कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
लौय । बाँचा चहै गहै पुनि सोय ॥ दृढ विश्वास भँरोसा राम । कबहुँ तो वे आवैँ काम ॥ विषयैँ विकार माँझ संग्राम । राम खटोला किया अराम ॥ घायल बिना तीर तरवार । सोइ अँभरण रीझे भरतार ॥ कामिनी पहिर पियासों राँचा । कहै कविर भवबूडतें बाँची ॥ भव बूडत बेडों भगवान । चढे धाये लागीलौज्ञान ॥ थाह न पावे कहे अथाह । डोलत करत तराहि तराह ॥ सूझ परे नहिं वार न पार । कहे अपार रहै मँझधँार ॥ माँझधारमें किया विवेक । कहाँके दूजा कहींके एक ॥ बेरा आपु आपु भवधार । आपै उतरन चाहे पार ॥ बिन जाने जाने है और । आपै राम रमै सब ठौर ॥ वार पार ना जाने जोर । कहै कवीर पार है ठौर ॥ २४ ॥ अक्षर खानी अक्षर वाणी । अक्षरते अक्षर उत्पानी ॥ अक्षर करता आदि प्रकाश । ताते अक्षर जगत विलास ॥ अक्षर ब्रह्मा विष्णु महेश । अक्षर रज सत तम उपदेश ॥ क्षिति जल पावक मरुत अकाश । ये सब अक्षरमो परकाश ॥ दश औतार सो अक्षर माया । अक्षर निर्गुण ब्रह्मनिकाया ॥ अक्षर काल संधि अरु झाँई । अक्षर 'दैहिने अक्षर 'बाँई ॥ अक्षर आगे करे पुकार । अँटके नर नहिं उतरे पार ॥ गुरुकृपा निजैँ उद्वैय विचार । जानि परी तव गुरुमत सार ॥
ओसको जहँ लेश नहीं, बूझे सकल जहान ।
गुरु कृपा निज परख बल, तब ताको पहिचान ॥ २७ ॥ रमैनी-अक्षर काया अक्षर माया । अक्षर सतगुरु भेद बताया ॥ अक्षर यन्त्र मन्त्र अरु पूजा । अक्षर ध्यान घरावत दूजा ॥ अक्षर पटि २ जगत भुलान । अक्षर विनु नहिं पावै ज्ञान ॥ विन अक्षर
१५२ आशा १५३ श्लोक, एंव. १५४ गहना १५५ लगी. १५६ गुरु. १५७ नाव किरती. १५८ बीच धारने. १५९ दक्षिण पंथ १६० बाममार्ग. १६१ अपना. १६२ प्रकाश.