कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 968 में से
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सिधार्द्ध ॥ सांत शिकारी चौदह पारथ भिन्न भिन्न निरतावै । चारिअंश जिन समुझि बिचारी सो जीवन सुकतावै ॥ चौदह लोक बसे यम चौदह तहै लग काल पसारा । ताके आगे ज्योतिनिरंजन बैठे सुत्र मझारा ॥ सोरह खंड अक्षर भगवाना जिन यह सृष्टि उपाई । अक्षर कला सृष्टिसे उपजी उन्ही माहैं समाई ॥ सत्रह संख्य पर अधरदीप जहैं शब्दातीत विराजै । निरतै सखी बहु विधि शोभा अनहद बाजा बाजै ॥ ताके ऊपर परमधाम है मरम न कोई पाया । जो हम कही नहीं कोउ माने ना कोइ दूसर आया ॥ वेद न साखी सब जित अरुझे परमधाम ठहराया । फिरि फिरि भटकै आप चतुर है वह घर काहु न पाया ॥ जो कोइ होइ सत्यका किनका सो हमका पतिआई । और न मिलै कोटि कर थाके बहुरि कालघर जाई ॥ सोरह संख्यके आगे समर्थ जिन जग मोहिं पठवाया । कहै कवीर आदिकी बाणी वेद भेद नहि पाया”
कडिहार भेदका शब्द ।
“दशौ दिशा कर मेटौ धोखा । सो कडिहार बैठही चोखा ॥ दशौ दिशा कर लेखा जाने । सो कडिहार आरती ठानै ॥ दश इंद्रीकै पारिख पावै । सो कडिहार आरती गावै ॥ जो नहि जाने एतिक साजै । चौका युक्ति करै कयहि काजै ॥ इस कारण करहिं गुरुआई । बिगैर ज्ञान जो पंथ पराई ॥ पद साखी अरु ग्रंथ हटावै । बिन परख न उत्तम घर पावै ॥ शब्द साखी सिखि पारस करहीं । होय भूत पुनि नरकहिं परहीं ॥ विना भेद कडिहार कहावै । आगिल जन्म श्वानको पावै ॥ पद साखी नहिं करहिं विचारा । भूँकि भूँकि जस मरे सियारा ॥ पद साखी है भेद हमारा । जो बूझैं सो उतरहिं पारा ॥ जब लग पूरा गुरु न पावै । तब लग भवजल फिरि फिरि आवै ॥ पूरा गुरु जो होय लखावै । शब्द निरख परगट दिखलावै ॥ एक बार जिय परचौ पावै । भव जल तरे बार नहिं लावै ॥”
इति श्री शब्दावली खण्ड तीसरा । शुभम् भवति ।
१ सात सुरति । २ चौदह यम । ३ चारबेद । ४ सोरह कला जीवकी । ५ सत्रहत्तत्त्व सूक्ष्म शरीर के