कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 427, कुल 968 में से
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राम परबकी रत्नेनी ॥
ऐसा राम जपु मोर भाई । जासे आवागमन मिटाई ॥८०॥ ज्ञानी बहुत कथे जो ज्ञाना । तासो उपजत मन अभिमाना ॥ सब मिलि सुतु रे ज्ञान हमारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१॥ पंडित पठि गुन वेद खुलाना । वेद पढे पुनि भेद न जाना ॥ संज्ञा तरपन अरु आचारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥२॥ सन्यासी आपे भगवाना । अहमेव के गरब खुलाना ॥ धरि धरि अंग लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥३॥ अचारी चौका पाक बनावै । प्रतिमाको ले भोग लगावै ॥ बजावे घंट करै बम- कारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥४॥ जोगी जोग ध्यान तप करई । मन पवना दिठ आसन धरई ॥ कंद मूल खनि करै अहारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥५॥ जैनी जीव दया प्रति पोर । रसना राम नाम नहि उच्चारै ॥ किरतम सो कहै यह करतारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥६॥ यती अपने यतको धावे । काम जीतिके बडा कहावे ॥ हम तो अपना तन मन जारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥७॥ जंगम फिरै लिंग लरकाई । निसि वासर शिवहीं को ध्याई ॥ शिव शिव करत गये जमद्वारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥८॥ मौनी हो मौन गहि रहई । रसना बचन कहै नहि कहई ॥ लहर कोध घट भीतर धारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥९॥ तपसी हो तनकूँ दहई । गृह छाडि बन भीतर रहई ॥ देह अज्ञान लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१०॥ जिन्दा होय जिन्दगी जानै । सतका शब्द हिरदय नहि आनै ॥ होय प्रात तब करै पुकारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥११॥ शेख साहिब नहि पहिचाना । भरि भरि मूठी भांग चवाना ॥
नोट—यह रत्नेनी एकही शब्दावलीमें मिली है, जैसी थी वैसेही यहां रक्खी गयी है, पाठकोंको और कहीं मिले तो शुद्ध करले और मुझे भी सूचित करें तो अगली आवृत्तिमें सुधारको जायगी ।