कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(४११)
सिधार्द्ध ॥ सांत शिकारी चौदह पारथ भिन्न भिन्न निरतावै । चारिअंश जिन समुझि बिचारी सो जीवन सुकतावै ॥ चौदह लोक बसे यम चौदह तहै लग काल पसारा । ताके आगे ज्योतिनिरंजन बैठे सुत्र मझारा ॥ सोरह खंड अक्षर भगवाना जिन यह सृष्टि उपाई । अक्षर कला सृष्टिसे उपजी उन्ही माहैं समाई ॥ सत्रह संख्य पर अधरदीप जहैं शब्दातीत विराजै । निरतै सखी बहु विधि शोभा अनहद बाजा बाजै ॥ ताके ऊपर परमधाम है मरम न कोई पाया । जो हम कही नहीं कोउ माने ना कोइ दूसर आया ॥ वेद न साखी सब जित अरुझे परमधाम ठहराया । फिरि फिरि भटकै आप चतुर है वह घर काहु न पाया ॥ जो कोइ होइ सत्यका किनका सो हमका पतिआई । और न मिलै कोटि कर थाके बहुरि कालघर जाई ॥ सोरह संख्यके आगे समर्थ जिन जग मोहिं पठवाया । कहै कवीर आदिकी बाणी वेद भेद नहि पाया”
कडिहार भेदका शब्द ।
“दशौ दिशा कर मेटौ धोखा । सो कडिहार बैठही चोखा ॥ दशौ दिशा कर लेखा जाने । सो कडिहार आरती ठानै ॥ दश इंद्रीकै पारिख पावै । सो कडिहार आरती गावै ॥ जो नहि जाने एतिक साजै । चौका युक्ति करै कयहि काजै ॥ इस कारण करहिं गुरुआई । बिगैर ज्ञान जो पंथ पराई ॥ पद साखी अरु ग्रंथ हटावै । बिन परख न उत्तम घर पावै ॥ शब्द साखी सिखि पारस करहीं । होय भूत पुनि नरकहिं परहीं ॥ विना भेद कडिहार कहावै । आगिल जन्म श्वानको पावै ॥ पद साखी नहिं करहिं विचारा । भूँकि भूँकि जस मरे सियारा ॥ पद साखी है भेद हमारा । जो बूझैं सो उतरहिं पारा ॥ जब लग पूरा गुरु न पावै । तब लग भवजल फिरि फिरि आवै ॥ पूरा गुरु जो होय लखावै । शब्द निरख परगट दिखलावै ॥ एक बार जिय परचौ पावै । भव जल तरे बार नहिं लावै ॥”
इति श्री शब्दावली खण्ड तीसरा । शुभम् भवति ।
१ सात सुरति । २ चौदह यम । ३ चारबेद । ४ सोरह कला जीवकी । ५ सत्रहत्तत्त्व सूक्ष्म शरीर के
सत्यनाम ।
शब्दावली चौथाखंड
सत्यकवीरकी आगम वाणी ।
अमर लोकसे हम चलि आये, आये जगत मंझारा हो। सही छाप परवाना लाये, समरथके कड़िहारा हो ॥ १ ॥ जीव दुखित देखा भवसागर, ता कारण पगु धारा हो। बंश व्यालिश थाना रोपा, जम्बूदीप मंझारा हो ॥ २ ॥ दस सुकामकी भक्ति दिढाई, चौका पान विस्तारा हो। बारह पंथ चलेगे आगे, घर घर बोध पसारा हो ॥ ३ ॥ गुरु शिष्य तौ लग नहीं उबरे, फिर फिर गर्भ मँझारा हो। बचन वंशके वीरा पावे, तब होवे निस्तारा हो ॥ ४ ॥ तेरहें पीढी ज्ञान रजधानी, चूरामन औतारा हो। उनके अंग छाया नहीं होई, देह विदेह अपारा हो ॥ ५ ॥ उनके आगे जोग मत चलिहै, राजनीति मिट जाई हो। पांच स्वादकी इच्छा नाही, सो गति सब मँहें आई हो ॥ ६ ॥ द्वादश पंथ मिलेंगे आई, छोड़ कपट चतुराई हो। जंबूद्वीप करें कडिहारी, हंस लेहिं सुकताई हो ॥ ७ ॥ पांच हजार पांच सौ बीते, सत्त चाल ठहराई हो। पारस पान जब पुनि ऊगे, जग निंदा मिट जाई हो ॥ ८ ॥ की आपन करनी सो बांचे, की गुरु शरने आई हो। ना गुरु शरन न नामकी करनी, कैसे हंस कहाई हो ॥ ९ ॥ जो लग कौल पूरे नहीं आवे, तौ लग भेद छिपाई हो। दोग्य शिर काटि मिले जो आई, ताको देहु लखाई हो ॥ १० ॥ जो कोइ संत विवेकी होहीं, सुनत मिलेंगे धाई हो। कहे कवीर सुनो धर्मदास, आगम तुम्हें लखाई हो ॥ ११ ॥
शब्दावली ।
(४१३)
राम परबकी रत्नेनी ॥
ऐसा राम जपु मोर भाई । जासे आवागमन मिटाई ॥८०॥ ज्ञानी बहुत कथे जो ज्ञाना । तासो उपजत मन अभिमाना ॥ सब मिलि सुतु रे ज्ञान हमारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१॥ पंडित पठि गुन वेद खुलाना । वेद पढे पुनि भेद न जाना ॥ संज्ञा तरपन अरु आचारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥२॥ सन्यासी आपे भगवाना । अहमेव के गरब खुलाना ॥ धरि धरि अंग लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥३॥ अचारी चौका पाक बनावै । प्रतिमाको ले भोग लगावै ॥ बजावे घंट करै बम- कारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥४॥ जोगी जोग ध्यान तप करई । मन पवना दिठ आसन धरई ॥ कंद मूल खनि करै अहारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥५॥ जैनी जीव दया प्रति पोर । रसना राम नाम नहि उच्चारै ॥ किरतम सो कहै यह करतारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥६॥ यती अपने यतको धावे । काम जीतिके बडा कहावे ॥ हम तो अपना तन मन जारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥७॥ जंगम फिरै लिंग लरकाई । निसि वासर शिवहीं को ध्याई ॥ शिव शिव करत गये जमद्वारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥८॥ मौनी हो मौन गहि रहई । रसना बचन कहै नहि कहई ॥ लहर कोध घट भीतर धारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥९॥ तपसी हो तनकूँ दहई । गृह छाडि बन भीतर रहई ॥ देह अज्ञान लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१०॥ जिन्दा होय जिन्दगी जानै । सतका शब्द हिरदय नहि आनै ॥ होय प्रात तब करै पुकारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥११॥ शेख साहिब नहि पहिचाना । भरि भरि मूठी भांग चवाना ॥
नोट—यह रत्नेनी एकही शब्दावलीमें मिली है, जैसी थी वैसेही यहां रक्खी गयी है, पाठकोंको और कहीं मिले तो शुद्ध करले और मुझे भी सूचित करें तो अगली आवृत्तिमें सुधारको जायगी ।
(४१४)
कवीरपंथी—
धै कुतका करे दम कारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १२ ॥ भक्त होयकर मठी बँधावै । नर नारी सो नेह लगावै ॥ पाछे करै माया विस्ताग । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १३ ॥ किरतनिया जो किरतन करई । करि किरतन भवबिच परई ॥ किरतन करै औ हाथ पसारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १४ ॥ भोपा होय करि संख बजावै । दाढी मूँछा घोंट सुड़ावै ॥ उभा पेटको करत पुकारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १५ ॥ जोत जगावै पाव पुजावै । सती धामको राह बतावै ॥ जीव सतावै करै विभिचारा । रामरहा उनहू ते न्यारा ॥ १६ ॥ सुरा होय सुरापन करई । सेर अन्न कुल कारण मरई ॥ कहा भयो जो धरलिया धारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १७ ॥ दाता दान देह कर भूला । दान देइके मनमें फूला ॥ ऐसा है सत धर्म हमारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १८ ॥ सती होयके सत जो करई । सुरदा संग जीवत मरई ॥ कामस्वाद कियो विभिचारा । रामरहा उनहू ते न्यारा ॥ १९ ॥ भरमत भरमत सब भरमाई । राम भक्ति कोउ विरले पाई ॥ प्रेमभक्ति सब ऊपर राजे । अखण्ड राम तहैं अटल विराजे ॥ २० ॥ ऐसी भक्ति करै जो कोई । सतगुरु शब्दमें रहै समोई ॥ आन शब्दसो रहै निनारा । सो भगता कहिये ततसारा ॥ २१ ॥ कहैं कवीर दिया बतलाई । होती गुप्त परगट दिखलाई ॥ सत्यनाम सुमरे जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ २२ ॥
इति राम परबकी रमनी ॥
निरख परमोधकी रमनी ।
निरगुन दाता हरता करता । सब जग विनसे आपहि रहता ॥ सदा सर्वदा अविचल सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १ ॥ कहा बखानू हूँ गुण तेरा । उस्तुति करत थका मन मेरा ॥ जिह्वा
शब्दावली
(४१५)
ललनी जाने सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ २ ॥ सब घट व्यापक मालिक मौला । को घट काला को घट धौला ॥ पाँच रंगते न्यारा होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ३ ॥ अलख पुरुष जो निरगुन हाका । चलत चलत मेरा मन थाका ॥ निरगुन सरगुन एकै होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ४ ॥ कहा बखानूँ रूप निशानी । ज्यों दरपनमो दरशन जानी ॥ है हजूर दिसै न कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ५ ॥ कथनी कथके कहा बखाना । शबंद सुरतमें एक समाना ॥ शब्द सुरत एकै जब होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ६ ॥ शब्द सुरति अँच्छर बतलावे । अँच्छर संधि लखे सो पावे ॥ अँच्छर संधि लखे जो कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ७ ॥ वस्तु अपार पार नहीं पावे । है नजीक पुनि दिष्टि न आवे ॥ दिष्टि अँदिष्टि मध्य है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ८ ॥ जो भीतर सो बाहर जाना । बाहर भीतर एक समाना ॥ आदि रु अन्त मध्य है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ ९ ॥ बावन अक्षर नाम न होई । शब्द सुरति ले रहो समोई ॥ है निजनाम नाम है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १० ॥ उत्तपतका जो करूँ बखाना । परलयका भाषूँ अनुमाना ॥ उत्तपत परलय एकै होई । तौलना एक न देना दोई ॥ ११ ॥ सूत्रेहिंते सब जग उपराजा । सूत्रेहिं माहिं शब्द पुनि साजा ॥ सूत्र विसूत्र लखे जो कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १२ ॥ पूरन बल सबहिनमें जाना । सो तो पूरन काल समाना ॥ काल अकाल मध्य है सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १३ ॥ जहाँ लग दीखे तहाँ लग नाही । जहाँ सूत्र तहाँ सूत्र समाहीं ॥ सतगुरु शब्द लखे जो कोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १४ ॥ गुरु गम होय तो चश्महिं पावे । आपामध्ये आपा समावे ॥ आप मध्ये आपु सु सोई ।
१ शब्द. २ अक्षर. ३ नजदीक, निकट. ४ दृष्टि. ५ शून्य. चरम फा० आंख.
(४१६)
कवीरपंथी—
तौलना एक न देना दोई ॥१५॥ अलख पुरुष देखा समदिष्टी । हाथ पसार आवे नहिं सुष्टी ॥ पांच तत्त्वते न्यारा होई । तौलना एक न देना दोई ॥ १६ ॥ पानीसे पतला करि जाना । धूवाँते अति झीन बखाना ॥ मनही आवे मनही जाई । मन ही काल सबनको खाई ॥ मन चंचलही लखे जु कोई । तौलना एक न देना दोई ॥१८॥ मनही जल थल मनहिं अकासा । मनही पांच तत्त्व परकासा ॥ मनको रूप देख नहिं होई । तौलना एक न देना दोई ॥१९॥ ब्रह्मादिक सनकादिक भाई । तेऊ मनके हाथ बिकाई ॥ मन सावज बस करे जु कोई । तौलना एक न देना दोई ॥२०॥ कौन सु सुनिवर मनको मारै । मनको मारि कौनको तारै ॥ उल्टा मने निज मने समोई । तौलना एक न देना दोई ॥२१॥ अगम अगाध वार नहिं पारा । गुरुगम शब्दहिं किया विचारा ॥ कहैं कवीर हम देखा सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ २२ ॥
इति रमैनी निरख परखकी ॥
सत्यनाम ।
॥ अथ शब्द पारखकी रमैनी ॥ ×
सिगी निसदिन अनहद बाजे । सदा रहे उन मुनिके छाजे ॥ सुरति शब्दमें रहे समाई । कहे कवीर गलतान रहाई ॥१॥ बहुत दिवसका सूता जागा । खोलि कपाट नामसो लागा । धन सतगुरु जिन राह बताई । कहैं कवीर सब विपत मिटाई ॥२॥ घटमें भया नामका हेला । मूल गहा जब खेलम खेला । मोह मायाकी काटी फांसी । कहैं कवीर मिटी चौरासी ॥ ३ ॥ स्वामी जो संसारसे न्यारा । सो कहिये साहबका प्यारा । आशा तजिके रहे निरासा ।
× यह शब्द मुझे—सेवक मातादीन कवीर पंथी—करनेलपुरा इन्दौरसे मिला था—जो बहुत पुराना लिखा हुआ है । एकही प्रति होने के कारण ज्यों का त्यों रहने दिया है । पाठक और प्रतिसे मिलानकर सुधार सकते हैं ॥
शब्दावली
(४१७)
कहै कवीर तब देख तमासा ॥ ४ ॥ हाथ ठीकरा गलेमें कंथा । निर्गुन होके यकड़े पंथा । ज्ञान चिरागी घटमें जूपी । कहै कवीर सो सुक्त सहूपी ॥ ५ ॥ फाँटा टूटा कंथा पहिरे । मनसा ममता घटमें गहिरे । ताकी चौकी मान बढाई । कहै कवीर सो दिया उठाई ॥ ६ ॥ मनराजा सरगुनमें भीजे । ज्यों छेरी खटिककी धीजे । निरगुन सेती लाजा मरई । कहैं कवीर जिव कैसे तरई ॥ ७ ॥ फाँसी लिया हाथमें माया । ज्यों बाघिन बकरेको खाया । पल पल सो गँवावे रोई । कहैं कवीर ऐसा दुख होई ॥ ८ ॥ मायाका जोरा है पंदा । यासे डबरा कोइ कोइ बंदा । स्वास उसास सुमिरन लागा । कहैं कवीर विषय सब भागा ॥ ९ ॥ जैसे सरपिनि किया कुँडाला । कोइ बन्धा कोई दीया टाला । कहैं कवीर कुडाला पेलै । निर्भय होय जगतमें खेलै ॥ १० ॥ यह संसार कुँडाला माहीं । जाको सरपिनि धर धर खाहीं । कहै कवीर कोइ बाहर आवे । ताको माया नाहि सतावे ॥ ११ ॥ व्यवहार करै औ ऊंचा बोले । निसि दिन फूला फूला ढोलै ॥ माँग तांग कर करै रसोई । कहैं कवीर नफा नहिं काई ॥ १२ ॥ बहुत जतन करि जगत परमोघे । अपने घटको नाहीं सोघे । अंधा शब्द करै नहिं परिचय । कहै कवि ब्रह्म कैसे दरसे ॥ १३ ॥ दुनिया सेती बक बक सूवा । ज्यों नलनीने पकरचो सूवा । ऊपर पाँव तले भइ मूड़ी । कहै कवीर संसारी बूड़ी ॥ १४ ॥ रात दिवस कर ज्ञान पुकारे । मन इन्द्रीको नाहीं मारे । कहैं कवीर सुनो नर लोई । कागा हँसा कैसे होई ॥ १५ ॥ कठिन धारना हंसकी भाई । ज्यों नटनी कर वरत चढाई । चढै बरत वह तन मन साधै । कहैं कवीर वहि कला अगाधै ॥ १६ ॥ सुरत निरत सो नटनी खेलै । तन संभालि आगे पग मेलै । ऐसी धरन नाम जेहि आवे । कहैं कवीर सो हंस कहावे
कवीरपंथी- शब्दावली १४
(४१८)
कवीरपंथी—
॥१७॥ अन्तर लागी करमकी टाटी । दशो दिशा सुरत जो फाटी । धोखा चिन्तामें दिन बीता । कहैं कवीर यों रहिगा रीता ॥१८॥ जाग शिताबी अब का सोवे । टाला-टूलीमें दिन खोवे । छाड़ि अनेक एकको धावे । कहैं कवीर निर्भय होय जावे ॥१९॥ बाँका गढको बेगइ लीजे । पीछे नहीं पयाना कीजे । सन्मुख जूझे सोई सुरा । कहैं कवीर साहेबका पूरा ॥२०॥ आठपहर जो मान पुकारे । घटका बैरी चुनचुन मारे । अगम पंथका नाम बोहारे । कहैं कवीर नहि जमके सारे ॥२१॥ हिंदू तुरुक दोऊ सो न्यारा । मुखसो बचन कहे नहि खारा । राह ऊजडकी लीजे भाई । कहैं कवीर झांखा नहि खाई ॥२२॥ छन्द व्याधिसो न्यारा रहना । निशिदिन साहिबसाहिब कहना । कहैं कवीर समझकर देखो । आन बसी सो नाहि न लेखो ॥२३॥ सार शब्दका थाला झेलै । निर्भय होय जगतमें खेलै ॥ कहैं कवीर क्या संशय कीया । नाम पियाला भरभर पीया ॥२४॥ शून्य मँडलमें तारी लागी । सूती सुरति भडक दै जागी ॥ कहैं कवीर पियासो लागी । मनकी दुविधा तबहीं आगी ॥२५॥
सा०-डोरी लागी डर मिटा, सुरत रही गरनाय । सुरत सुहागिन हो रही, पर घर परत न जाय ॥
इति श्री शब्द पारखा सम्पूर्ण ।
सत्यनाम ।
॥ सर्वांगवत्तीसी रमैनी ॥
काबी कौन ?
सोइ काजी जो होय समाना । दिल दरिआवमें रहे समाना ॥ परम जोतिपर आसन करई । सो काजी भवसागर तरई ॥१॥
शब्दावली
(४१९)
मुक्ता कौन ?
सो मुक्ता जो मनका धीरा । आप आपनी चीन्है पीरा ॥ सहज झून्धमें रहे समाई । सो मुक्ता विहिश्त को जाई ॥२॥
दुर्वेग कौन ?
सोई दुर्वेग जो दिलका सुरा । घट परचेमें देखे नूरा ॥ ज्ञान ध्यानकी बातें करई । सो दुर्वेग जगतमें तरई ॥३॥
शेष कौन ?
सोई शेष जो शेखी धरई । घट परिचय कर मन सो तरई ॥ मनसा मार करै पिसमाना । मन जीते सो शेख बखाना ॥४॥
फकीर कौन ?
सोई फकीर जो फांके काला । इन्द्री जिह्वा एकहि नाला ॥ इन्द्री जिह्वा दोष परहरई । काया खोज अलह चित धरई ॥५॥
पठान कौन ?
सो पठान जो परमादहिं तोरे । अलख पुरुष घट माहिं निहोरे ॥ निरगुन कालसे तिनका तूरा । सोई पठान जगतमें सुरा ॥६॥
सव्यद कौन ?
सो सव्यद जो सरा विचारे । वेद कितेबसे रहे निनारे । वेद कितेब दोनों परिहरई । निर्गुण नाम निरंतर धरई ॥७॥
काफिर कौन ?
सो काफिर कदी न लौलावे । दुनिया त्याग नहीं मन भावे । घटको छाडि अनत नहिं जाई । विचमें सुवे लखे न खुदाई ॥८॥
हिन्दू कौन ?
सोई हिन्दू जो हिरदय समाना । पाप छोडि करै पुण्य निधाना ॥ निरगुन नाम निरंतर ध्यावे । जरा मरणमें बहुरि न आवे ॥९॥
ब्राह्मण कौन ?
सोई ब्राह्मण जो ब्रह्म पहिचाना । जीव शीवमें रहे समाना ॥ तीन लोकमें ब्रह्म परचाना । ब्रह्म छाडि पूजे नहिं आना ॥१०॥
(४२०)
कवीरूपंयी-
क्षत्री कौन ?
सो क्षत्री जो जमा संभारे । काम क्रोध गुन हिरदय जारै ॥ काम क्रोध तन तजे गुमाना । सो क्षत्री रहे निरवाना ॥११॥
वैश्य कौन ?
सो वैश्य जो करै व्योपारा । सत्य शब्द ले हाट पसारा ॥ झूठ कपटको त्यागन कीन्हा । सब जीवनको भोजन दीन्हा ॥१२॥
शूद्र कौन ?
सोई शूद्र जो सेवा मन लीन्हा । आतमराम सकल घट चीन्हा ॥ सेवाको फल पावै सोई । जरा मरन दुख नासै दोई ॥ १३ ॥
बुलहा—कोरी कौन ?
सो बुलहा जो कोरै विधाना । बिन धरनीको बुने जो बाना । बाना बुनकै करै ठिकाना । खुवा प्रान जो वा घर जाना ॥१४॥
राजा कौन ?
राजा सो जो विलसे राजू । निसि दिन करै सत्यको काजू । हाथ अन्तर कबहुँ न धरई । सब जीवनकी रच्छा करई ॥१५॥
कायथ कौन ?
सो कायथ जो कथी विलोवे । पाप पुन्यका संसा खोवे ॥ मिथ्या वचन कबहुँ नहिं कहई । निसिदिन ओट नामकी गहई ॥१६॥
योगी कौन ?
सो योगी जो खोजे आपा । लिप्त न होवे पुन्य अरु पापा ॥ आपा मध्ये करै विचारा । काम क्रोध ते रहे निनारा ॥ १७ ॥
संन्यासी कौन ?
संन्यासी करै सबको न्यासा । काम क्रोधको मेटै फाँसा ॥ कनक कामिनि जीते झारी । सतगुरु शब्द दिल माहिं विचारी ॥१८॥
बैरागी कौन ?
सो बैरागी जो राग न करई । बीत राग होय जग संचरई ॥ व्यापक ब्रह्म घटहीमें देखे । सो बैरागी है हमरे लेखे ॥ १९ ॥
रामानन्दी कौन ?
रामहिं छाड़ि न आन ध्यावे । घट घट महाँ राम चित लावे ॥ भेदभाव कबहुँ नहिं माने । सो रामानन्दी साँच बखाने ॥२०॥
शब्दावली ।
(४२१)
शैव कौन ?
सो शैव जो शिवोऽहम गावे । जीव शीवको भेद मिटावे ॥ छाड़ि अमंगल मंगल रांचे । रहिअ जांच कबहुँ नहिं जांचे ॥२१॥
वैष्णव कौन ?
वैष्णव सोई जो व्यापक जाने । भक्त भगवंत एक करि माने ॥ दया क्षमा उर धरे विचारू । एक दोयका करे निवारू ॥२२॥
कर्म कौन ?
कर्मो सोई जो कर्म कमावे । अकरम छोड़ि सुकरम को धावे । पाप पुण्यकी आस बहाई । एक नाम रहै लवलार्ह ॥२३॥
उपासक कौन ?
इष्ट देवको निकटहिं जाने । रहे सदा सन्मुख मनमाने ॥ उपास्य देवको धरे ध्याना । सद्गुरु दया होय निर्वाना ॥२४॥
ज्ञानी कौन ?
ज्ञानी सोई जो ज्ञेय पहिचाने । आत्मम ब्रह्म एक करि जाने ॥ द्वैत भावको देह उड़ाई । कहैं कवीर ज्ञानी सतभाई ॥२५॥
पंथी कौन ?
पंथी होय सुपंथहि चाले । छाँडे पथ न कुपथ पग डाले । सद्गुरु बचन सदा मन आने । वेद संत सोइ पंथ बखाने ॥२६॥
गृही कौन ?
गिरही होय गिरहको जाने । पांच तत्व गुण तीन पिछाने । करि पिछान न्यारा होय जाई । आत्मतत्वमें रहे समाई ॥२७॥
वैद्य कौन ?
वैद्य सोई जो नाड़ि पिछाने । रोग अरोगका भेद बखाने । पात्र कुपात्रका करे विचारा । औषध नाम करे परचारा ॥२८॥
मंत्री कौन ?
मंत्री सोई जो मंत्र विचारे । राज काजको भले सँझारे । रय्यत राजा बसि करि राखे । नाम सुधारस निसि दिन चाखे ॥२९॥
(४२२)
कवीरपंथी
गुरु कौन ?
गुरु सोई जो ज्ञान सिखावे । मनका संशय दूर बहावे ॥ करम भरम सब देह बहाई । सांचा सतगुरु सोह कहाई ॥ ३० ॥
इष्ट कौन ?
इष्ट सोई जो सबका होई । जहां न भेद भाव कछु कोई । अखंडस्वरूप अस्तिबखानो । कहैं कवीर निजआतमजानो ॥ ३१ ॥
रहनी कौन ?
ऐसी रहनी रहै जु कोई । मुक्ति पंथको पावे सोई ॥ भाव भक्ति दोऊ समतूला । कहैं कवीर सो पावे मूला ॥ ३२ ॥
पच्छापच्छी कारने, सब जग गया भुलान ।
निर्पच्छ होयके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥ १ ॥
आस पास जग बंधिया, आश रहै लिपटाय ।
नाम आश पूरन करै, सबै आश मिट जाय ॥ २ ॥
जो तू चाहे मुइझको, मते कुछ राखे आश ।
मुइझ सरीखा होय रहू, सब कुछ तेरे पास ॥ ३ ॥
इति श्रीसर्वांग वत्तीसी रमैनी ॥
रमैनी सोलहतिथिकी ॥
आउ संत मिलि उतरो पारा । सोलह तिथिका करो विचारा ॥ सोरह तिथिकी कथूँ रमैनी । धरम दास यह लोक निसैनी ॥ १ ॥ अमावस जो मन दिठ होई । आतम परिचय सुआ न कोई ॥ (अमावस आसन दिठ होई । आतम परिचय मानै सोई) ॥ २ ॥ पडिवा प्रीति पियासूँ लागी । संशय गयो द्वैत सब भागी ॥ गुरु प्रताप दया जब कीन्हा । दिलका धोखा सब हर लीन्हा ॥ ३ ॥ बूहज भीतर बोले ओई । अन्दर रांचे जोगी सोई ॥ तीजै तीन गुननसे न्यारा । जो बूझे सो उतरै पारा ॥ ४ ॥ चौथे चित चैतन सो लाग। दिलका धोखा सबहीं भागा ॥ पाँचै मिलि गुरु पूरा
शब्दावली
(४२३)
पाया । बहुरि न जोनी संकट आया ॥ ५ ॥ छठईं छूति करो मत कोई । सब घट ब्रह्म व्यापक होई ॥ सातम नाम सुधा रस पीजे । निर्मल नाम साहेबको लीजे ॥ ६ ॥ ( सातें सतनाम रस पीजे । सिरके सांटे साहिब लीजे ॥ ) आठम अनुभव लेहु बिचारी । सब घट पुरुष कहूँ नहि नारी ॥ ७ ॥ नौ नारी देखो इक साथ । है हीरा जो आवै हाथा ॥ दशों दिसा मन काहेको धावे । अन्दर खोजे साहब पावे ॥ ८ ॥ ग्यारह आवागमन न होई । जो सतनामहिं चीन्हे कोई ॥ द्वादश ऊपर बोले ओई । जरा मरन दुख नासे सोई ॥ ९ ॥ ( द्वादश ऊपर बोले सोई । जरा मरनके भरम न होई ॥ तेरस तनकी तपन बुझाई । होय लौलीन साहब गुन गाई ॥ १० ॥ चौदश चञ्चल निश्चल कीन्हा । तब साहिब आपन करि लीन्हा ॥ पूनो प्रेम पियाला पीजै । सिरके सांटे साहिब लीजै ॥ ११ ॥ सोलह तिथि यहि विधि भाखा । सबहि कला विचार अभिलाखा ॥ सोलह कला सम्पूर्णन भयऊ । कहैं कवीर सत लोके गयऊ ॥ १२ ॥
साखी-सोरह सुत सो पुरुषके, सोरह कला विहार ।
सत्यलोक सो पावई, सोलह करे विचार ॥
अथ रमैनी अक्षर छण्डकी ॥
अच्छर खानी अच्छर बानी । अच्छरसे अच्छर उत्पानी ॥ अच्छर आदि बसे आकास । अच्छर चन्द सूर परकास ॥ १ ॥ अच्छर ब्रह्मा विष्णु महेस । अच्छर नारद गौरि गनेस ॥ अच्छर धरनि पवन औ पानी । अच्छर आदिहि अगम बखानी ॥ २ ॥ अच्छर नव औतार जो भयऊ । बिन अच्छर कोउ भेद न लहेऊ ॥ बिन अच्छर नाहिं निवेरा । अच्छर बिन सब पुंघ कुहेरा ॥ ३ ॥ अच्छर निरंकार परमाना । अदली अच्छर अदल अमाना ॥ अच्छर काया अच्छर माया । अच्छर जग सतगुरु हो आया ॥ ४ ॥
(४२४)
कवीरपंथी—
अच्छर मंत्र जंत्र सब पूजा । विन अच्छर कोइ और न दूजा ॥ अच्छरमें सब जगत भुलाना । विन अच्छर नहिं उपजे ज्ञाना ॥६॥ अच्छर विन कारज नहिं रती । विन अच्छर पावे नहिं गती ॥ अच्छरमें सब जग उपजाया । अच्छर शून्य विशून्य समाया ॥६॥ अच्छर आवै अच्छर जाई । अच्छर काल सबनको खाई ॥ अच्छर सबका भारै लेखा । अच्छर गुप्त परगट होय देखा ॥७॥ सतगुरु अच्छर आनि बतावा । जीवनको भय फंद छुडावा ॥ निअच्छर की पावे सहिदानी । कहैं कवीर तब छूटे प्रानी ॥८॥ सार्वी-अच्छर पावे प्रेम सो, धोखा देह बहाय ।
प्रेम भक्ति जाने विना, जिव परले तर जाय ॥ १ ॥
रमनी । प्रेम अच्छरकी ।
अच्छर प्रेम लखै जो कोई । प्रेम विना सब दुनी विगोई ॥ जो कोइ करै प्रेम मो बासा । जरा मरणकी छूटै आसा ॥ १ ॥ जोगी गोरख बहु विधि गावैं । बहुत प्रेम सो नाद बजावैं ॥ नाद बजाय भेद नहिं पावैं । छूटै प्रान बहुत पछतावैं ॥२॥ एक प्रेम संन्यास विचारे । तीरथ वरत करि काया गारै ॥ करै तपस्या होमैं काया । अच्छर प्रेम कहो कहैं पाया ॥३॥ एक प्रेमसे पढ़ै पुराना । करम भरम कथि भावै ज्ञाना ॥ पाप पुण्य बहु विधि अरथावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ ४ ॥ एक प्रेम गहि कुलकी कानी । डालि तोड आमकी आनी ॥ करवा चौथ करै बहु पूजा । अच्छर प्रेम कहो कहैं सूजा ॥ ५ ॥ तुरुक कतल करि दीन बनावै । पीर औलिया बहुत मनावै ॥ आयत बैत हदीस अति गावै । धारै प्रेम मक्के चलि जावै ॥ ६ ॥ पढ़ै प्रेम औ हुरी चलावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ जीव दया दिलमें पहिचाना । सोई प्रेम निज प्रेम समाना ॥ ७ ॥
शब्दावली
(४२५)
प्रेम प्रेम सबही कहै, प्रेम न चीन्है कोय । जाहि प्रेम साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ॥ २ ॥
रमैनी रहनी गहनी ।
रहनि गहनि पावे जो कोई । शब्द सार निअच्छर सोई ॥ अच्छरमें निहअच्छर सारा । ताहि पाय कोइ हंस हमारा ॥ १ ॥ हंस होय परखे वह वानी । अच्छर भेद करै पहिचानी ॥ अच्छर भेद करै कडिहारी । निहअच्छर मई हंस उवारी ॥ २ ॥ अच्छर निहअच्छर भेद निनारा । जो परखे सो भवजल पारा ॥ कहै कवीर जो कहै विचारै । आप तरे औरनको तारे ॥ ३ ॥
शब्द सार निहअच्छरा, जब तब करियो याद ।
अन्त फलेगी माहिली, ऊपरकी सब बाद ॥ ३ ॥
रमैनी यमजाल ।
तीन लोक जम जाल पसारा । नेम धर्म षटकर्म अचारा ॥ आचारे सब दुनी भुलानी । सार शब्द कोउ विरले जानी ॥ १ ॥ सत्तपुरुषको जाने कोई । तीन लोक जाते पुनि होई ॥ करम भरम तजि शब्द समावे । इस्थिर ज्ञान अमरपद पावे ॥ २ ॥ सत्यशब्द को करे विचारा । सो छूटे जमजाल अपारा ॥ कहै कवीर जिन तत्त विचारा । सोहँ शब्द है अगम अपारा ॥ ३ ॥
शब्द हमारा सत्य है, सुनि मत जाहु सरख ।
जो चाहे निज मुक्तिको, लीजो शब्दहिं परख ॥ ४ ॥
रमैनी—सांचाकडिहार ॥
नाम अमलमें रहे मतवाला । प्रेम अमीका पीवे प्याला ॥ ज्ञान दीष निज भीतर बारा । सो कहिये सांचा कडिहारा ॥ १ ॥ और अमलको रंग न करई । माया ममताको पर हरई ॥ सार शब्दमें ध्यान लगावे । सो कडिहार जम जाल बचावे ॥ २ ॥ दया छमा औ शील विचारा । धीरज धरम संतोष अचारा ॥
(४२६)
कवीरपंथी—
यह सब धरे ममता मारे । सो कडिहार जगत जल तारे ॥३॥ शब्द सरोतर हिरदय साँचा । छाडि परपंच सत्यसे राँचा ॥ सत्यनाम मो रहै न काँचा । सो कडिहार जगत सो बाँचा ॥४॥ कुल करनाको मेटै धोखा । समता ज्ञान सु अंतर पोखा ॥ ज्ञान रतनके पूरे नौका । सो कडिहार बैठिहै चौका ॥५॥ दया छिमा संतोष विचारा । शील वैराग ज्ञान अधारा ॥ काम क्रोध चिन्ता नहि परई । सो कडिहार आरति करई ॥६॥ आसा वासा मनको नासे । माया मोह न फटके पासे ॥ कर्म कला सो तिनका तोरे । सो कडिहार नारियल मोरे ॥७॥ सिख साखा सब प्रेम बढावैं । बहुत भांति ते सेवा लावैं ॥ कोटिक शिष्य करै सनमाना । रह कडिहार शब्द लपटाना ॥८॥ गुरुका शब्द सदा परकासे । भेद भरम का दुविधा नासे ॥ नहिं तो कालरूप कडिहारा । सब जीवनका करै अहारा ॥९॥ लोभ मोहकी धरे सगाई । शब्द छाडि जग करै ठगाई ॥ शब्द चाल हिरदे नहि आवे । सो कडिहार कस लोक सिधावे ॥१०॥
आसन चाँपै फूलके, धरै जु जमको भाव ।
कहैं कवीर तब जानि है, पड़े वज्रको चाव ॥६॥
रमनी—सत्यनाम ।
सत्यनाम सुमिरो मन माहीं । जहवाँ रजनी वासर नाही ॥ आदि अन्त नहि धरनि अकासा । पावक पवन न नीर निवासा ॥१॥ चन्द सूर तहवाँ नहि कोई । प्रात सांझ तहवाँ नहि दोई ॥ कर्म भर्म पुण्य नहि पापा । तहवाँ जपियो अजपा जापा ॥२॥ झलमलाट चहुँदिस ऊँजियारा । वरषे तहाँ अगरकी धारा ॥ तहँ सतगुरुको आसन होई । कोटि माहिं जन पहुँचे कोई ॥३॥ दसो दिसा झिलमिल तहँ छाजा । बाजे तहाँ सु अनहद बाजा ॥ तहवाँ हंसा ध्यान लगावे । बहुरि न जोनी संकट आवे ॥४॥
शब्दावली
(६२७)
उहवाँको सुख वरनि न जाई । सतगुरु मिलै तो देह लखाई ॥ ज्यों गुंगाको सुपना देखो । ऐसो जीवत जनम को लेखो ॥ ५ ॥
सा०-मन पवना दुइ थिर हुआ, भया प्रेम परकास ।
जीवातम जहँ रमि रहा, पूरन ब्रह्म विलास ॥ ६ ॥
रमनी—रहनी पहचान ।
सतगुरु सो सतनाम सुनावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥ तीरथ सोई जो मोछै पापा । मित्र सोई जो हरे संतापा ॥ १ ॥ जोगी सो जो काया सोधे । बुद्धि सोई जो नाहि विरोधे ॥ पण्डित सोई जो आगम जानै । भक्त सोई जो भय नहि आने ॥ २ ॥ दाते जो औगुन परहरई । ज्ञानी सोइ जीवता मरई ॥ सुक्ता सोई सतनाम अराधे । श्रोता सोई जो सुरतिहिं साधे ॥ ३ ॥ सेवक सोई गहै विश्वासा । निसिदिन राखै संतन आसा ॥ सतगुरु का लोपै नहि बाचा । कहै कवीर सो सेवक सांचा ॥ ४ ॥
जीवन मरन जानै नहीं, अंध भया सब जाय ।
द्वारे दाद न पावई, अनेक जनम पछताय ॥ ७ ॥
अथ कवीर अष्टाङ्गयोग प्रारम्भः ।
अविगत योग रमनी ॥ १ ॥
अविगत लीला अगम अपारा । धरनी धन्यो संत औतारा ॥ अविगत लीला अगम अलेखा । अबरन बरन रूप नहि रेखा ॥ १ ॥ जा गति सुरनर सुनि नहि पाई । अविगतकी गति वरनि नहि जाई ॥ शेष सहस मुख निसिदिन गावैं । उस्तुति करत पार नहि पावैं ॥ २ ॥ वेद कोटि सहस गुण गावे । अविगतकी गति बरनि नहि जावे ॥ कहैलों कहौ कहा नहि जाई । अविगतिकी गति अविगति भाई ॥ ३ ॥
(४२८)
कवीरपंथी-
सा०-अविगतिकी गति विगत है, मन बुधि चितते दूर । आपा मेटि सतगुरु मिलै, पावे दरस हजूर ॥ १ ॥
कर्मयोग रमैनी ॥ २ ॥
योगी योग बहुत जो करई । क्रिया योगते नहिं निस्तरई ॥ फिर फिर आवै फिर फिरि जाई । कर्महि कर्म बहुत उरझाई ॥ होय निहकर्म नाम जो ध्यावे । योनी संकट बहुरि न आवे ॥ कर्महि कर्म बँधा बहु भारा । कर्महि कर्म अटका संसारा ॥ देह कर्म जो दीन उठाई । मनका कर्म छुटै नहिं भाई ॥ जब लग मनका कर्म न खोवे । तब लग मन निरमल नहिं होवे ॥ मनकी क्रिया जबै मिटि जाई । तब प्रभु मिलै सहजमें आई ॥ मने निरञ्जन आपुहिं होई । याको जाने विरला कोई ॥
तन क्रियाको खाड़िके, मन क्रिया रुचि राख । कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निज भाख ॥ २ ॥
तत्कर्मयोग रमैनी ॥ ३ ॥
तन कर करनी देहु बहाई । मन कर करनी सत्य मिलाई ॥ मनकी क्रिया सत्य जो होई । ताहि समान क्रिया नहिं कोई ॥ १ ॥ सांख्य योग करना है-सारा । जेहिते उतरे भवजल पारा ॥ सत क्रिया ते ज्ञानी भयऊ । सत क्रिया साहब मिलि गयऊ ॥ २ ॥ सत क्रिया सत पुरुषहिं ध्यावे । सत क्रिया सतनाम मिलावे ॥ सत क्रिया जग होय उदासा । सत क्रियाते मुक्ति निवासा ॥ ३ ॥
समौ०-सत्य क्रिया निर्वाण है, है तन मन ते भिन्न । मन पवना दिठ करि गहै, सत्यनाम निज चिन्ह ॥ ३ ॥
अष्टांगयोग अन्तर्गत.
सांख्य योग रमैनी ॥ ४ ॥
अब मैं सांख्य योग बतलाऊँ । योग अष्टाङ्गके लछन दिख- लाऊँ ॥ इक इकके चारि चारि लच्छन । जो जाने सो होय विचच्छन ॥ १ ॥ यों तो कहे लछन बतीसा । अष्टांगयोगमें एकहि
शब्दावली
(४२९)
दीसा । अष्टांगयोग सांख्य जो जाने । और लच्छन बत्तीस पिछाने ॥ २ ॥ प्रथम योग ज्ञान बखाना । दूसर विचार कहै परमाना ॥ तीसर योग विवेकहिं जाने । चौथा योग शील परधाने ॥ ३ ॥ पँचवां योग संतोष बखाना । योग निरवैर छठवहिं माना ॥ सतवाँ सहज योग है भाई । अठवाँ शून्य एक लौलाई ॥ ४ ॥
समौ-तेई भवसागर तरे, या करनी निज सार । सत क्रिया सतसो गहै, सत्यनाम आधार ॥ ४ ॥
ज्ञानयोग १ रमैनी ॥ ५ ॥
प्रथम योग ज्ञान है भाई । तेहिते सुख परमपद पाई ॥ निरालंब अलब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥ १ ॥ करम भरम तजि साहब जाने । भली बुरी कछु चित्त न आने ॥ निरवासिक वास नहिं कोई । जड़ल वस्ती एके होई ॥ २ ॥ होय निरभय रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥ द्वैत विचार न मनमें आवे । आतमरूप सदा दरसावे ॥ ३ ॥
समौ-एक नामको जानिके, दूजा देह बहाय ।
तीरथ वरत जप तप नहीं, आतम ब्रह्म समाय ॥ ५ ॥
विचारयोग २ रमैनी ॥ ६ ॥
दूजा योग विचार सम्हारे । निरमोही होय आप विचारे ॥ लै निरद्वन्द्व रहै जगमाहीं । जगके सुखसों लागे नाहीं ॥ १ ॥ मातु पिता सुत नारि निभावे । काम क्रोध मद लोभ भुलावे ॥ होय निशंक शब्द सो लागे । अनहद सुनै आतमा जागे ॥ २ ॥ देह अदेह करै निरुवारा । देही छोड़ विदेह पैसारा ॥ देह छोड़ विदेह समाना । हँसा पावे पद निर्वाना ॥ ३ ॥
समौ-जो कुछ करे सुविचारके, पाप पुन्य ते न्यार ।
नाम कवीरा जानिके, जाय पुरुष दरबार ॥ ६ ॥
(४३०)
कवीरपंथी—
विवेकयोग ३ रमनी ॥७॥
तीजो योग विवेक कहावे । विन विवेक कोइ पार न पावे ॥ जाके समाधान मन होई । भली बुरी कहि जावे कोई ॥ १ ॥ समदर्शी सम ज्ञान विचारे । सब घट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति गहै सो नाम समाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ २ ॥ जाके शान्ति होय घट माहीं । कोइ कछु कहो क्रोध मन नाहीं ॥ सोइ विवेकी सत पद जाने । सबहीं आतम एक पिछाने ॥ ३ ॥
समौ—जब लग नहीं विवेक मन, तब लग लगै न तीर ।
भवसागर नामी तरे, अस कथि कहैं कवीर ॥ ७ ॥
शील योग ४ रमनी ॥८॥
चौथा योग शील कहि दीन्हा । बिना शील साहब नहिं चीन्हा ॥ निर्मल सोचहिं सोच विचारे । सुच रुच दया धरम डर धारे ॥ १ ॥ मनको संयम करै जो जानी । पांचो पकड़ि एक घर आनी ॥ सत्यशब्द भासे संसारा । सतही ते उतरे भवपारा ॥ २ ॥ होय सरोतर सत्य बखाने । भावे भला बुरा कोइ मानै ॥ बुरा कर्म ते लजा करई । बिना विचार नहीं पगु धरई ॥ ३ ॥ जो काहुको होय उपकारा । मन बच कर्म करै उपचारा ॥ शीलवान जग अस बुधि पाई । आपन दिसि वह चूके नाहीं ॥ ४ ॥ शील पाइ इन्द्री निज साधे । गुरुगम पन्थ नाम अवराधे ॥ जियत मरै सोई शिलवन्ता । शब्द विचारि गहै मगु कन्ता ॥ ५ ॥
समौ—शील छमा जब ऊपजे, अलख दृष्टि तब होय ।
बिना शील पहुँचे नहीं, कोटि कथै जो कोय ॥ ८ ॥
संतोषयोग ५ रमनी ॥९॥
पंचवों योग संतोष बखाना । विन संतोष बूढे अज्ञाना ॥ मानो नहीं रंक औ राजा । होय अमान नहिं काहुसो काजा ॥ १ ॥ नर्क स्वर्ग बंछे नहिं कोई । होय अबंछक साहिब सोई ॥ मन