भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

औ सुखमनी । इकइस सहस्र छौसत सोगनी ॥ निर्गैम अँगम सो सदा बवावे । आसासार सरोदा गावे ॥

धोखा अँधेरी पायके, या विधि भया शरीर ।

कल्पेउ करता एक पुनि, बढी कर्मकी पीरें ॥ ६ ॥

योग जप तप ध्यान अलेख । तीरथ फिरत धरे बहु भेख ॥ योगी जंगम सिद्ध उदास । घरको त्यागि फिरे बनवास ॥ कन्द मूँल फँल करत अहार । कोइ कोइ जटा धरे शिरभार ॥ मन मलीन सुख लाये धूर । आगे पीछे अग्नि औ सूर ॥ नग्र होय नर खौरि न फिरे । पीतर पाथरमें शिर धरे ॥

काल शब्दके शोरते, “होर परी संसार ।

देखा देखी भागिया, कोई न करे विचार ॥ ६ ॥

जब पुँनि आय खसी यह बँनि । तब पुनि चित्तमा कियो अनुमानि ॥ महीं ब्रह्म कर्ता जग केर । परे सो जाल जगतके फेर ॥ पाँचें तीन गुण जग उपजाया । सो माया मैं ब्रह्मनिकाया ॥ उपजे खपे जग विस्तारा । है साक्षी सब जाननिहारा ॥ मो कहँ जानि सके नहिं कोय । जोपै विधि हरिशंकर होय ॥ अस सन्धिककी परी विकार । विलु गुरु कृपा न होय उबार ॥ मगन ब्रह्म सन्धिकके ज्ञान । अस जानि अब भया भ्रमहान ॥

“संधी शब्द है भ्रममा, भूलि रहा किताँ लोग ।

परखेउ धोखा भेवैं नहिं, अंत होत बड़ “सोग ॥ ७ ॥

जो कोइ संधिक धोखा जान । सो पुनि उलटि कियो अनुमान ॥ मन बुधि इन्द्रिय जाय न जान । निरबँचनी सो सदा अमान ॥

३९ वेद. ४० शास्त्र. ४१ अविद्या अज्ञानता. ४२ दुःख. ४३ जो पृथ्वीके नोवैं है जैसे जाल शकरकंड केतउर फर इत्यादि. ४४ जो मूलसे होता है अर्थात् काठ फोड़ कर जो निकलता है जैसे कटहल, गूलर इत्यादि. ४५ जो. फूलसे पैदा होता है जैसे आम, (केरो) अमरुद (आमफल) इत्यादि. ४६ सूर्य. ४७ गलीगली ४८ शोर हल्का. ४९ फिर. ५० शब्द. ५१ पांचतत्व ॥ ५२ देखो रमैनी ३ । १० इत्यादि. ५३ कहा. ५४ भेद. ५५ शोकदुःख. ५६ कहनेमें जो नहीं आवे.