भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(३९९)

माया मंत्रादिक सब काम ॥ ये सब अक्षर संधिक है। जेहिमाँ निशिवासर जिव रहै ॥ निरगुण अलख अकह निर्वाण। मनुबुधि इन्द्रिय जाय न जान ॥ विधि निशेष जहाँ बँनत न दोय। कहैं कवीर पद झाँई सोय ॥

प्रथमें झाँई झाँकते, पैठा संधिक काल।

पुनि झाँईकी झाँई रही, गुरु विन सकेको टाल ॥ ३ ॥

प्रथमही संभर्वे शब्द अमान। शैबंदी शब्द कियो अनुमान ॥ मान महातम मान झुलान। मानत मानत बावन ठान ॥ फेरा फिरत भयो भ्रमजाल। देहादिक जग भये विशाल ॥ देह भई ते देहिक होय। जगत भई ते कर्ता कोय ॥ कर्ता कौरण कर्महि लाग। घर घर लोग कियो अनुराग ॥ 'छौ दृशन वर्णाश्रमचौर। नौ' छौ भये पाखंड बिकार ॥ कोई त्योंगी अँतुरागी कोय। विधि निषेधमा बैधिया दोय ॥ कल्पेउ ग्रंथ पुराण अनेक। भरमि रहै सब बिना विवेक ॥

भरमि रहा सब शब्दमें, शबदी शब्द न जान।

गुरुकृपा निज परखवल, परखो धोखा ज्ञान ॥ ४ ॥

धोखा प्रथम परखिये भाई। नाम जाति कुल कर्म बड़ाई ॥ शि'ति जल पाँवक मरूँत अकँाश। तामहँ पंच विषय परकाश ॥ तत्व पाँचमें श्वासासार। प्राण अपान समान उँदार ॥ और ब्यान बावन संचार। निज निज थैल निज कारजकार ॥ इंगला पिंगला

२३ जगत्को निषेधकर और ब्रह्माका प्रतिपादन करना यह है स्त्री जिसकी। २४ होता श्वा। २५ शब्दका मालिक शब्द कहने वाला। २६ हेतु २७ योगी जंगम १ सेवदा ४ संन्यासी। ५ बँवस। ६ छठा कहिये ब्राह्मण छः घर छ' है उपदेश। २८ ब्राह्मण १ क्षत्री। २ वैश्य, ३ शूद्र ४ वर्ण और ब्रह्मचर्य १ गृहस्थ २ वानप्रस्थ ३ संन्यास ४ आश्रम। (२९-(१६) छपानवे पाखण्ड ३१ विरक्त। ३२ गृहस्थ। ३३ पृथ्वी। ३४ अनि। ३५ वायु। ३६ शब्द आकाशका विषय, स्पर्श वायुका, रूप अनिका, रस जलका, गन्ध पृथ्वीका ३७ उवास। ३८ स्थान।