कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(३९९)
माया मंत्रादिक सब काम ॥ ये सब अक्षर संधिक है। जेहिमाँ निशिवासर जिव रहै ॥ निरगुण अलख अकह निर्वाण। मनुबुधि इन्द्रिय जाय न जान ॥ विधि निशेष जहाँ बँनत न दोय। कहैं कवीर पद झाँई सोय ॥
प्रथमें झाँई झाँकते, पैठा संधिक काल।
पुनि झाँईकी झाँई रही, गुरु विन सकेको टाल ॥ ३ ॥
प्रथमही संभर्वे शब्द अमान। शैबंदी शब्द कियो अनुमान ॥ मान महातम मान झुलान। मानत मानत बावन ठान ॥ फेरा फिरत भयो भ्रमजाल। देहादिक जग भये विशाल ॥ देह भई ते देहिक होय। जगत भई ते कर्ता कोय ॥ कर्ता कौरण कर्महि लाग। घर घर लोग कियो अनुराग ॥ 'छौ दृशन वर्णाश्रमचौर। नौ' छौ भये पाखंड बिकार ॥ कोई त्योंगी अँतुरागी कोय। विधि निषेधमा बैधिया दोय ॥ कल्पेउ ग्रंथ पुराण अनेक। भरमि रहै सब बिना विवेक ॥
भरमि रहा सब शब्दमें, शबदी शब्द न जान।
गुरुकृपा निज परखवल, परखो धोखा ज्ञान ॥ ४ ॥
धोखा प्रथम परखिये भाई। नाम जाति कुल कर्म बड़ाई ॥ शि'ति जल पाँवक मरूँत अकँाश। तामहँ पंच विषय परकाश ॥ तत्व पाँचमें श्वासासार। प्राण अपान समान उँदार ॥ और ब्यान बावन संचार। निज निज थैल निज कारजकार ॥ इंगला पिंगला
२३ जगत्को निषेधकर और ब्रह्माका प्रतिपादन करना यह है स्त्री जिसकी। २४ होता श्वा। २५ शब्दका मालिक शब्द कहने वाला। २६ हेतु २७ योगी जंगम १ सेवदा ४ संन्यासी। ५ बँवस। ६ छठा कहिये ब्राह्मण छः घर छ' है उपदेश। २८ ब्राह्मण १ क्षत्री। २ वैश्य, ३ शूद्र ४ वर्ण और ब्रह्मचर्य १ गृहस्थ २ वानप्रस्थ ३ संन्यास ४ आश्रम। (२९-(१६) छपानवे पाखण्ड ३१ विरक्त। ३२ गृहस्थ। ३३ पृथ्वी। ३४ अनि। ३५ वायु। ३६ शब्द आकाशका विषय, स्पर्श वायुका, रूप अनिका, रस जलका, गन्ध पृथ्वीका ३७ उवास। ३८ स्थान।
(४००)
कबीरपंथी—
औ सुखमनी । इकइस सहस्र छौसत सोगनी ॥ निर्गैम अँगम सो सदा बवावे । आसासार सरोदा गावे ॥
धोखा अँधेरी पायके, या विधि भया शरीर ।
कल्पेउ करता एक पुनि, बढी कर्मकी पीरें ॥ ६ ॥
योग जप तप ध्यान अलेख । तीरथ फिरत धरे बहु भेख ॥ योगी जंगम सिद्ध उदास । घरको त्यागि फिरे बनवास ॥ कन्द मूँल फँल करत अहार । कोइ कोइ जटा धरे शिरभार ॥ मन मलीन सुख लाये धूर । आगे पीछे अग्नि औ सूर ॥ नग्र होय नर खौरि न फिरे । पीतर पाथरमें शिर धरे ॥
काल शब्दके शोरते, “होर परी संसार ।
देखा देखी भागिया, कोई न करे विचार ॥ ६ ॥
जब पुँनि आय खसी यह बँनि । तब पुनि चित्तमा कियो अनुमानि ॥ महीं ब्रह्म कर्ता जग केर । परे सो जाल जगतके फेर ॥ पाँचें तीन गुण जग उपजाया । सो माया मैं ब्रह्मनिकाया ॥ उपजे खपे जग विस्तारा । है साक्षी सब जाननिहारा ॥ मो कहँ जानि सके नहिं कोय । जोपै विधि हरिशंकर होय ॥ अस सन्धिककी परी विकार । विलु गुरु कृपा न होय उबार ॥ मगन ब्रह्म सन्धिकके ज्ञान । अस जानि अब भया भ्रमहान ॥
“संधी शब्द है भ्रममा, भूलि रहा किताँ लोग ।
परखेउ धोखा भेवैं नहिं, अंत होत बड़ “सोग ॥ ७ ॥
जो कोइ संधिक धोखा जान । सो पुनि उलटि कियो अनुमान ॥ मन बुधि इन्द्रिय जाय न जान । निरबँचनी सो सदा अमान ॥
३९ वेद. ४० शास्त्र. ४१ अविद्या अज्ञानता. ४२ दुःख. ४३ जो पृथ्वीके नोवैं है जैसे जाल शकरकंड केतउर फर इत्यादि. ४४ जो मूलसे होता है अर्थात् काठ फोड़ कर जो निकलता है जैसे कटहल, गूलर इत्यादि. ४५ जो. फूलसे पैदा होता है जैसे आम, (केरो) अमरुद (आमफल) इत्यादि. ४६ सूर्य. ४७ गलीगली ४८ शोर हल्का. ४९ फिर. ५० शब्द. ५१ पांचतत्व ॥ ५२ देखो रमैनी ३ । १० इत्यादि. ५३ कहा. ५४ भेद. ५५ शोकदुःख. ५६ कहनेमें जो नहीं आवे.
शब्दावली
(४०१)
अकँल अँनीह अँबाध अँभेद । नेति नेति के गावे वेद ॥ सोहँवृत्ति अखण्डित रहै । एक दोय अब को तहँ कहै ॥ जानि परी तब नित्यँाकार । झाँई सो भ्रम महा बेकार ॥
संभव शब्द अमान जो, झाँई प्रथम विकार ।
परखेउ धोखा भेव निज, गुरुकी दया उवार ॥ ८ ॥
पहिले एक शब्द समुदाय । बावन रूप धरे छितराय ॥ इच्छा नारि धरे तेहि भेश । ताते ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ चारिउ उरपुर बावन जागे । पंच अठारह कंठहिं लागे ॥ तालू पंच शून्य सो आय । दश रसनाके पूत कहाय ॥ पांच अघर अघरहीमा रहै । शुभ्रे कंठ समोघे वहै ॥ ओठ कंठ ले प्रगटे ठौर । बोलन लागे औरके और ॥
एक शब्द समुदाय जो, जागै चार प्रकार ।
कालशब्द संधिशब्द, झाँई औ पुनी सार ॥ ९ ॥
पाँचँ तीँ नि नाँछाँ आँचार । और अँठारह करे पुकार ॥ कर्म धर्म तीरथके भाव । ई सब काल शब्दके दाव ॥ सोहँ आत्मा ब्रह्म लखाव । तत्व मसी भूँत्युंजय भाव ॥ पंचकोश नवँकोश बखान । सत्य झूठमें करे अनुमान ॥ ईश्वर साक्षी जाननिहार । ये सब संधिक कहै विचार ॥ कारजकारण जहाँ न होय । मिथ्याको मिथ्या कहि सोय ॥ बैनँ चैन नहिं मौन रहाय । ई सब झाँई
५७ कला अंश रहित. ५८ इच्छा रहित. ५९ बाद रहित. ६० भेव रहित. ६१ लगन स्थाल. सुरत. ६२ सत्य रूप. ६३ पांच तत्व ६४ तीनगुण. ६५ नौ व्याकरण. ६६ छः शास्त्र. ६७ चार वेद ऋगवेद १ यजुर्वेद २ सामवेद ३ अथर्ववेद. ६८ अठारह पुराण. १ मारकण्डेय पुराण २ मत्स्य पुराण. ३ सागवत. ४ मविष्य पुराण ५ ब्रह्मा वैवर्तक. ६ ब्रह्माण्ड पुराण. ७ ब्रह्मपुराण. ८ विष्णुपुराण. ९, शिवपुराण १० वाराहपुराण. ११ वायुपुराण १२ अग्निपुराण १३ नारद पुराण. १४ पद्म पुराण १५ कूर्मपुराण. १६ स्कन्द पुराण. १७ लिंग पुराण १८ गरुड पुराण. ६९ नाम वायु ७० अन्नमय प्राणमय, मनोमय, ज्ञानमय, विज्ञानमय (आनंदमय) ७१ उपरौक्त ५ और शब्दमय. १ प्रकाशमय. ३ आनंदमय. ४ वेखो बीजक के ५० वीं साखीकी टीका पृष्ठ ३६१ और कबीर मंशूर बड़ा पृष्ठ ६९६. ७२ वाणे.
(४०२)
कवीरपंथो—
दीन भुलाय ॥ कोई काहूका कहा न मान । जो जेहि भावे तहैं अरुज्ञान ॥ परे जीव तेहि यमकी धार । जौलौ पावे शब्द न सार ॥ जीव दुँसह दुख देखि दयाल । तब प्रेरी प्रभु परख रिसाल ॥
परखाये प्रभु एक को, जामें चार प्रकार ।
काल संधि झाँई लखी, लखी शैब्व मत सार ॥ १० ॥
प्रथमे एक शब्द आरूढ । तेहि तक कर्म करे बहु सूढ ॥ ब्रह्मभरम होय सब (जग) में पैठा । निरमल होय फिरे बहु ऐंठा ॥ भरम सनातन गावे पाँचैं । अटकिर है नर भवकी खौंच ॥ आगे पीछे दहिने बांये । भरम रहा है चहुँ दिशि छाये ॥ उठी भर्म नर फिरे उदास । घरको त्यागि कियो वनवास ॥ भरम बढी शिर केश बढावे । तके गगन कोइ बांह उठावे ॥ दे तारी कर नाशा गहै । भरमिक गुरु बतावे लहै ॥ भरम बढो अरु धूमन लागे । विनु गुरु पारख कहु को जागे ॥
कहैं कवीर पुकारके, गहहु शरण तजि मान ।
परखाये गुरु भरमको, वानि खानि सहिदान ॥ ११ ॥
भरम जीव परमात्म माया । भरम देह औ भरम निर्काया ॥ अनहद नाद औ ज्योति प्रकास । आदि अंतलौ भरमहिं भास ॥ इत उत करे भरम निरमौन । भरम मान औ भरम अमान ॥ कोहं जगत कहाँसे भया । ई सब भरम अती निरमया ॥ प्रलंय चारि भ्रम पुण्य औ पाप । मन्त्र जाप पूजा भ्रम थाप ॥
❁ वाट वाट सब भर्म है, माया रची बनाय ।
भेद बिना भरमें सकल, गुरु बिन कहाँ लखाय ॥ १२ ॥
❁ बाप पूत दोउ भरम है, माया रची बनाय ।
भेद बिना भरमें सकल, गुरु बिन कहाँ लखाय ॥
७३ कंस गया. ७४ कठिन. ७५ शब्द. ७६ पांचतत्व ७७ कीचड पंक कांदो. ७८ निराकार ७९ हित्त.
८० नित्य प्रलय १ नैमित्तिक प्रलय २ महाप्रलय ३ आत्म्यतिक प्रलय ४।
शब्दावली
(४०३)
बाप पूत दोऊ भरम, आँधकोश नव पाँच । विन गुरु भरम न छूटे, कैसे आवै साँच ॥ १३ ॥ कैलमा बाँग निर्माज गुजारे । भरम भई अछ्छाह पुकारे ॥ अजब भरम एक भई तमासा । लैा सुकाम बेचैँन निवासा ॥ वेनैँमू नवह सबके पारा । आँखिर ताको करे दिदौंरा ॥ रगडे नाक मंसजिद अचेत । निदे बुँतपरस्त तेहि हेत ॥ बावेंन तीसँबरन निरमान । हिन्दू तुरक दोऊ भरमान ॥
भरमि रहे सब भरम महाँ, हिन्दू तुरुक बखान । कहहिँ कवीर पुकारकै, विन गुरु को पहिचान ॥ १४ ॥ भरमत भरमत सबै भरमाने । रामसनेही विरले जाने ॥ तिरदेवा सब खोजत हारे । सुर नर मुनि नहि पावत पारे ॥ थकित भया तब कहावे अन्ता । विरौँहिन नारि रही विनु कैन्ता ॥ कोटिन तरक करै मनमाहीं । दिलकी दुबिधा कतहुँ न जाहीं ॥ कोई नख शिख जटा बढावै । भरमि भरमि सब जहँ तहँ धावै ॥ बाट न सूझै भई अँधेरी । होय रही बानीकी चेरी ॥ नाना पन्थ बरनि नहि जाई । *जाति वरण कुल नाम बड़ाई ॥ रैन दिवस वे ठाँदे रहहीं । वृक्ष पहार काहे नहि तरहीं ॥
खँसम न चीन्हे बावरी, पर पुरुष लौलीन । कहहिँ कवीर पुकारके, परी न बानी चीन ॥ १५ ॥
- जातिकर्म गुन नाम बड़ाई ॥
८१ आद्यभार्गी. मुसलमानोंका गुरु मन्त्र लाएलाइलिलाह मुहम्मदुंर. सुलिलाह." ८३ अजान जो निमाज पढनेके थोडेही पहले निमाजके समय सूचना करनेको कलमा शो पुकारते हैं. ८४ जो खुदके प्रार्थना पाँच समय दिन और रात्री पढते हैं परिचम मुह होकर. ८५ स्थान रहित. ८६ निराकार. ८७ अद्वितीय ८८ क्यामतके दिन, सुष्टिके अंतमें जब खुदा सबका न्याय करेगा. ८९ वर्श.न. ९० मुसलमानोंके नमाज पढनेकी जगह प्रतिमापूजक. (जातिकर्म गुन नाम बड़ाई) बाप पूत दोऊ भरम है माया रची बनाय. जेद विना भरमै सकल, (गुरु विन कहाँ लखाय) ९२ संस्कृत वर्णमालाके अक्षर. ९३ मुसलमानों वर्णमालाके ३० अक्षर ९४ मुसलमान. ९५ वियोगित. ९६ पिया मालिक. ९७ खडे. ९८ मालिक यति
(४०४)
कवीरपंथी—
कनैरसकी मतवाली नारी । कुंटनीसे खोजे लैंगवारी ॥ कुटनी आखिन काँजर दियऊ । लागि बतौँवन ऊपर पियऊ ॥ काजर लेके हूवै गई अंधी । समुझ न परीबातकी 'संधी' ॥ बाजेकुटनी माटे मेटकी । ई सब छिनरौता महँ अटकी ॥ विरहिनि होयके देह सुखावै । कोई शिरमहै केश बढावै ॥ मानि मानि सब कीन्ह सिगारा । बिन पिय परसै सबे अंगारा ॥
अटकी नारि छिनारि सब, हरदम कुटनी द्वार ।
खसम न चीन्हे बावरी, घर घर फिरत खुवार ॥ १६ ॥
नव दरवाजा भरम विलास । भरमहि बावन बहे वतास ॥ कनउज बाँवन भूत समान । कहँ लगि गनो सो प्रथम उडान ॥ माया ब्रह्म जीव अनुमान । मानतही मालिक वौरान ॥ अकबक भूत बके परचंड । व्यापि रहा सकलो ब्रह्मंड ॥ ई भर्म भूतकी अकथ कहानी । गोत्यो जीव जहां नहि पानी ॥ तनक तनक पर दौरे बौराँ । जहां जाये तहँ पावे न ठौरा ॥
योगी रोगी भगत बावैराँ, ज्ञानी फिरे निखट्टू ।
संसारीको चैन' नहीं है, ज्यों सरायका टट्टू ॥ १७ ॥
इतंत दौरे सब संसार । छुटे न भरम किया उपचार ॥ जरे जीवको बहुरि जरावै । काटे ऊपर लोन लगावै ॥ "योगी ऐसी हाल बनाई । उलटी बत्ती नाक चलाई ॥ कोइ विभूति भृगछाला डारे । अगम पन्थकी राह निहारे ॥ काहूको जल माँझ सुतावै । कहरतहीं सब रैन गँवावै ॥ भगती नारी कीन शृंगार । बिन प्रिया परचे सबै अंगार ॥ एक गर्ब ज्ञान अनुमान । नारि पुरुषका भेद न जान ॥ संसारी कहूँ कल नहि पावे । कँहरत जगमें जीव गवाँवे ॥
१९ कान कारस बाणी. १०० गुरुआ लोग. १०१ आसना, जार. १०२ मूठा उपदेश १०३ बताजे लगी, उपदेश देनेलगी. १०४ मिलावट. १०५ इशारा. १०६ अक्षर १०७ दुबावा. १०८ उदास. १०९ मुख. ११० यहां बहां. १११ नेतो घोती बाहर करता है. ११२ हाय २ करते २
शब्दावली
(४०५)
चारि दिशामें मंत्री झोंरे । लिये पलीता मुलना हारे ॥ जरे न भूत बड़ो वरियोंरा । काजी पण्डित * पढि पढि हारा ॥ इन दोनों पर एके भूत । झारेंगे क्या माँकी चूत ॥
भूत न उतरे भूतसों, सन्तो करो विचार । कहैं कवीर पुकारिके, विनु गुरु नहिं निस्तार ॥ १८ ॥
परम प्रकाश भौंस जो, होत "प्रोढ विशेष । तद प्रकाश संभव भई, महा काश सो शेष ॥ १९ ॥ झाई संभव बुद्धि ले, करी कल्पना अनेक ।
सो परकाशक जानिये, ईश्वर साक्षी एक ॥ २० ॥ विषम भई संकल्प जब, तदाकारसो रूप ।
महा अंधेरी कालसो, परे अविद्या कूप ॥ २१ ॥ महातत्व त्रीगुणैंपांचतत्व, सैमष्टि व्यष्टि परमान ।
दोय प्रकार होय प्रगटे, "खंड अखंडसो जान ॥ २२ ॥
सदा अस्ति भौसे निज भास । सोई कहिये परम प्रकाश ॥ परम प्रकाश ले झाई होय । महद अकाश होय बरते सोय ॥ बरते वर्तमान परचंड । भौंसक तुरियातीत अखंड ॥ कालसंधि होये उत्थास । आगे पीछे अनवनि भास ॥ विविध भावना कल्पित रूप । परकाशी सो साक्षि अनूप ॥ * शुन्य अज्ञान सुषुप्ति होय । अकु- लाहट ते नादै सोय ॥ नाद वेद आकर्षण जान । तेज नीर प्रगटे तेहि आन ॥ पानी पवन गांठि परिजाय । देही देह धरे जग आय ॥ सो कौवार शब्द परचंड । बहु व्यवहार खण्ड ब्रह्मण्ड ॥
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पांचि पांचि हारा
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शुन्य ज्ञान सुषुप्ती होय । अकुलाहटसे नादी सोय ॥
११३ पंडित लोग. ११४ मजबूत बलो बलवान. ११५ अघ्यास. ११६ दृढ. ११७ समूह जैसे बन. ११८ एक जैसे एक वृक्ष. ११९ अंस. १२० पूर्ण १२१ सत्य. १२२ अघ्यासका कराने वाला.
(४०६)
कवीरपंथी—
जतन भये निज अर्थको, जेहि छूटे दुखंभ्रँरि ।
धूर परी जब आंखमें, सूझे किमि निजमूरि ॥ २३ ॥
पांजी परख जबै फरि आवै । तुरतहि सबै विकार नशावै ॥ शब्द सुधारिके रहे अकरम । स्वाती भक्तिके खोटे भरम ॥ काल जाल जो लखि नहिं आवै । तौलौ निज पद नहीं पावै ॥ झाईं संधि काल पहिचान । सार झाब्द विनु गुरु नहिं जान ॥ परखे रूप अवस्था जाय । आन विचार न ताहि समाय ॥ झाईं शब्द ले परखे जोय । संशय वाके रहे न कोय ॥
धन्य धन्य तारण तरण, जिन परखा संसार ।
वंदीछोर कवीरसों, परगट गुरु विचार ॥२४॥
शब्द संधि ले ज्ञानी मूढ । देह करम जगत आरूढ ॥ नौंद संधिलै सपना होय । झाईं शून्य सुषोपति सोय ॥ ज्ञानप्रकाशक साक्षी संधि । तुरियातीत अभास अबंधि ॥ झाईं ले वरते वर्तमान । सो जो तहां परे पहिचान ॥ काल अस्थितिके भास नशाय । परख प्रकाश लक्ष बिलगाय ॥ बिलगे लक्ष अँपैनपौ जान । आपु अपनपौ भेद न आन ॥
आप अपनपौ भेद विनु, उलटि पलटि अरूझाय ।
गुरु बिन मिटे न दुगदुगी, अनवनि यतन नशाय ॥२५॥
निज प्रकाश झाईं जो जान । महा संधिमाकाश बखान ॥ सोईं पांजी ले बुद्धि विशेष । प्रकाशक तुरियातीत अरू शेष ॥ विविध भावना बुद्धि अँतुरूप । विद्यामाया सोईं स्वरूप ॥ सो संकल्प बसे जिव आप । फुँरी अविद्या बहु संताप ॥ त्रीगुण पांच तत्व विस्तार । तीन लोक तेहिके मंझार ॥ अँदबुद कला बरनि नहिं जाइ ।
१२३ ढेर, लम्हूह. १२४ वंदांत. १२५ अंतरका जो शब्द १२६ बाव, अपना स्वरूप. १२७ खाता-बही. १२८ अनुसार मुताबिक १२९ स्फुर्ण हुआ. १३० नाना रंगका आश्चर्यमय.
शब्दावली
(४०७)
उपजे खँपे तेहि माहि समाइ ॥ निज झाँई जो जानी जाय । सोच मोह संदेह नशाय ॥ अनजानेको एही रीति । नाना भांति करे परतीति ॥ सकल जगत जाल अरुझान । बिरला और कियो अनुमान ॥ कर्ता ब्रह्म भजे दुख जाय । कोई आपै आप कहाय ॥ पूरण संभव दूसर नाहिं । बंधन मोक्ष न एको आहि ॥ फल आश्रित स्वर्गदिके भोग । कर्म सुकर्म लहे संयोग ॥ करमहीन वँना भगवान । सँत कुँसँत लियो पहिचान ॥ भांतिन भांतिन पहिरे चीर । युग २ नाचे दास कँवीर ॥
भासे जीवरूप सो एक । तेही भास के रूप अनेक ॥ कोई मँगैन रूप लौलीन । कोई अँरूप ईश्वरमन दीन ॥ कोई कर्महँप है सोय । शब्द निरूपै न करे पुनि कोय ॥ सँमय रूप कोई भगवान । कर्ता न्यारा कोई अनुमान ॥ कोई कहे ईश्वर ज्योतिहि जान । आतमको कोई स्वतः बखान ॥ कोई कहै सबपुँनी सबते न्यार । आपै राम विश्व विस्तार ॥
शब्द भाँव कोई अनुमान । अद्वै रूप भँई पहिचान ॥ दुर्गदुर्ग रही को बोले बात । बोलतही सब तत्व नशात ॥ बोल अँबोल लखे पुनि कोय । भास जीव नहिं परखै सोय ॥
निज अँध्यास झाँई अहै, सो संधिक भौमास ।
प्रथम अनुहारा कल्पना, सदा करे परकास ॥ २६ ॥
लख चौरासा योनि जेते । देही बुद्धि जानिये तेते ॥ जहँ जेहि भास सोई २ रूप । निश्चै किया परा भवकूप ॥ नाना भांति विषय रस लीन । अरुझि २ जिव मिथ्या दीन ॥ दाँवाँ विषयै जरे सब
१३१ नाश होता है १३२ बंध. १३३ भला. १३४ बुरा, १३५ भक्त लोग. १३६ सगुण उपासक. १३७ निगुण उपासक. १३८ पूर्व मोमासक. १३९ व्याकरण. १४० वैशेषिक. (काल जावी.) १४१ तर्क-जावी नैयायक. १४२ योगी (पातांजल) १४३ सांख्यवादी १४४ वेदांती. १४५ बोलता. १४६ हुई. १४७ शंका. १४८ विज्ञानी. १४९ कल्पना. १५० उसके बुद्धि का जो विषय. १५१ अनित.
(४०८)
कवीरपंथी-
लौय । बाँचा चहै गहै पुनि सोय ॥ दृढ विश्वास भँरोसा राम । कबहुँ तो वे आवैँ काम ॥ विषयैँ विकार माँझ संग्राम । राम खटोला किया अराम ॥ घायल बिना तीर तरवार । सोइ अँभरण रीझे भरतार ॥ कामिनी पहिर पियासों राँचा । कहै कविर भवबूडतें बाँची ॥ भव बूडत बेडों भगवान । चढे धाये लागीलौज्ञान ॥ थाह न पावे कहे अथाह । डोलत करत तराहि तराह ॥ सूझ परे नहिं वार न पार । कहे अपार रहै मँझधँार ॥ माँझधारमें किया विवेक । कहाँके दूजा कहींके एक ॥ बेरा आपु आपु भवधार । आपै उतरन चाहे पार ॥ बिन जाने जाने है और । आपै राम रमै सब ठौर ॥ वार पार ना जाने जोर । कहै कवीर पार है ठौर ॥ २४ ॥ अक्षर खानी अक्षर वाणी । अक्षरते अक्षर उत्पानी ॥ अक्षर करता आदि प्रकाश । ताते अक्षर जगत विलास ॥ अक्षर ब्रह्मा विष्णु महेश । अक्षर रज सत तम उपदेश ॥ क्षिति जल पावक मरुत अकाश । ये सब अक्षरमो परकाश ॥ दश औतार सो अक्षर माया । अक्षर निर्गुण ब्रह्मनिकाया ॥ अक्षर काल संधि अरु झाँई । अक्षर 'दैहिने अक्षर 'बाँई ॥ अक्षर आगे करे पुकार । अँटके नर नहिं उतरे पार ॥ गुरुकृपा निजैँ उद्वैय विचार । जानि परी तव गुरुमत सार ॥
ओसको जहँ लेश नहीं, बूझे सकल जहान ।
गुरु कृपा निज परख बल, तब ताको पहिचान ॥ २७ ॥ रमैनी-अक्षर काया अक्षर माया । अक्षर सतगुरु भेद बताया ॥ अक्षर यन्त्र मन्त्र अरु पूजा । अक्षर ध्यान घरावत दूजा ॥ अक्षर पटि २ जगत भुलान । अक्षर विनु नहिं पावै ज्ञान ॥ विन अक्षर
१५२ आशा १५३ श्लोक, एंव. १५४ गहना १५५ लगी. १५६ गुरु. १५७ नाव किरती. १५८ बीच धारने. १५९ दक्षिण पंथ १६० बाममार्ग. १६१ अपना. १६२ प्रकाश.
शब्दावली
(४०९)
नहिं पावे रंगती । अक्षर बिन नहिं पावे रंगती ॥ अक्षर भयउ अनेक उपाय । अक्षर मुनि २ शून्य समाय ॥ अक्षरसे भव आवै जाय । अक्षर काल सबनको खाय ॥ अक्षर सबका भाषे लेखा । अक्षर उत्पति प्रलय विशेषा ॥ अक्षरकी पावै सहिदांनी । कहै कवीर भव उतरे प्रानी ॥
परखावे गुरु कृपा करि, अक्षरकी सहिदानि ।
निज बल उदय विचारते, तब होवे भ्रम हानि ॥ २८ ॥
बावनके बहु बने तरङ्ग । ताते भासत नाना रङ्ग ॥ उपजे औ पालै अनुसरे । बावन अक्षर आखिर करे ॥ राम कृष्ण दोउ लहर अपार । जेहिपद गहि नर उतरे पार ॥ महादेव लोमश नहिं बांचे । अक्षर त्रास सबै मुनि नाचे ॥ ब्रह्मा विष्णु नांचे अधिकाइ । जाको धर्म जगत सब गाइ ॥ नांचे गण गंधर्व मुनि देवा । नाचे सनकादिक बहु भेवा ॥ अक्षर त्रास सबनको होइ । साधक सिद्ध बचे नहिं कोइ ॥ अक्षर त्रास लखे नहिं कोइ । आदि भूल बंधे सब लोइ ॥ अक्षर सागर अक्षर नाव । करणधार अक्षर समुदाव ॥ अक्षर सबका भेद बखान । बिन अक्षर नहिं अक्षर जान ॥ अक्षर आसते फंदा परे । अक्षर लखे ते फन्द टरे ॥ गुरु शिष अक्षर लखे लखावे । पराशी फन्द मुक्तावे ॥ विनु गुरु अक्षर कौन छोडावे । अक्षर जालते कौन बचावे ॥ संचितै क्रिया उदय जब होय । मानुष जन्म पावे तब सोय ॥ गुरु पारख बल उदय विचार । परख लेहु जगत गुरुमुख सार ॥ अस्ति हंस प्रकाश अपार । गुरुमुख सुख निज अति दातार ॥
सारसी०-अक्षर है तिहु भ्रमका, विनु अक्षर नहिं जान ।
गुरु कृपा निज बुद्धिबल, तब होवे पहिचान ॥ २९ ॥
१६३ मुक्ति, १६४ प्रवृत्ति, १६५ चिह्न, पारख, पहिचान, १६६ मय, १६७ जन्मांतरोंमें संचित क्रिया हुआ कर्म.
(४१०)
कवीरपंथी—
जैहँवांसे सब प्रगटे, सो हम समझत नाहिं । यह अज्ञान है मानुषा, सो गुरु ब्रह्म कहि ताहिं ॥३०॥ ब्रह्मा विचारे ब्रह्मको, पारख गुरु प्रसँाद । रहितँ रहे पद परखिके, जिवसो होय अँवाद ॥ ३१ ॥
इति मूल रमैनी—शब्दकुंजी समाप्ता ॥
वाणी जेती जगतमें, सबमें ताला दीन । विनु सतगुरु कृपा कोई, पावे नाहीं चीन ॥ १ ॥ सतगुरु कवीर कृपा करी, चाबी दीन्ह रसाल । वाणी कुलुफ याते खुले, पावे भेद विसाल ॥२॥ वाणी विविधि जगतमें, काल जाल प्रचंड । सत्य भेद किमि पावई, भूले जीव परखंड ॥३॥ याते सतगुरु कृपा करी, जीव उबारन हेतु । मूल रमैनी प्रगट करी, दीन्हा भवको सेतु ॥ ४ ॥ कठिन शब्द जेते रहे, टिप्पणी करि बनाय । बाकी अब कछु होय जो, दीजो संत जनाय ॥५॥ गुरुथल होतौँ जानिये, शिवहँर जन्म स्थान । युगलानन्द मम नाम है, जानो संत सुजान ॥ ६ ॥
इति मूलरमैनी प्रसिद्ध अक्षरखण्डकी रमैनी स्वामी श्रीयुगलानन्द
बिहारीद्वारा संशोधित समाप्ता ।
आदि वाणीका शब्द ।
“बलिहारी अपने साहबकी जिन यह ज्युति बनायी । उनकी शोभा केहि विधि कहिये मोसों कही न जायी ॥ बिना ज्योतिकी जहँ उजियारी सो दरशे वह दीपा । निरते हंस करै कौतूहल वोही पुरुष समीपा ॥ झलके पदुम नाना विधि वानी माथे छत्र विराजै । कोटिन भानु चन्द्र तारागण एक फुचरियन छाजे ॥ कर गहि बिहँसि जबै मुख बोले तब हँसा सुख पावै । वंश अंश जिन बूझ विचारी सो जीवन मुक्तावै ॥ चौदह लोक वेदका मण्डल तहँ लग काल दोहाई । लाक वेद जिन फंदा काटी ते वहि लोक
१६८ जहाँसे. १६९ दया, कृपा. १७० अलग. १७१ बाद रहित. १७२ जिला सारन डा० घ० कुबाह कोटके इलाकेमें और हथुआसे पांच कोस उत्तर पर है. १७३ बिहार प्रान्तके मुजफ्फरपुर जिलेमें राजस्थानहै.
शब्दावली
(४११)
सिधार्द्ध ॥ सांत शिकारी चौदह पारथ भिन्न भिन्न निरतावै । चारिअंश जिन समुझि बिचारी सो जीवन सुकतावै ॥ चौदह लोक बसे यम चौदह तहै लग काल पसारा । ताके आगे ज्योतिनिरंजन बैठे सुत्र मझारा ॥ सोरह खंड अक्षर भगवाना जिन यह सृष्टि उपाई । अक्षर कला सृष्टिसे उपजी उन्ही माहैं समाई ॥ सत्रह संख्य पर अधरदीप जहैं शब्दातीत विराजै । निरतै सखी बहु विधि शोभा अनहद बाजा बाजै ॥ ताके ऊपर परमधाम है मरम न कोई पाया । जो हम कही नहीं कोउ माने ना कोइ दूसर आया ॥ वेद न साखी सब जित अरुझे परमधाम ठहराया । फिरि फिरि भटकै आप चतुर है वह घर काहु न पाया ॥ जो कोइ होइ सत्यका किनका सो हमका पतिआई । और न मिलै कोटि कर थाके बहुरि कालघर जाई ॥ सोरह संख्यके आगे समर्थ जिन जग मोहिं पठवाया । कहै कवीर आदिकी बाणी वेद भेद नहि पाया”
कडिहार भेदका शब्द ।
“दशौ दिशा कर मेटौ धोखा । सो कडिहार बैठही चोखा ॥ दशौ दिशा कर लेखा जाने । सो कडिहार आरती ठानै ॥ दश इंद्रीकै पारिख पावै । सो कडिहार आरती गावै ॥ जो नहि जाने एतिक साजै । चौका युक्ति करै कयहि काजै ॥ इस कारण करहिं गुरुआई । बिगैर ज्ञान जो पंथ पराई ॥ पद साखी अरु ग्रंथ हटावै । बिन परख न उत्तम घर पावै ॥ शब्द साखी सिखि पारस करहीं । होय भूत पुनि नरकहिं परहीं ॥ विना भेद कडिहार कहावै । आगिल जन्म श्वानको पावै ॥ पद साखी नहिं करहिं विचारा । भूँकि भूँकि जस मरे सियारा ॥ पद साखी है भेद हमारा । जो बूझैं सो उतरहिं पारा ॥ जब लग पूरा गुरु न पावै । तब लग भवजल फिरि फिरि आवै ॥ पूरा गुरु जो होय लखावै । शब्द निरख परगट दिखलावै ॥ एक बार जिय परचौ पावै । भव जल तरे बार नहिं लावै ॥”
इति श्री शब्दावली खण्ड तीसरा । शुभम् भवति ।
१ सात सुरति । २ चौदह यम । ३ चारबेद । ४ सोरह कला जीवकी । ५ सत्रहत्तत्त्व सूक्ष्म शरीर के
सत्यनाम ।
शब्दावली चौथाखंड
सत्यकवीरकी आगम वाणी ।
अमर लोकसे हम चलि आये, आये जगत मंझारा हो। सही छाप परवाना लाये, समरथके कड़िहारा हो ॥ १ ॥ जीव दुखित देखा भवसागर, ता कारण पगु धारा हो। बंश व्यालिश थाना रोपा, जम्बूदीप मंझारा हो ॥ २ ॥ दस सुकामकी भक्ति दिढाई, चौका पान विस्तारा हो। बारह पंथ चलेगे आगे, घर घर बोध पसारा हो ॥ ३ ॥ गुरु शिष्य तौ लग नहीं उबरे, फिर फिर गर्भ मँझारा हो। बचन वंशके वीरा पावे, तब होवे निस्तारा हो ॥ ४ ॥ तेरहें पीढी ज्ञान रजधानी, चूरामन औतारा हो। उनके अंग छाया नहीं होई, देह विदेह अपारा हो ॥ ५ ॥ उनके आगे जोग मत चलिहै, राजनीति मिट जाई हो। पांच स्वादकी इच्छा नाही, सो गति सब मँहें आई हो ॥ ६ ॥ द्वादश पंथ मिलेंगे आई, छोड़ कपट चतुराई हो। जंबूद्वीप करें कडिहारी, हंस लेहिं सुकताई हो ॥ ७ ॥ पांच हजार पांच सौ बीते, सत्त चाल ठहराई हो। पारस पान जब पुनि ऊगे, जग निंदा मिट जाई हो ॥ ८ ॥ की आपन करनी सो बांचे, की गुरु शरने आई हो। ना गुरु शरन न नामकी करनी, कैसे हंस कहाई हो ॥ ९ ॥ जो लग कौल पूरे नहीं आवे, तौ लग भेद छिपाई हो। दोग्य शिर काटि मिले जो आई, ताको देहु लखाई हो ॥ १० ॥ जो कोइ संत विवेकी होहीं, सुनत मिलेंगे धाई हो। कहे कवीर सुनो धर्मदास, आगम तुम्हें लखाई हो ॥ ११ ॥
शब्दावली ।
(४१३)
राम परबकी रत्नेनी ॥
ऐसा राम जपु मोर भाई । जासे आवागमन मिटाई ॥८०॥ ज्ञानी बहुत कथे जो ज्ञाना । तासो उपजत मन अभिमाना ॥ सब मिलि सुतु रे ज्ञान हमारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१॥ पंडित पठि गुन वेद खुलाना । वेद पढे पुनि भेद न जाना ॥ संज्ञा तरपन अरु आचारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥२॥ सन्यासी आपे भगवाना । अहमेव के गरब खुलाना ॥ धरि धरि अंग लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥३॥ अचारी चौका पाक बनावै । प्रतिमाको ले भोग लगावै ॥ बजावे घंट करै बम- कारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥४॥ जोगी जोग ध्यान तप करई । मन पवना दिठ आसन धरई ॥ कंद मूल खनि करै अहारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥५॥ जैनी जीव दया प्रति पोर । रसना राम नाम नहि उच्चारै ॥ किरतम सो कहै यह करतारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥६॥ यती अपने यतको धावे । काम जीतिके बडा कहावे ॥ हम तो अपना तन मन जारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥७॥ जंगम फिरै लिंग लरकाई । निसि वासर शिवहीं को ध्याई ॥ शिव शिव करत गये जमद्वारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥८॥ मौनी हो मौन गहि रहई । रसना बचन कहै नहि कहई ॥ लहर कोध घट भीतर धारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥९॥ तपसी हो तनकूँ दहई । गृह छाडि बन भीतर रहई ॥ देह अज्ञान लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१०॥ जिन्दा होय जिन्दगी जानै । सतका शब्द हिरदय नहि आनै ॥ होय प्रात तब करै पुकारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥११॥ शेख साहिब नहि पहिचाना । भरि भरि मूठी भांग चवाना ॥
नोट—यह रत्नेनी एकही शब्दावलीमें मिली है, जैसी थी वैसेही यहां रक्खी गयी है, पाठकोंको और कहीं मिले तो शुद्ध करले और मुझे भी सूचित करें तो अगली आवृत्तिमें सुधारको जायगी ।
(४१४)
कवीरपंथी—
धै कुतका करे दम कारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १२ ॥ भक्त होयकर मठी बँधावै । नर नारी सो नेह लगावै ॥ पाछे करै माया विस्ताग । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १३ ॥ किरतनिया जो किरतन करई । करि किरतन भवबिच परई ॥ किरतन करै औ हाथ पसारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १४ ॥ भोपा होय करि संख बजावै । दाढी मूँछा घोंट सुड़ावै ॥ उभा पेटको करत पुकारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १५ ॥ जोत जगावै पाव पुजावै । सती धामको राह बतावै ॥ जीव सतावै करै विभिचारा । रामरहा उनहू ते न्यारा ॥ १६ ॥ सुरा होय सुरापन करई । सेर अन्न कुल कारण मरई ॥ कहा भयो जो धरलिया धारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १७ ॥ दाता दान देह कर भूला । दान देइके मनमें फूला ॥ ऐसा है सत धर्म हमारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १८ ॥ सती होयके सत जो करई । सुरदा संग जीवत मरई ॥ कामस्वाद कियो विभिचारा । रामरहा उनहू ते न्यारा ॥ १९ ॥ भरमत भरमत सब भरमाई । राम भक्ति कोउ विरले पाई ॥ प्रेमभक्ति सब ऊपर राजे । अखण्ड राम तहैं अटल विराजे ॥ २० ॥ ऐसी भक्ति करै जो कोई । सतगुरु शब्दमें रहै समोई ॥ आन शब्दसो रहै निनारा । सो भगता कहिये ततसारा ॥ २१ ॥ कहैं कवीर दिया बतलाई । होती गुप्त परगट दिखलाई ॥ सत्यनाम सुमरे जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ २२ ॥
इति राम परबकी रमनी ॥
निरख परमोधकी रमनी ।
निरगुन दाता हरता करता । सब जग विनसे आपहि रहता ॥ सदा सर्वदा अविचल सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १ ॥ कहा बखानू हूँ गुण तेरा । उस्तुति करत थका मन मेरा ॥ जिह्वा
शब्दावली
(४१५)
ललनी जाने सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ २ ॥ सब घट व्यापक मालिक मौला । को घट काला को घट धौला ॥ पाँच रंगते न्यारा होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ३ ॥ अलख पुरुष जो निरगुन हाका । चलत चलत मेरा मन थाका ॥ निरगुन सरगुन एकै होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ४ ॥ कहा बखानूँ रूप निशानी । ज्यों दरपनमो दरशन जानी ॥ है हजूर दिसै न कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ५ ॥ कथनी कथके कहा बखाना । शबंद सुरतमें एक समाना ॥ शब्द सुरत एकै जब होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ६ ॥ शब्द सुरति अँच्छर बतलावे । अँच्छर संधि लखे सो पावे ॥ अँच्छर संधि लखे जो कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ७ ॥ वस्तु अपार पार नहीं पावे । है नजीक पुनि दिष्टि न आवे ॥ दिष्टि अँदिष्टि मध्य है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ८ ॥ जो भीतर सो बाहर जाना । बाहर भीतर एक समाना ॥ आदि रु अन्त मध्य है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ९ ॥ बावन अक्षर नाम न होई । शब्द सुरति ले रहो समोई ॥ है निजनाम नाम है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १० ॥ उत्तपतका जो करूँ बखाना । परलयका भाषूँ अनुमाना ॥ उत्तपत परलय एकै होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ११ ॥ सूत्रेहिंते सब जग उपराजा । सूत्रेहिं माहिं शब्द पुनि साजा ॥ सूत्र विसूत्र लखे जो कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १२ ॥ पूरन बल सबहिनमें जाना । सो तो पूरन काल समाना ॥ काल अकाल मध्य है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १३ ॥ जहाँ लग दीखे तहाँ लग नाही । जहाँ सूत्र तहाँ सूत्र समाहीं ॥ सतगुरु शब्द लखे जो कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १४ ॥ गुरु गम होय तो चश्महिं पावे । आपामध्ये आपा समावे ॥ आप मध्ये आपु सु सोई ।
१ शब्द. २ अक्षर. ३ नजदीक, निकट. ४ दृष्टि. ५ शून्य. चरम फा० आंख.
(४१६)
कवीरपंथी—
तौलना एक न देना दोई ॥१५॥ अलख पुरुष देखा समदिष्टी । हाथ पसार आवे नहिं सुष्टी ॥ पांच तत्त्वते न्यारा होई । तौलना एक न देना दोई ॥ १६ ॥ पानीसे पतला करि जाना । धूवाँते अति झीन बखाना ॥ मनही आवे मनही जाई । मन ही काल सबनको खाई ॥ मन चंचलही लखे जु कोई । तौलना एक न देना दोई ॥१८॥ मनही जल थल मनहिं अकासा । मनही पांच तत्त्व परकासा ॥ मनको रूप देख नहिं होई । तौलना एक न देना दोई ॥१९॥ ब्रह्मादिक सनकादिक भाई । तेऊ मनके हाथ बिकाई ॥ मन सावज बस करे जु कोई । तौलना एक न देना दोई ॥२०॥ कौन सु सुनिवर मनको मारै । मनको मारि कौनको तारै ॥ उल्टा मने निज मने समोई । तौलना एक न देना दोई ॥२१॥ अगम अगाध वार नहिं पारा । गुरुगम शब्दहिं किया विचारा ॥ कहैं कवीर हम देखा सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ २२ ॥
इति रमैनी निरख परखकी ॥
सत्यनाम ।
॥ अथ शब्द पारखकी रमैनी ॥ ×
सिगी निसदिन अनहद बाजे । सदा रहे उन मुनिके छाजे ॥ सुरति शब्दमें रहे समाई । कहे कवीर गलतान रहाई ॥१॥ बहुत दिवसका सूता जागा । खोलि कपाट नामसो लागा । धन सतगुरु जिन राह बताई । कहैं कवीर सब विपत मिटाई ॥२॥ घटमें भया नामका हेला । मूल गहा जब खेलम खेला । मोह मायाकी काटी फांसी । कहैं कवीर मिटी चौरासी ॥ ३ ॥ स्वामी जो संसारसे न्यारा । सो कहिये साहबका प्यारा । आशा तजिके रहे निरासा ।
× यह शब्द मुझे—सेवक मातादीन कवीर पंथी—करनेलपुरा इन्दौरसे मिला था—जो बहुत पुराना लिखा हुआ है । एकही प्रति होने के कारण ज्यों का त्यों रहने दिया है । पाठक और प्रतिसे मिलानकर सुधार सकते हैं ॥
शब्दावली
(४१७)
कहै कवीर तब देख तमासा ॥ ४ ॥ हाथ ठीकरा गलेमें कंथा । निर्गुन होके यकड़े पंथा । ज्ञान चिरागी घटमें जूपी । कहै कवीर सो सुक्त सहूपी ॥ ५ ॥ फाँटा टूटा कंथा पहिरे । मनसा ममता घटमें गहिरे । ताकी चौकी मान बढाई । कहै कवीर सो दिया उठाई ॥ ६ ॥ मनराजा सरगुनमें भीजे । ज्यों छेरी खटिककी धीजे । निरगुन सेती लाजा मरई । कहैं कवीर जिव कैसे तरई ॥ ७ ॥ फाँसी लिया हाथमें माया । ज्यों बाघिन बकरेको खाया । पल पल सो गँवावे रोई । कहैं कवीर ऐसा दुख होई ॥ ८ ॥ मायाका जोरा है पंदा । यासे डबरा कोइ कोइ बंदा । स्वास उसास सुमिरन लागा । कहैं कवीर विषय सब भागा ॥ ९ ॥ जैसे सरपिनि किया कुँडाला । कोइ बन्धा कोई दीया टाला । कहैं कवीर कुडाला पेलै । निर्भय होय जगतमें खेलै ॥ १० ॥ यह संसार कुँडाला माहीं । जाको सरपिनि धर धर खाहीं । कहै कवीर कोइ बाहर आवे । ताको माया नाहि सतावे ॥ ११ ॥ व्यवहार करै औ ऊंचा बोले । निसि दिन फूला फूला ढोलै ॥ माँग तांग कर करै रसोई । कहैं कवीर नफा नहिं काई ॥ १२ ॥ बहुत जतन करि जगत परमोघे । अपने घटको नाहीं सोघे । अंधा शब्द करै नहिं परिचय । कहै कवि ब्रह्म कैसे दरसे ॥ १३ ॥ दुनिया सेती बक बक सूवा । ज्यों नलनीने पकरचो सूवा । ऊपर पाँव तले भइ मूड़ी । कहै कवीर संसारी बूड़ी ॥ १४ ॥ रात दिवस कर ज्ञान पुकारे । मन इन्द्रीको नाहीं मारे । कहैं कवीर सुनो नर लोई । कागा हँसा कैसे होई ॥ १५ ॥ कठिन धारना हंसकी भाई । ज्यों नटनी कर वरत चढाई । चढै बरत वह तन मन साधै । कहैं कवीर वहि कला अगाधै ॥ १६ ॥ सुरत निरत सो नटनी खेलै । तन संभालि आगे पग मेलै । ऐसी धरन नाम जेहि आवे । कहैं कवीर सो हंस कहावे
कवीरपंथी- शब्दावली १४
(४१८)
कवीरपंथी—
॥१७॥ अन्तर लागी करमकी टाटी । दशो दिशा सुरत जो फाटी । धोखा चिन्तामें दिन बीता । कहैं कवीर यों रहिगा रीता ॥१८॥ जाग शिताबी अब का सोवे । टाला-टूलीमें दिन खोवे । छाड़ि अनेक एकको धावे । कहैं कवीर निर्भय होय जावे ॥१९॥ बाँका गढको बेगइ लीजे । पीछे नहीं पयाना कीजे । सन्मुख जूझे सोई सुरा । कहैं कवीर साहेबका पूरा ॥२०॥ आठपहर जो मान पुकारे । घटका बैरी चुनचुन मारे । अगम पंथका नाम बोहारे । कहैं कवीर नहि जमके सारे ॥२१॥ हिंदू तुरुक दोऊ सो न्यारा । मुखसो बचन कहे नहि खारा । राह ऊजडकी लीजे भाई । कहैं कवीर झांखा नहि खाई ॥२२॥ छन्द व्याधिसो न्यारा रहना । निशिदिन साहिबसाहिब कहना । कहैं कवीर समझकर देखो । आन बसी सो नाहि न लेखो ॥२३॥ सार शब्दका थाला झेलै । निर्भय होय जगतमें खेलै ॥ कहैं कवीर क्या संशय कीया । नाम पियाला भरभर पीया ॥२४॥ शून्य मँडलमें तारी लागी । सूती सुरति भडक दै जागी ॥ कहैं कवीर पियासो लागी । मनकी दुविधा तबहीं आगी ॥२५॥
सा०-डोरी लागी डर मिटा, सुरत रही गरनाय । सुरत सुहागिन हो रही, पर घर परत न जाय ॥
इति श्री शब्द पारखा सम्पूर्ण ।
सत्यनाम ।
॥ सर्वांगवत्तीसी रमैनी ॥
काबी कौन ?
सोइ काजी जो होय समाना । दिल दरिआवमें रहे समाना ॥ परम जोतिपर आसन करई । सो काजी भवसागर तरई ॥१॥