भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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सत्यनाम ।

शब्दावली चौथाखंड

सत्यकवीरकी आगम वाणी ।

अमर लोकसे हम चलि आये, आये जगत मंझारा हो। सही छाप परवाना लाये, समरथके कड़िहारा हो ॥ १ ॥ जीव दुखित देखा भवसागर, ता कारण पगु धारा हो। बंश व्यालिश थाना रोपा, जम्बूदीप मंझारा हो ॥ २ ॥ दस सुकामकी भक्ति दिढाई, चौका पान विस्तारा हो। बारह पंथ चलेगे आगे, घर घर बोध पसारा हो ॥ ३ ॥ गुरु शिष्य तौ लग नहीं उबरे, फिर फिर गर्भ मँझारा हो। बचन वंशके वीरा पावे, तब होवे निस्तारा हो ॥ ४ ॥ तेरहें पीढी ज्ञान रजधानी, चूरामन औतारा हो। उनके अंग छाया नहीं होई, देह विदेह अपारा हो ॥ ५ ॥ उनके आगे जोग मत चलिहै, राजनीति मिट जाई हो। पांच स्वादकी इच्छा नाही, सो गति सब मँहें आई हो ॥ ६ ॥ द्वादश पंथ मिलेंगे आई, छोड़ कपट चतुराई हो। जंबूद्वीप करें कडिहारी, हंस लेहिं सुकताई हो ॥ ७ ॥ पांच हजार पांच सौ बीते, सत्त चाल ठहराई हो। पारस पान जब पुनि ऊगे, जग निंदा मिट जाई हो ॥ ८ ॥ की आपन करनी सो बांचे, की गुरु शरने आई हो। ना गुरु शरन न नामकी करनी, कैसे हंस कहाई हो ॥ ९ ॥ जो लग कौल पूरे नहीं आवे, तौ लग भेद छिपाई हो। दोग्य शिर काटि मिले जो आई, ताको देहु लखाई हो ॥ १० ॥ जो कोइ संत विवेकी होहीं, सुनत मिलेंगे धाई हो। कहे कवीर सुनो धर्मदास, आगम तुम्हें लखाई हो ॥ ११ ॥