भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

जतन भये निज अर्थको, जेहि छूटे दुखंभ्रँरि ।

धूर परी जब आंखमें, सूझे किमि निजमूरि ॥ २३ ॥

पांजी परख जबै फरि आवै । तुरतहि सबै विकार नशावै ॥ शब्द सुधारिके रहे अकरम । स्वाती भक्तिके खोटे भरम ॥ काल जाल जो लखि नहिं आवै । तौलौ निज पद नहीं पावै ॥ झाईं संधि काल पहिचान । सार झाब्द विनु गुरु नहिं जान ॥ परखे रूप अवस्था जाय । आन विचार न ताहि समाय ॥ झाईं शब्द ले परखे जोय । संशय वाके रहे न कोय ॥

धन्य धन्य तारण तरण, जिन परखा संसार ।

वंदीछोर कवीरसों, परगट गुरु विचार ॥२४॥

शब्द संधि ले ज्ञानी मूढ । देह करम जगत आरूढ ॥ नौंद संधिलै सपना होय । झाईं शून्य सुषोपति सोय ॥ ज्ञानप्रकाशक साक्षी संधि । तुरियातीत अभास अबंधि ॥ झाईं ले वरते वर्तमान । सो जो तहां परे पहिचान ॥ काल अस्थितिके भास नशाय । परख प्रकाश लक्ष बिलगाय ॥ बिलगे लक्ष अँपैनपौ जान । आपु अपनपौ भेद न आन ॥

आप अपनपौ भेद विनु, उलटि पलटि अरूझाय ।

गुरु बिन मिटे न दुगदुगी, अनवनि यतन नशाय ॥२५॥

निज प्रकाश झाईं जो जान । महा संधिमाकाश बखान ॥ सोईं पांजी ले बुद्धि विशेष । प्रकाशक तुरियातीत अरू शेष ॥ विविध भावना बुद्धि अँतुरूप । विद्यामाया सोईं स्वरूप ॥ सो संकल्प बसे जिव आप । फुँरी अविद्या बहु संताप ॥ त्रीगुण पांच तत्व विस्तार । तीन लोक तेहिके मंझार ॥ अँदबुद कला बरनि नहिं जाइ ।

१२३ ढेर, लम्हूह. १२४ वंदांत. १२५ अंतरका जो शब्द १२६ बाव, अपना स्वरूप. १२७ खाता-बही. १२८ अनुसार मुताबिक १२९ स्फुर्ण हुआ. १३० नाना रंगका आश्चर्यमय.