भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४२३)

पाया । बहुरि न जोनी संकट आया ॥ ५ ॥ छठईं छूति करो मत कोई । सब घट ब्रह्म व्यापक होई ॥ सातम नाम सुधा रस पीजे । निर्मल नाम साहेबको लीजे ॥ ६ ॥ ( सातें सतनाम रस पीजे । सिरके सांटे साहिब लीजे ॥ ) आठम अनुभव लेहु बिचारी । सब घट पुरुष कहूँ नहि नारी ॥ ७ ॥ नौ नारी देखो इक साथ । है हीरा जो आवै हाथा ॥ दशों दिसा मन काहेको धावे । अन्दर खोजे साहब पावे ॥ ८ ॥ ग्यारह आवागमन न होई । जो सतनामहिं चीन्हे कोई ॥ द्वादश ऊपर बोले ओई । जरा मरन दुख नासे सोई ॥ ९ ॥ ( द्वादश ऊपर बोले सोई । जरा मरनके भरम न होई ॥ तेरस तनकी तपन बुझाई । होय लौलीन साहब गुन गाई ॥ १० ॥ चौदश चञ्चल निश्चल कीन्हा । तब साहिब आपन करि लीन्हा ॥ पूनो प्रेम पियाला पीजै । सिरके सांटे साहिब लीजै ॥ ११ ॥ सोलह तिथि यहि विधि भाखा । सबहि कला विचार अभिलाखा ॥ सोलह कला सम्पूर्णन भयऊ । कहैं कवीर सत लोके गयऊ ॥ १२ ॥

साखी-सोरह सुत सो पुरुषके, सोरह कला विहार ।

सत्यलोक सो पावई, सोलह करे विचार ॥

अथ रमैनी अक्षर छण्डकी ॥

अच्छर खानी अच्छर बानी । अच्छरसे अच्छर उत्पानी ॥ अच्छर आदि बसे आकास । अच्छर चन्द सूर परकास ॥ १ ॥ अच्छर ब्रह्मा विष्णु महेस । अच्छर नारद गौरि गनेस ॥ अच्छर धरनि पवन औ पानी । अच्छर आदिहि अगम बखानी ॥ २ ॥ अच्छर नव औतार जो भयऊ । बिन अच्छर कोउ भेद न लहेऊ ॥ बिन अच्छर नाहिं निवेरा । अच्छर बिन सब पुंघ कुहेरा ॥ ३ ॥ अच्छर निरंकार परमाना । अदली अच्छर अदल अमाना ॥ अच्छर काया अच्छर माया । अच्छर जग सतगुरु हो आया ॥ ४ ॥