कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(४२४)
कवीरपंथी—
अच्छर मंत्र जंत्र सब पूजा । विन अच्छर कोइ और न दूजा ॥ अच्छरमें सब जगत भुलाना । विन अच्छर नहिं उपजे ज्ञाना ॥६॥ अच्छर विन कारज नहिं रती । विन अच्छर पावे नहिं गती ॥ अच्छरमें सब जग उपजाया । अच्छर शून्य विशून्य समाया ॥६॥ अच्छर आवै अच्छर जाई । अच्छर काल सबनको खाई ॥ अच्छर सबका भारै लेखा । अच्छर गुप्त परगट होय देखा ॥७॥ सतगुरु अच्छर आनि बतावा । जीवनको भय फंद छुडावा ॥ निअच्छर की पावे सहिदानी । कहैं कवीर तब छूटे प्रानी ॥८॥ सार्वी-अच्छर पावे प्रेम सो, धोखा देह बहाय ।
प्रेम भक्ति जाने विना, जिव परले तर जाय ॥ १ ॥
रमनी । प्रेम अच्छरकी ।
अच्छर प्रेम लखै जो कोई । प्रेम विना सब दुनी विगोई ॥ जो कोइ करै प्रेम मो बासा । जरा मरणकी छूटै आसा ॥ १ ॥ जोगी गोरख बहु विधि गावैं । बहुत प्रेम सो नाद बजावैं ॥ नाद बजाय भेद नहिं पावैं । छूटै प्रान बहुत पछतावैं ॥२॥ एक प्रेम संन्यास विचारे । तीरथ वरत करि काया गारै ॥ करै तपस्या होमैं काया । अच्छर प्रेम कहो कहैं पाया ॥३॥ एक प्रेमसे पढ़ै पुराना । करम भरम कथि भावै ज्ञाना ॥ पाप पुण्य बहु विधि अरथावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ ४ ॥ एक प्रेम गहि कुलकी कानी । डालि तोड आमकी आनी ॥ करवा चौथ करै बहु पूजा । अच्छर प्रेम कहो कहैं सूजा ॥ ५ ॥ तुरुक कतल करि दीन बनावै । पीर औलिया बहुत मनावै ॥ आयत बैत हदीस अति गावै । धारै प्रेम मक्के चलि जावै ॥ ६ ॥ पढ़ै प्रेम औ हुरी चलावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ जीव दया दिलमें पहिचाना । सोई प्रेम निज प्रेम समाना ॥ ७ ॥