरु, महात्मा संत ये तीनों उस परमात्माकी साकार मूर्ति हैं, इन्होंकी तन, मन, धनसे सेवा सत्कार द्वारा, उस निराकार महाप्रभु की उपासना करनी योग्य है.
३-गुरुके वचन और अपने धर्मग्रन्थोंमें अटल और पूर्ण श्रद्धा रखकर उनकी शिक्षाके अनुसार चलना चाहिये.
४-संपूर्ण संसारके प्राणीमात्रको निज आत्मा जानकर दया-भावसे, सदा हृदयमें सबका हित चिन्तन करना चाहिये.
५-निर्भयतापूर्वक अन्तःकरणमें सदा शुभ संकल्प और सदाचारका सेवन करना चाहिये, जिससे शरीर, मन और आत्मा पवित्र होकर बलिष्ठ हो जाय.
शब्दावली
(३१७)
६-मांसं मदिरां, व्यभिचारं, चौरी, हिंसां, चूर्तं, (जुवा) मिथ्यां और पिशुनता (चुगली) इन अष्ट महा दोषोंको सर्वथा त्यागना चाहिये.
७-परीक्षापूर्वक सत्यकी धारणा और असत्यके परित्याग करनेमें कदापि विलम्ब न करना चाहिये.
८-विनयभावसे अत्यन्त प्रेम पूर्वक मनुष्यमात्रको सत्य-मार्गमें चलनेका सदा उपदेश देना चाहिये.
९-नित्यप्रति नियमपूर्वक स्वाध्याय द्वारा विद्या वृद्धि करनेमें कदापि आलस्य न करना चाहिये.
१०-तिलक कंठी सहित अपना वेष सभ्य और पवित्र रखना चाहिये.
११-स्वधर्म तथा अपनी आत्माके विपरीत कभी कोई काम न करना चाहिये.
तीसरे खण्डके विषयमें सूचना-
इस ग्रन्थके प्रथम खण्डमें संज्ञासुमिरनका विषय आया है, उसके दो विभाग हुए हैं-१ सर्व साधारण कवीर पन्थियोंका संज्ञासुमिरण, २ बुरहानपुरी संज्ञासुमिरण ॥
दूसरे खण्डमें-जहांतक मिला है स्तोत्रोंका संग्रह है ।
तीसरे खण्डमें-चौका आरती विधान चार विभागमें दिया है । १ विभागमें छत्तीस गढी चौका आरती का विधान, २ में सर्वदेशी चौकाविधान रोसडा कवीर मन्दिरके पाठसे दिया है, ३ रे चौकामें गानेके विशेष राग रागनियोंसे संयुक्त हैं, ४ में आरती चौका माहात्म्य है ॥
इस खण्डमें दूसरा विभाग छपनेसे रह गया है उसे पाठक गण पृष्ठ ४२२ से दूसरे खण्डका तीसरा विभाग आरंभ समझलें ।
इसके आगे शब्दकुंजी मूल रमेनीसे चौथा खण्ड प्रारंभ.
भवदीय-श्री युगलानन्द बिहारी.
मूल रमैनी अर्थात् शब्दकुंजी प्रारंभ ।
(अक्षर खण्डकी रमैनी ।)
प्रथम शब्द हैं शुन्याकार । परा अंत्यक्त सो कहै विचार ॥ अंतःकरण उदय जब होय । पश्यंति अर्धमात्रा सोय ॥ स्वरसो कंठ मध्यमा जान । चौतिस अक्षर मुंख अस्थान ॥ अर्नवनि बानी तेहिके मांहि । बिन जाने नर भटका खाहिं ॥ बानी अक्षर स्वर समुदाय । अर्ध पश्यंति जात नशाय ॥ शुन्याकार सो प्रथमा रहै । अक्षर ब्रह्म सनातन कहै ॥ निर्बुंति प्रबुंति है शब्दाकार । प्रणंव जाने इहे विचार ॥
सारखी-अँकुलाहटके शब्द जो, भई चार सो भेष ।
बहु बानी बहु रूपकै, पृथक पृथक सब देश ॥ १ ॥
२०-अनवनि बानी चार प्रकार । काल संधि झाई औ सार ॥ हेतु शब्द बृद्धिये जोय । जानिय यथैरथ द्वारा सोय ॥ अँमिक झाई संधिक औ काल । सार शब्द काटे भ्रमजाल ॥ द्वैरा चार अर्थ परमान । पद्वैरथ व्यैगारथ पहिचान ॥ भौवारथ ध्वेन्यारथ चार । द्वारा शब्द कोइ लखे विचार ॥ पंरा पराइति मुखसो जान । मोरे सोरह कला निदान ॥
बिन जाने सोरह कला, शब्दी शब्द कौआयै ।
शब्द सुधार पहिचानिये, कौन कहा बौआय ॥ २ ॥
अक्षर वेद पुराण बखान । घरम करम तीरथ अनुमान ॥ अक्षर पूजा सेवा जाप । और महातम जेते थाप ॥ यही कहावत अक्षर काल । जाण गडी उर होयके भौल ॥ ओहं सोहं आतमराम ।
१ इसका स्थान नाभी ॥ २ इसका स्थान हृदय ॥ ३ सोलह स्वर भ आ इत्यादि ॥ ४ इसका स्थान कण्ठ ॥ ५ वर्णजत ॥ ६ नाना प्रकारकी ॥ ७ एकदंती ॥ ८ पश्यन्ति होय फिर परा अवस्थाको प्राप्त होता है ॥ ९ लय ॥ १० उत्पत्ति ॥ ११ ओंकार ॥ १२ उविभाहृठ ॥ १३ सञ्जा ॥ १४ सरमाने ॥ १५ मार्ग, रस्ता ॥ १६ पद, अर्थ, शब्दका जो अर्थ, शब्दार्थ ॥ १७ व्यंग, अर्थ, व्यंग्य भावसे जो कहा जावे ॥ १८ श्रुतलद, आशयवाला जो अर्थ ॥ १९ ध्वनिमात्र ॥ २० परा और अपरा दो बिधा कोई शब्द वरा विद्याको वर्णन करता है कोई अपराको २१ भटकता है ॥ २२ तीर.