भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४०७)

उपजे खँपे तेहि माहि समाइ ॥ निज झाँई जो जानी जाय । सोच मोह संदेह नशाय ॥ अनजानेको एही रीति । नाना भांति करे परतीति ॥ सकल जगत जाल अरुझान । बिरला और कियो अनुमान ॥ कर्ता ब्रह्म भजे दुख जाय । कोई आपै आप कहाय ॥ पूरण संभव दूसर नाहिं । बंधन मोक्ष न एको आहि ॥ फल आश्रित स्वर्गदिके भोग । कर्म सुकर्म लहे संयोग ॥ करमहीन वँना भगवान । सँत कुँसँत लियो पहिचान ॥ भांतिन भांतिन पहिरे चीर । युग २ नाचे दास कँवीर ॥

भासे जीवरूप सो एक । तेही भास के रूप अनेक ॥ कोई मँगैन रूप लौलीन । कोई अँरूप ईश्वरमन दीन ॥ कोई कर्महँप है सोय । शब्द निरूपै न करे पुनि कोय ॥ सँमय रूप कोई भगवान । कर्ता न्यारा कोई अनुमान ॥ कोई कहे ईश्वर ज्योतिहि जान । आतमको कोई स्वतः बखान ॥ कोई कहै सबपुँनी सबते न्यार । आपै राम विश्व विस्तार ॥

शब्द भाँव कोई अनुमान । अद्वै रूप भँई पहिचान ॥ दुर्गदुर्ग रही को बोले बात । बोलतही सब तत्व नशात ॥ बोल अँबोल लखे पुनि कोय । भास जीव नहिं परखै सोय ॥

निज अँध्यास झाँई अहै, सो संधिक भौमास ।

प्रथम अनुहारा कल्पना, सदा करे परकास ॥ २६ ॥

लख चौरासा योनि जेते । देही बुद्धि जानिये तेते ॥ जहँ जेहि भास सोई २ रूप । निश्चै किया परा भवकूप ॥ नाना भांति विषय रस लीन । अरुझि २ जिव मिथ्या दीन ॥ दाँवाँ विषयै जरे सब

१३१ नाश होता है १३२ बंध. १३३ भला. १३४ बुरा, १३५ भक्त लोग. १३६ सगुण उपासक. १३७ निगुण उपासक. १३८ पूर्व मोमासक. १३९ व्याकरण. १४० वैशेषिक. (काल जावी.) १४१ तर्क-जावी नैयायक. १४२ योगी (पातांजल) १४३ सांख्यवादी १४४ वेदांती. १४५ बोलता. १४६ हुई. १४७ शंका. १४८ विज्ञानी. १४९ कल्पना. १५० उसके बुद्धि का जो विषय. १५१ अनित.