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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(४२४)

कवीरपंथी—

अच्छर मंत्र जंत्र सब पूजा । विन अच्छर कोइ और न दूजा ॥ अच्छरमें सब जगत भुलाना । विन अच्छर नहिं उपजे ज्ञाना ॥६॥ अच्छर विन कारज नहिं रती । विन अच्छर पावे नहिं गती ॥ अच्छरमें सब जग उपजाया । अच्छर शून्य विशून्य समाया ॥६॥ अच्छर आवै अच्छर जाई । अच्छर काल सबनको खाई ॥ अच्छर सबका भारै लेखा । अच्छर गुप्त परगट होय देखा ॥७॥ सतगुरु अच्छर आनि बतावा । जीवनको भय फंद छुडावा ॥ निअच्छर की पावे सहिदानी । कहैं कवीर तब छूटे प्रानी ॥८॥ सार्वी-अच्छर पावे प्रेम सो, धोखा देह बहाय ।

प्रेम भक्ति जाने विना, जिव परले तर जाय ॥ १ ॥

रमनी । प्रेम अच्छरकी ।

अच्छर प्रेम लखै जो कोई । प्रेम विना सब दुनी विगोई ॥ जो कोइ करै प्रेम मो बासा । जरा मरणकी छूटै आसा ॥ १ ॥ जोगी गोरख बहु विधि गावैं । बहुत प्रेम सो नाद बजावैं ॥ नाद बजाय भेद नहिं पावैं । छूटै प्रान बहुत पछतावैं ॥२॥ एक प्रेम संन्यास विचारे । तीरथ वरत करि काया गारै ॥ करै तपस्या होमैं काया । अच्छर प्रेम कहो कहैं पाया ॥३॥ एक प्रेमसे पढ़ै पुराना । करम भरम कथि भावै ज्ञाना ॥ पाप पुण्य बहु विधि अरथावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ ४ ॥ एक प्रेम गहि कुलकी कानी । डालि तोड आमकी आनी ॥ करवा चौथ करै बहु पूजा । अच्छर प्रेम कहो कहैं सूजा ॥ ५ ॥ तुरुक कतल करि दीन बनावै । पीर औलिया बहुत मनावै ॥ आयत बैत हदीस अति गावै । धारै प्रेम मक्के चलि जावै ॥ ६ ॥ पढ़ै प्रेम औ हुरी चलावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ जीव दया दिलमें पहिचाना । सोई प्रेम निज प्रेम समाना ॥ ७ ॥

शब्दावली

(४२५)

प्रेम प्रेम सबही कहै, प्रेम न चीन्है कोय । जाहि प्रेम साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ॥ २ ॥

रमैनी रहनी गहनी ।

रहनि गहनि पावे जो कोई । शब्द सार निअच्छर सोई ॥ अच्छरमें निहअच्छर सारा । ताहि पाय कोइ हंस हमारा ॥ १ ॥ हंस होय परखे वह वानी । अच्छर भेद करै पहिचानी ॥ अच्छर भेद करै कडिहारी । निहअच्छर मई हंस उवारी ॥ २ ॥ अच्छर निहअच्छर भेद निनारा । जो परखे सो भवजल पारा ॥ कहै कवीर जो कहै विचारै । आप तरे औरनको तारे ॥ ३ ॥

शब्द सार निहअच्छरा, जब तब करियो याद ।

अन्त फलेगी माहिली, ऊपरकी सब बाद ॥ ३ ॥

रमैनी यमजाल ।

तीन लोक जम जाल पसारा । नेम धर्म षटकर्म अचारा ॥ आचारे सब दुनी भुलानी । सार शब्द कोउ विरले जानी ॥ १ ॥ सत्तपुरुषको जाने कोई । तीन लोक जाते पुनि होई ॥ करम भरम तजि शब्द समावे । इस्थिर ज्ञान अमरपद पावे ॥ २ ॥ सत्यशब्द को करे विचारा । सो छूटे जमजाल अपारा ॥ कहै कवीर जिन तत्त विचारा । सोहँ शब्द है अगम अपारा ॥ ३ ॥

शब्द हमारा सत्य है, सुनि मत जाहु सरख ।

जो चाहे निज मुक्तिको, लीजो शब्दहिं परख ॥ ४ ॥

रमैनी—सांचाकडिहार ॥

नाम अमलमें रहे मतवाला । प्रेम अमीका पीवे प्याला ॥ ज्ञान दीष निज भीतर बारा । सो कहिये सांचा कडिहारा ॥ १ ॥ और अमलको रंग न करई । माया ममताको पर हरई ॥ सार शब्दमें ध्यान लगावे । सो कडिहार जम जाल बचावे ॥ २ ॥ दया छमा औ शील विचारा । धीरज धरम संतोष अचारा ॥

(४२६)

कवीरपंथी—

यह सब धरे ममता मारे । सो कडिहार जगत जल तारे ॥३॥ शब्द सरोतर हिरदय साँचा । छाडि परपंच सत्यसे राँचा ॥ सत्यनाम मो रहै न काँचा । सो कडिहार जगत सो बाँचा ॥४॥ कुल करनाको मेटै धोखा । समता ज्ञान सु अंतर पोखा ॥ ज्ञान रतनके पूरे नौका । सो कडिहार बैठिहै चौका ॥५॥ दया छिमा संतोष विचारा । शील वैराग ज्ञान अधारा ॥ काम क्रोध चिन्ता नहि परई । सो कडिहार आरति करई ॥६॥ आसा वासा मनको नासे । माया मोह न फटके पासे ॥ कर्म कला सो तिनका तोरे । सो कडिहार नारियल मोरे ॥७॥ सिख साखा सब प्रेम बढावैं । बहुत भांति ते सेवा लावैं ॥ कोटिक शिष्य करै सनमाना । रह कडिहार शब्द लपटाना ॥८॥ गुरुका शब्द सदा परकासे । भेद भरम का दुविधा नासे ॥ नहिं तो कालरूप कडिहारा । सब जीवनका करै अहारा ॥९॥ लोभ मोहकी धरे सगाई । शब्द छाडि जग करै ठगाई ॥ शब्द चाल हिरदे नहि आवे । सो कडिहार कस लोक सिधावे ॥१०॥

आसन चाँपै फूलके, धरै जु जमको भाव ।

कहैं कवीर तब जानि है, पड़े वज्रको चाव ॥६॥

रमनी—सत्यनाम ।

सत्यनाम सुमिरो मन माहीं । जहवाँ रजनी वासर नाही ॥ आदि अन्त नहि धरनि अकासा । पावक पवन न नीर निवासा ॥१॥ चन्द सूर तहवाँ नहि कोई । प्रात सांझ तहवाँ नहि दोई ॥ कर्म भर्म पुण्य नहि पापा । तहवाँ जपियो अजपा जापा ॥२॥ झलमलाट चहुँदिस ऊँजियारा । वरषे तहाँ अगरकी धारा ॥ तहँ सतगुरुको आसन होई । कोटि माहिं जन पहुँचे कोई ॥३॥ दसो दिसा झिलमिल तहँ छाजा । बाजे तहाँ सु अनहद बाजा ॥ तहवाँ हंसा ध्यान लगावे । बहुरि न जोनी संकट आवे ॥४॥

शब्दावली

(६२७)

उहवाँको सुख वरनि न जाई । सतगुरु मिलै तो देह लखाई ॥ ज्यों गुंगाको सुपना देखो । ऐसो जीवत जनम को लेखो ॥ ५ ॥

सा०-मन पवना दुइ थिर हुआ, भया प्रेम परकास ।

जीवातम जहँ रमि रहा, पूरन ब्रह्म विलास ॥ ६ ॥

रमनी—रहनी पहचान ।

सतगुरु सो सतनाम सुनावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥ तीरथ सोई जो मोछै पापा । मित्र सोई जो हरे संतापा ॥ १ ॥ जोगी सो जो काया सोधे । बुद्धि सोई जो नाहि विरोधे ॥ पण्डित सोई जो आगम जानै । भक्त सोई जो भय नहि आने ॥ २ ॥ दाते जो औगुन परहरई । ज्ञानी सोइ जीवता मरई ॥ सुक्ता सोई सतनाम अराधे । श्रोता सोई जो सुरतिहिं साधे ॥ ३ ॥ सेवक सोई गहै विश्वासा । निसिदिन राखै संतन आसा ॥ सतगुरु का लोपै नहि बाचा । कहै कवीर सो सेवक सांचा ॥ ४ ॥

जीवन मरन जानै नहीं, अंध भया सब जाय ।

द्वारे दाद न पावई, अनेक जनम पछताय ॥ ७ ॥

अथ कवीर अष्टाङ्गयोग प्रारम्भः ।

अविगत योग रमनी ॥ १ ॥

अविगत लीला अगम अपारा । धरनी धन्यो संत औतारा ॥ अविगत लीला अगम अलेखा । अबरन बरन रूप नहि रेखा ॥ १ ॥ जा गति सुरनर सुनि नहि पाई । अविगतकी गति वरनि नहि जाई ॥ शेष सहस मुख निसिदिन गावैं । उस्तुति करत पार नहि पावैं ॥ २ ॥ वेद कोटि सहस गुण गावे । अविगतकी गति बरनि नहि जावे ॥ कहैलों कहौ कहा नहि जाई । अविगतिकी गति अविगति भाई ॥ ३ ॥

(४२८)

कवीरपंथी-

सा०-अविगतिकी गति विगत है, मन बुधि चितते दूर । आपा मेटि सतगुरु मिलै, पावे दरस हजूर ॥ १ ॥

कर्मयोग रमैनी ॥ २ ॥

योगी योग बहुत जो करई । क्रिया योगते नहिं निस्तरई ॥ फिर फिर आवै फिर फिरि जाई । कर्महि कर्म बहुत उरझाई ॥ होय निहकर्म नाम जो ध्यावे । योनी संकट बहुरि न आवे ॥ कर्महि कर्म बँधा बहु भारा । कर्महि कर्म अटका संसारा ॥ देह कर्म जो दीन उठाई । मनका कर्म छुटै नहिं भाई ॥ जब लग मनका कर्म न खोवे । तब लग मन निरमल नहिं होवे ॥ मनकी क्रिया जबै मिटि जाई । तब प्रभु मिलै सहजमें आई ॥ मने निरञ्जन आपुहिं होई । याको जाने विरला कोई ॥

तन क्रियाको खाड़िके, मन क्रिया रुचि राख । कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निज भाख ॥ २ ॥

तत्कर्मयोग रमैनी ॥ ३ ॥

तन कर करनी देहु बहाई । मन कर करनी सत्य मिलाई ॥ मनकी क्रिया सत्य जो होई । ताहि समान क्रिया नहिं कोई ॥ १ ॥ सांख्य योग करना है-सारा । जेहिते उतरे भवजल पारा ॥ सत क्रिया ते ज्ञानी भयऊ । सत क्रिया साहब मिलि गयऊ ॥ २ ॥ सत क्रिया सत पुरुषहिं ध्यावे । सत क्रिया सतनाम मिलावे ॥ सत क्रिया जग होय उदासा । सत क्रियाते मुक्ति निवासा ॥ ३ ॥

समौ०-सत्य क्रिया निर्वाण है, है तन मन ते भिन्न । मन पवना दिठ करि गहै, सत्यनाम निज चिन्ह ॥ ३ ॥

अष्टांगयोग अन्तर्गत.

सांख्य योग रमैनी ॥ ४ ॥

अब मैं सांख्य योग बतलाऊँ । योग अष्टाङ्गके लछन दिख- लाऊँ ॥ इक इकके चारि चारि लच्छन । जो जाने सो होय विचच्छन ॥ १ ॥ यों तो कहे लछन बतीसा । अष्टांगयोगमें एकहि

शब्दावली

(४२९)

दीसा । अष्टांगयोग सांख्य जो जाने । और लच्छन बत्तीस पिछाने ॥ २ ॥ प्रथम योग ज्ञान बखाना । दूसर विचार कहै परमाना ॥ तीसर योग विवेकहिं जाने । चौथा योग शील परधाने ॥ ३ ॥ पँचवां योग संतोष बखाना । योग निरवैर छठवहिं माना ॥ सतवाँ सहज योग है भाई । अठवाँ शून्य एक लौलाई ॥ ४ ॥

समौ-तेई भवसागर तरे, या करनी निज सार । सत क्रिया सतसो गहै, सत्यनाम आधार ॥ ४ ॥

ज्ञानयोग १ रमैनी ॥ ५ ॥

प्रथम योग ज्ञान है भाई । तेहिते सुख परमपद पाई ॥ निरालंब अलब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥ १ ॥ करम भरम तजि साहब जाने । भली बुरी कछु चित्त न आने ॥ निरवासिक वास नहिं कोई । जड़ल वस्ती एके होई ॥ २ ॥ होय निरभय रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥ द्वैत विचार न मनमें आवे । आतमरूप सदा दरसावे ॥ ३ ॥

समौ-एक नामको जानिके, दूजा देह बहाय ।

तीरथ वरत जप तप नहीं, आतम ब्रह्म समाय ॥ ५ ॥

विचारयोग २ रमैनी ॥ ६ ॥

दूजा योग विचार सम्हारे । निरमोही होय आप विचारे ॥ लै निरद्वन्द्व रहै जगमाहीं । जगके सुखसों लागे नाहीं ॥ १ ॥ मातु पिता सुत नारि निभावे । काम क्रोध मद लोभ भुलावे ॥ होय निशंक शब्द सो लागे । अनहद सुनै आतमा जागे ॥ २ ॥ देह अदेह करै निरुवारा । देही छोड़ विदेह पैसारा ॥ देह छोड़ विदेह समाना । हँसा पावे पद निर्वाना ॥ ३ ॥

समौ-जो कुछ करे सुविचारके, पाप पुन्य ते न्यार ।

नाम कवीरा जानिके, जाय पुरुष दरबार ॥ ६ ॥

(४३०)

कवीरपंथी—

विवेकयोग ३ रमनी ॥७॥

तीजो योग विवेक कहावे । विन विवेक कोइ पार न पावे ॥ जाके समाधान मन होई । भली बुरी कहि जावे कोई ॥ १ ॥ समदर्शी सम ज्ञान विचारे । सब घट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति गहै सो नाम समाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ २ ॥ जाके शान्ति होय घट माहीं । कोइ कछु कहो क्रोध मन नाहीं ॥ सोइ विवेकी सत पद जाने । सबहीं आतम एक पिछाने ॥ ३ ॥

समौ—जब लग नहीं विवेक मन, तब लग लगै न तीर ।

भवसागर नामी तरे, अस कथि कहैं कवीर ॥ ७ ॥

शील योग ४ रमनी ॥८॥

चौथा योग शील कहि दीन्हा । बिना शील साहब नहिं चीन्हा ॥ निर्मल सोचहिं सोच विचारे । सुच रुच दया धरम डर धारे ॥ १ ॥ मनको संयम करै जो जानी । पांचो पकड़ि एक घर आनी ॥ सत्यशब्द भासे संसारा । सतही ते उतरे भवपारा ॥ २ ॥ होय सरोतर सत्य बखाने । भावे भला बुरा कोइ मानै ॥ बुरा कर्म ते लजा करई । बिना विचार नहीं पगु धरई ॥ ३ ॥ जो काहुको होय उपकारा । मन बच कर्म करै उपचारा ॥ शीलवान जग अस बुधि पाई । आपन दिसि वह चूके नाहीं ॥ ४ ॥ शील पाइ इन्द्री निज साधे । गुरुगम पन्थ नाम अवराधे ॥ जियत मरै सोई शिलवन्ता । शब्द विचारि गहै मगु कन्ता ॥ ५ ॥

समौ—शील छमा जब ऊपजे, अलख दृष्टि तब होय ।

बिना शील पहुँचे नहीं, कोटि कथै जो कोय ॥ ८ ॥

संतोषयोग ५ रमनी ॥९॥

पंचवों योग संतोष बखाना । विन संतोष बूढे अज्ञाना ॥ मानो नहीं रंक औ राजा । होय अमान नहिं काहुसो काजा ॥ १ ॥ नर्क स्वर्ग बंछे नहिं कोई । होय अबंछक साहिब सोई ॥ मन

शब्दावली

(४३१)

स्थिर करि प्रेम उपजावे । अनहद शब्द सुने चित लावे ॥ २ ॥ जो कछु कर्म योगते आवे । जानि प्रारब्ध शीस चढावे ॥ मनमें छोभ न लावे कबहीं । जो कछु आवे सह ले सबहीं ॥ ३ ॥ होनी होय टले नहिं काहू । करि असंतोष मिले का लाहू ॥ संतोषी हो ऐसी मति राखे । निराश वचन कबहुं नहिं भाखे ॥ ४ ॥ सोई योग संतोष कमावे । काल जाल ते जीव छुडावे ॥ विन संतोष काल सुख जाई । पाई संतोष काल बहाई ॥ ५ ॥

समौ-निरमल शब्द प्रकाश करि, रह सुख सेज समय । सत्यनाम संतोष विन, सत्यलोक नहिं जाय ॥९॥

निरवर योग ६ रमैनी ॥ १० ॥

छठवें योग है निरवैरा । जासे जगमें होय निवेरा ॥ सब घट भीतर एक करि जाने । होय सुहृद प्रेमहि परमाने ॥ १ ॥ सुखदाई सबहिनको भावे । जल सरूप होय अग्नि बुझावे ॥ शीतल होय सबहिनको भावे । समता होय तुरमता पावे ॥ २ ॥ निरवैरी निहकाम रहावे । साई सेती नेह लगावे ॥ साईके सबही जग माहीं । कापर दाय़ा कापर नाहीं ॥ ३ ॥ अपनो रूप जगत विखराना । कोहे आपन कोहै आना ॥ कासन बैर करो मोर भाई । अपनहि रूप रहा जग छाई ॥ ४ ॥ अपनो दांत जीभको काटे । तो कहैं कोई जीभ कहैं छांटे ॥ आपन अंगुरी आंख गडावे । तो कहैं अंगुरी काटि गिरावे ॥ ५ ॥ एकहि आतम सकल समाना । मायाके गुण आनहि आना ॥ अहै निजरूप सकलमें एकै । जो वस काशी सो बस मकै ॥ ६ ॥ मायावश हो सब जग भूला । मोर तोरके गर्वहिं फूला ॥ निरवैरी निहकाम सु होवे । सतगुरु ज्ञान बैर सब खोवे ॥ ७ ॥

समौ-कंचन कांच है एक सम, दुष्ट मित्र सब एक । दूजा भाव न जानई, एक नामकी टेक ॥ १० ॥

(४३२)

कवीरपंथी—

सहज योग ७. रसनी ॥ ११ ॥

सतवाँ योग सहज है मीता । सहज भावसो सबही जीता ॥ एक विचार प्रेम उपजावे । पाँचै इन्द्री सहज समावे ॥ १ ॥ निरलोभी होय लोभ भुलावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥ निरल्लेप कितहुँ नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागै ॥ सहज ध्यान रहै लौलाई । सहजे सहजे पार लगाई ॥ ३ ॥ जा घट ज्ञान सहज समावे । सहजे माया आप भुलावे ॥ सहजे परिचय आतम होई । ब्रह्मरूपमें सहज समोई ॥ ४ ॥ सहज समाधि भले जग जाने । गुरु प्रतापते सहज पिछाने ॥ जप तप योग सहजमें आवे । काया कष्ट न कबहुँ करावे ॥ ५ ॥ आतम परिचय सहजहिं पावे । खुले नैन सो दरस करावे ॥ विना सहज दूसर कछु नहीं । सहजेमें सब रहा समाई ॥ ६ ॥ सहज योग जो कोई धरै । आप तरे औ जगको तारे ॥ सहजहिं आतम ब्रह्म प्रकाशा ॥ सहजे जीव मुझान विलासा ॥ ७ ॥ विना सहज नहीं भव पारा । विना सहज बूढे भव धारा ॥ कहे कवीर सुनो नर लोई । सहजे सहज भया सब कोई ॥ ८ ॥

समौ-सब जग झूठा जानिके, गहे नाम सत सार ।

सहजे सहजे प्रकट भया, सतगुरु शब्द सम्हार ॥ ११ ॥

शून्य योग ८ । रसनी ॥ १२ ॥

आठम योग शून्य है नीके । विना नाम जप लागु सुफीके ॥ सहजे नाम विदेह समावे । विना नाम कहाँ सुख पावे ॥ १ ॥ शून्यहिते सब जग उपराजा । शून्यहिते भव शब्द अवाजा ॥ शून्य सहज एक नाम विराजे । अनहद बाजा बाजन बाजे ॥ २ ॥ सहज शून्य जो लावे ध्याना । अलख लखे आप बलवाना ॥ नाम सहज शून्यमें होई । अलखहिं लखे आप है सोई ॥ ४ ॥

शब्दावली

(४३३)

सहज शून्य जो ध्यान लगावे । भौजल तरत वार नहीं लावे ॥ सुराते शब्दमें सहज समावे । सहज समाधि परमपद पावे ॥६॥ जब लग नाम विदेह न आवे । तब लग सहज समाधि न पावे ॥ ध्यान विदेह औ ज्ञान विदेहा । सहज समाधिमें चहिये एहा ॥६॥ ध्यान विदेह लखे जब प्रानी । विदेह नाम मिले परमानी ॥ काया नाम सबे जग जाने । नाम विदेह विरले पहिचाने ॥ ७ ॥

समौ-ज्ञान विचार विवेकसो, शील संतोष समय ।

नाम गहे निरभय रहै, सहज सतलोक समय ॥ १२ ॥

शब्द सनेही होय रहै, जगते रहै उदास ।

सुख सागरमें घर करै, सत्य नाम विश्वास ॥

अब्दांगयोगका सार (१) ज्ञान परीक्षा साखी ।

ज्ञानी लक्षण चार हैं, सुनि त्यागो विस्माद ।

निरालंब निहभ्रमपुनि, निर्वासिक निहस्वाद ॥ १ ॥

भावार्थ-ज्ञानकी परीक्षा चार गुणोंसे होती है-

१ निरालम्ब, २ निःभ्रम, ३ निर्वासना, ४ निःस्वाद ॥

(२) विचार परीक्षा ।

विचार परीक्षा चार है, निर्मोही निरबन्द ।

निःशंक निरावरण सोई, छुटे कालको फन्द ॥ २ ॥

भावार्थ-विचार योगकी प्राप्ति इन चार लक्षणोंसे जानी जाती है-१ निर्मोही होवे, २ निर्वन्ध हो, ३ निःशंक हो, ४ निरावरण अर्थात् आत्मरूपमें सन्देह न हो ॥

(३) विवेक परीक्षा ।

सर्वज्ञी सुचेत होय, सावधान मन मार ।

सार आही सुजानिये, विवेक परीक्षा चार ॥ ३ ॥

भावार्थ-१ सर्वज्ञी अर्थात् किसी बातको सुनतेही उसकी तहको पहुँच जाना । २ सुचेत अर्थात् सदा हृदयका जाग्रत

(४३४)

कवीरपंथी-

रखना, गाफिल न होना, प्रमादमें न भूलना, ३ सावधान मन इन्द्री आदि सबोंपर सदा दृष्टि रखना, जिसमें ये ठगने न पावें। ४ सारग्राही-कैसा भी प्रसंग उलटा-सुलटा सम्मुख आकर उपस्थित हो उसमेंसे उत्तम सार ले लेना ॥

(४) शील परीक्षा ।

शुचि साधन संयम करन, श्रवण करन गुरु वानि । विनय वचन सब सो कहै, रूप आपनो जानि ॥४॥

भावार्थ-जिसमें शील आता है-उसमें चार गुण आकर वास करते हैं। १ पवित्रता-भीतर बाहर दोनों प्रकारसे पवित्र रहता है। २ संयम-शारीरिक मानसिक जितने कार्य हैं सब नियम पूर्वक करता है। ३ गुरुकी वाणी और उपदेशमें श्रद्धा (विश्वास) रखता है। ४ नम्रता-सबके साथ कोमलतासे वरतता है।

५ संतोष परीक्षा ॥ ४ ॥

संतोष परीक्षा सुनि लीजे । अयाची अमानी मन दीजे ॥ स्थिर वाच्छा नहि करई । सो संतोषी संत उच्चरई ॥५॥

भावार्थ-जिसके हृदयमें संतोषका वास होता है वह- १ अयाँची-अर्थात् यथा प्राप्त संतुष्ट रहकर उसीमें निर्वाह कर लेता है किसीसे याचना करनेकी इच्छा नहीं रखता। २ अमानी-मिथ्या अभिमान कर आप दुःखी नहीं होता; दूसरोंको भी दुःखी नहीं करना। ३ स्थिर-अर्थात् सदा धैर्यके साथ अपना सब कार्य करता है कभी घबराता नहीं। ४ अबाँछित-यथा प्राप्तमें संतुष्ट रहनेवाला अधिककी वांछाही क्यों करेगा।

६ निर्वर परीक्षा ४.

सुहिरदयता शीतलता, समता जान सुजान । सुखदाई सब जीवको, निरवैरी पहिचान ॥ ६ ॥ भावार्थ-निर्वैरता जिसमें आती है वह- १ सुहृद होजाता है

शब्दावली

(४३५)

किसीके साथ किसी अवस्थामें भी छल कपटका वर्ताव नहीं करता । २ शीतलता-अर्थात् सदा शान्त अकोध रहता है । ३ समता-धारण करता है अर्थात् सब जीवोंके सुख दुःखोंको अपने आत्माके समानही समझकर उनसे समानता वरतता है । ४ सुखदाई-सबके लिये सुखदाई होता है अर्थात् कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे किसीको दुःख होवे ।

७ सहज परीक्षा ४.

निह प्रपंच निहतरंग रु, निर्द्भन्द निरलेप । चारौ लक्षण सहजके, मिटे सकल विशेष ॥ ७ ॥

भावार्थ-सहजयोग अर्थात् सहज वृत्तिको धारण करनेवालोंमें चार गुण स्वभावसेही वास करते हैं । १ निष्प्रपंचता-सहज वृत्तिवाला पुरुष प्रपंचमें कभी नहीं फँसता-जहाँ कहीं प्रपंचकी वृद्धि देखता है आप वहाँसे खसक जाता है । २ निहतरङ्ग-नाना प्रकारके मनके तरङ्गोंसे अपनेको बचा रखता है । ३ निर्द्भन्द-द्रन्दसे अलग रहता है । ४ निलैप-सदा सबमें रहते हुए भी निलैप-रहता है ।

“सब संग रसिये सब संग बसिये सबका लीजे नाम । हाँजी हाँजी सबकी कीजे. रहिये अपने ठाम ॥”

८ शून्य ।

लव धीरज अरु ध्यान जो, मिली समाधि है चार । ये लक्षण हैं शून्यके, किये संत प्रचार ॥ ८ ॥

भावार्थ-शून्य अथवा समाधिवानके ४ लक्षण हैं । १ लव-एक ओर वृत्ति लगी रहै. २ धीर्य-जिस काममें लगे दृढ होकर लगे. ३-ध्यान-जिधर वृत्ति जाय उधरही तन्मय हो जावे. ४-समाधि-ध्येय वस्तुमें ऐसा निमग्न हो जाना कि, जुदाई जान न पड़े ॥

(४३६)

कवीरपंथी-

समौ-ये बत्तिस जब ऊगहीं, तैतीसो छिप जाय । कहै कवीर सुनु गोरखा, आवा गमन नसाय ॥

इति अष्टाङ्ग योगकी रमनी ॥

रमनी--करीमकी हिकमत ॥

वाह करीम वलि हिकमत तेरी । खाक एक सूरत बहुतेरी ॥ औघे बासन नीर जमाया । जतन जतन करि नूर उपाया ॥ १ ॥ आप मनीका सकल पसारा । हिन्दू तुरुक कोई नहि न्यारा ॥ दम दम करि बोले सब कोई । दमके भीतर हरदम होई ॥ २ ॥ बाहर दमको लखै जो कोई । ताको आवा-गमन न होई ॥ दम लखिया जिन लखिया नामा । दम छूटा पाये निज ठामा ॥ ३ ॥ पीर पैगम्बर शेख मुलाना । तुम्हरी सिफत सुनि भै दिवाना ॥ कहै कवीर वह साहब न्यारा । यार वाः यार वाः यार हमारा ॥ ४ ॥

रमनी--काया मसजिद ॥

यार वा यार वा यार हमारा । सब जीवनका प्रान अधारा ॥ काया मसजिद अजब सँवारी । दोय खम्भा दस लगी किवारी ॥ १ ॥ ता भीतर होय बंग निमाजा । हरदम इरदम हरदम साजा ॥ एक मसजिद दसो दरवाजा । मन मुछा तहैं पठै निमाजा ॥ २ ॥ ज्ञान करद मौन दिल पकरी । बिस्मिल कीन्हो पांचो बकरी ॥ पांच चोर करै कुफराना । मारी सबदसूँ किया छिमाना ॥ ३ ॥ पांच पीर बसे इक थाना । शब्द अनाहद घुरै निशाना ॥ कहैं कवीर अजब कछु देखा । नूर नाम सत साहब पेखा ॥ ४ ॥

रमनी--मन ॥

मनकी मूठ लखै जो कोई । सो जन संत पारखी होई ॥ नगन मगन बकला कंद खाई । देखि दिसा मनको पतियाई ॥ १ ॥ बहु विधि बकता चतुर परवाना । अलप अहारी काया खीना ॥ बहु बुधिमान प्रेम हित रोवै । रंचक चाह रसातल बोवै ॥ २ ॥

शब्दावली

(४३७)

ताके फंद परे जो कोई । रंचक सुख दुख बहुते होई ॥ कहै कवीर सोई निज दासा । जाको पारबल्लकी आसा ॥ ३ ॥

साखी-जो तू चाहे मुड़झको, मति कछु राखे आस । मुड़झ सरीखा होय रहो, सब कुछ तेरे पास ॥

रमैनी-मन राजा ॥

मन राजा संग पवन वजीरा । चित चंचल निश्चल नहि थीरा ॥ पांच मवासो त्रिगुण खाई । पांच पचीस जिनके संग भाई ॥ तैंतीसो मिलि द्रन्द्र मचावैं । मन राजाको नाच नचावैं ॥ ज्ञान सूरमा बीडा लीन्हा । तैंतीसों पर डेरा दीन्हा ॥२॥ पांच मवासी मिलिया आई । मन राजा पर फिरी दुहाई ॥ जोग जुगतका लशकर साजा । गगन दमामा निरभय बाजा ॥ ३ ॥ झलकत चन्दा जोति अपारा । मिटिगा तिमिर भया उजियारा ॥ गुरु परताप सकल बस हूआ । नहीं कोइ जूझा नहि कोइ मूआ ॥४॥ आप आपमें सबही जाना । जिन जाना तिन निजके माना ॥ कहैं कवीर या पद को बूझे । आपा मिटे तबही घर सूझे ॥५॥

साखी-ऐसी बानी बोलिये, मनका आपा खोय । या आपाको डार दे, दया करै सब कोय ॥

रमैनी-कथता बकता ॥

कथता बकता श्रोता सोई । आप विचारे ज्ञानी होई ॥ चंचल चपल बुधिका बेला । अगिन पवन पानीका मेला ॥ १ ॥ नव दरवाजा दसूं दुवारा । बूझहु ज्ञानी ज्ञान विचारा ॥ माटीका गौन पवनका सूआ । पांच तत्त्वले परगट हूआ ॥ २ ॥ काया माटी बोले पवना । बूझे पण्डित सूवा कौना ॥ मुई सुरति बाद अहं- कारा । एक न सूवा बोलन हारा ॥ ३ ॥ जिस कारन तप तीरथ जाहीं । रतन पदारथ है घर माहीं ॥ पठ पठ पंडित वेद बखाना ।

(४३८)

कवीरपंथी-

भीतर होती वस्तु न जाना ॥ ४ ॥ हूँ न मरूँ मेरी मरै बलाय । बोलन हारा रहै समाय ॥ कहैं कवीर गुरु ब्रह्म बताया । मरता जीता नजर न आया ॥ ५ ॥

सा०-राम मरै तो हम मरै, नातर मरे बलाय । अविनासीको चीगुटा, मरे न मारा जाय ॥

रमनी । बोलना ।

बोलना कहा कहिये रे भाई । बोलत बोलत तत्त्व नसाई ॥ १ ॥ बोलत बोलत बढै विकारा । चित्त बोलेका होय विचारा ॥ २ ॥ संत मिलै कछु कहिँ कहिये । मिलै असंत मौन होय रहिये ॥ ३ ॥ ज्ञानी सो बोले हितकारी । मूरख सो बोले झखमारी ॥ ४ ॥ कहैं कवीर आधा घट डोलै । भरा होय तो मुखों न बोले ॥ ५ ॥

सा०-बोली तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल । हिये तराजू तौलके, तब मुख बाहर खोल ॥

रमनी सातगुक्की ।

गुरु गुरु कहत सकल संसारा । गुरु सोइ जिन तत्त्व विचारा ॥१॥ प्रथम गुरु हैं माता पिता । रज वीरजके जो हैं दाता ॥२॥ दूसर गुरु है मनसा दाई । गर्भवासको बंध छुड़ाई ॥ ३ ॥ तीसर गुरु जिन धरिया नामा । लेले नाम पुकारे गामा ॥ ४ ॥ चौथे गुरु जिन दीच्छा दीन्हा । जग व्यवहार रीति सब कीन्हा ॥ ५ ॥ पांचे गुरु जिन वैष्णव कीन्हा । रामनामको सुमिरन दीन्हा ॥ ६ ॥ छठे गुरु जिन भ्रम गढ तोडा । दुविधा मेटि एकसों जोडा ॥ ७ ॥ सातम गुरु सत शब्द लखाया । जहाँका तत ले तहाँ समाया ॥ साखी-सात गुरु संसारमें, सेवक सब संसार । सतगुरु सोई जानिये, भव जल तारे पार ॥

रमनी निर्वाण देश ॥

हंस वा दिस करहु पयाना । जा देस बसै पुरुष पुराना ॥ हल न चले जहाँ बहै न कुदारा । अमृत भोजन करै अहारा ॥ १ ॥

शब्दावली

(४३९)

चले न चरखा बजै न ताती । अम्बर चौर पहिरे बहु भांती ॥ बरषै न मेघ चुवै नहिं पानी । शीतल सुरति अमी भरि आनी ॥२॥ चंद न सूर दिवस नहिं राती । कुल नहिं भेद वरन नहिं जाती ॥ रोग न दोष जहँ शोक न संतापा । कहै कवीर जहँ समरथ आपा ॥३॥

साखी-सुरति समानो निरतमें, निरत रही निरधार । सुरति निरति परचा भया, तब पाया दीदार ॥

रमैनी गुरुकी ॥

गुरु सम दाता कोड़ नहिं भाई । मुक्तिक मार्ग दियो बताई ॥ गुरु विन हिरदय ज्ञान न आवे । ज्यों कस्तूरी मिरग भुलावे ॥ गुरु विनु मिटै न अपनो आपा । भरम जेवरी बाँध्यो साँपा ॥ गुरु विनु केहरि कूपहिं पडिया । गुरु विनु गज छायाहिं लडिया ॥ गुरु विन स्वान देखि बहु भेखा । मन्दिर एक काँचको देखा ॥ चहुँ दिसि दीखै अपनी छाया । भूँकत भूँकत प्राण गँवाया ॥ गुरु विन मुवा नलनी सो बंधा । गुरु विन कपि पडो सो फंदा ॥ कहैं कवीर भरम्यो संसारा । गुरु विन सतगुरु किम उत्तै पारा ॥

साखी-भरम जेवरी गज बंध्यो, फिर जन्मे मर जाय । कहै कवीर सतगुरु मिलै, तब सतलोक सिधाय ॥

रमैनी-विरह शर्ता ॥

तैं कहैं जाने बिरहकी बाती । प्रेम न उपजे तेरी छाती ॥ जैसी प्रीति मच्छ जो कीन्हा । जलते विछुडे जीवहिं दीन्हा ॥ ऐसी प्रीति मच्छीकी जानी । सूवा पीछे माँग्यो पानी ॥ धन सरवर जहँ काली माटी । प्रीतम बिछुडे छाती फाटी ॥ कब तोर हाड रु माँस सुखाया । कब तोर नयनन लोहू आया ॥ कब तैंने प्रेम पियाला पीया । कब तैं पिय मार्ग सिर दीया ॥ कहैं कवीर योही तन खोया ॥ पाँव पसार पेट भर सोया ॥

(४४०)

कवीरपंथी-

सा०-जब लग विरह उपजे नहीं, तब लग नहिं पहिचान । प्रेम परगटचो जब अंगमें, मन तब किया कुरबान ॥

रसनी-गुरुटककी ॥

जाको टेक एक गुरु दाता । ताको और कछु न सुहाता ॥ पय जो बिगडा माखन होई । बिगडे छाँछ कहै नहिं कोई ॥ पतिव्रताको लाँछन होई । गनिका बिगडे कहत न कोई ॥ सूरा भागा आप विगोई । कायर भागा कहै न कोई ॥ नटनी नाचै आपा खोई । देखन हार पड़े नहिं कोई ॥ भूला मनको जो समुझावे । आदि अंत सोइ संत कहावे ॥ कहैं कवीर हम एता कहिया । सांच माने सो नरकहिं गइया ॥

सा०-डालकी चूकी बांदरी, शब्दका चूका हंस । कहैं कवीर धर्मदास सो, दोऊ निरफल वंस ॥

रसनी-गुरु महिमा ॥

सतगुरु बोले अमृत वानी । गुरु विन मुक्ति नहीं रे प्रानी ॥ गुरु हैं आदि अंतके दाता । गुरु है मुक्ति पदारथ आता ॥ गंगा काशी अस्थाना । चारि वेद गुरु गमते जाना ॥ गुरु है सुरसरि निर्मल धारा । विनु गुरु घटना हो उजियारा ॥ अडसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आवे । गुरुकी दया घर बैठहिं पावे ॥ गुरु कहै सोई पुन करिये । मातु पिता दोऊ कुल तरिये ॥ गुरु पारस परसे नर लोई । लोहते कंचन होय सोई ॥ शुक देव गुरु जनक बिदेही । वो भी गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु प्रह्लाद पठाये । भक्ति हेतु जिन दर्शन पाये । कागभुसुंड शम्भु गुरु कीन्हा ॥ अगम निगम सबही कहि दीन्हा । ब्रह्मा गुरु अग्निको कीन्हा ॥ होम यज्ञ जिन आज्ञा दीन्हा ॥ वशिष्ठ गुरु किया रघुनाथा । पाइ दरस तब भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरना । पाइ भक्ति तब तारन तरना ॥ नारद दिच्छा धिमर सो पायो । चौरासी सो

शब्दावली

(४४१)

तुरत छुडायो ॥ गुरु कहै सोई है साँचा । विनु पगिचय सेवक है काँचा ॥ कहै कवीर गुरु आपु अकेला । दश औतार गुरुका चेला ॥ साखी-राम कृष्ण ते को बडा, उनहु तो गुरु कीन । तीन लोकके वै धनी, गुरु आगे आधीन ॥

रमनी—गुलाहाकी ॥

जुलहा कहि कहि जग भरमाया । मो जुलहेका मरम न पाया ॥ समझ विना जिव भरम भुलाना । विनही सूत न पसारे ताना ॥ धरनि अकास बिच खाड खुदाई । चन्द सुर दोय नली भराई ॥ आदि नामका पूरन पूरा । चेतहु अंधा पथ है दूरा ॥ सूत कुसूत बुने नर कोरी । वाको सुरति निरति है जोरी ॥ हम षट दर्शन हम षट भेखा । हमही तत्व अनूप अलेखा ॥ हम हैं सकल सकल हम माहीं । हमते और दूसरा नाही ॥ सबही कर्म हमारा कहिया । हम करमनते न्यारा रहिया ॥ निरगुन सगुन खेल हमारा । हमरा चौदह लोक पसारा ॥ बन्दीछोर है विरद हमारा । हमही बन्दी छुडावन हारा ॥ जुग जुग बन्द छुडावन आये । ताते बंदीछोर कहाये ॥ कहै कवीर हम अगम अपारी । स्वसम नली सो एक हमारी ॥

रमनी—स्वरूप महिमा ॥

जीवत जीव जागनी ठानै । माया ब्रह्म दोऊ पहिचाने ॥ तीन सुरूप एकहि देखा । ताको निहचल विज्ञान विसेखा ॥ माया ब्रह्म दोऊते न्यारा । आगे पारब्रह्म उजियारा ॥ विज्ञानीको कोइ नहि पावे । वाहि स्वरूप नजर नहि आवे ॥ तूनकी ओट पहाड़ लुकाना । ऐसे ताहि दूर मति जाना ॥ है हममें हमही सा देखा । निज सुरूपको यही विशेषा ॥ आवे कहीं कहुँ नहि जाई । समुन्द्र लहरि समुन्द्र समाई ॥ ज्यों बालक खेले फिरकाई । देखि परे तो सकल फिराई ॥ जो हिरदामें होय रहे थीरा । ताका विनसे नाहि शरीरा ॥ चंचल निहचल यहि रूपा । निरखे देखि यहि वस्तु

(४४२)

कवीरपंथी-

अनूपा ॥ बिछरन मिलन होय कछु केरा । जैसे सोवै सुपना तेरा ॥ सोवे जहाँ तहाँ उठि जागे । पंछी मनि राह उठि लागे ॥ आगे पीछे मध्यम कोई । ऐसा सहज सरूपी होई ॥

साखी-सहज सरूपी होय रहै, दिलकी दुविधा जाय । अकह कवीरा क्या कहै, उलटि कालको खाय ॥

रमनी-कालजीत ॥

काल न आवे निहचल होई । अब यह जतन करो सब कोई ॥ निहचल चित्त न कबहुँ चलावे । ताको काल न कबहुँ सतावे ॥ परगट कहा तब है जग माहीं । जागे जाकूँ सूझे नाहीं ॥ जो कोइ चेतन होय करि जागे । ताके तसकर कबहुँ न लागे ॥ कलह कल्पना सब विधि खोई । निहचे सहज सरूपी होइ ॥ इच्छा ते जग जीवत नाई । ब्रह्म अनिच्छित गहै चित लाई ॥ कारज कारनकी यह बाता । माया माहीं ब्रह्म समाता ॥ माया माहीं ब्रह्म फंदाया । ताते पुरुष प्रकृति कहाया । अच्छर है इक और अनूपा ॥ पारब्रह्म अन इच्छित रूपा । पूर्ण ब्रह्मते न्यारा होई । परमहंसनको प्यारा सोई ॥ हंसदसा होय जु भाई । ताको काल कबहुँ नहिं खाई ॥

साखी-काल काल सबही कहे, काल न जाने कोय ।

जेती मनकी कल्पना, काल कहावै सोय ॥

रमनी-निर्वाणपद ।

ऐसा ब्रह्म विचारो भाई । शब्द उठै धुनि कहाँ समाई ॥ काष्ठ मथि २ अगिन उपाई । उलटि अग्नि काष्ठको खाई ॥ दोनों नास भयो इक ठाऊँ । उड़ गइ भसम धरेका नाऊँ ॥ भस्म भई उड़ कहवों गई । सो गति याकी ऐसी भई ॥ सुए जीव जइहो जाहाँ । जीवतही ले राखो ताहाँ ॥ जैसो केल कदली खंद । ऐसा पारब्रह्म गोविन्द ॥ खोजत खोजत पायो ठौर । मैं जानो कछु आगे और ॥ नहिं कछु नहिं कछु नहिं कछु सोई । पंछी पीछे खोज न होई ॥

शब्दावली

(४४३)

दास कवीर तहां लौलीन । आगे पन्थ न पीछे चीन ॥

सा०—सबही घर है गांवमें, गाँव कौन घर माहिं ।

ऐसे सब जग ब्रह्ममें, न्यारो कितहुँ नाहिं ॥

सत्यनाथ ।

रमैनी—स्वरूप पहिचान ॥

आपने रूप राम हम पाये । ताते जीवन मुक्ति घर आये ॥ तब हम भक्ति कीन हरि केरी । आसा राखी मनसा घेरी ॥ आसा मनसा भई निरासा । छुट गये बन्धन भये खुलासा ॥ तब हम योगयुक्ति चित धरते । अष्ट कला मन पवना भरते ॥ अब हम पायो अपना भेव । आपुहि कर्ता आपुहि देव ॥ तब हम जान्यो यह अब जानी । अन जानेसे करी पहिचानी ॥ गयो भरम मन बव्यो हुलास । सहजहिं राम कवीरा दास ॥

सा०—अर्थ धर्म अरु काम तजि, देह काल सिर धूर ।

संशय नाहीं मुक्तिमें, ब्रह्म रहा भरपूर ॥

रमैनी एकतार ।

भजि यकतार भ्रममति भूलो । है यकतार सबनको दूलो ॥ बिन यकतार कस पतिवरता । एक पिया विन सबै अविस्था ॥ १॥ राम राम कहि भक्ति दिठावे । बिन यकतार राम कहँ पावे ॥ भागवत सौ पुरान उचारे । निगम चारि सुनि श्रुति विचारे ॥२॥ वेद पढै पढि अरथ बतावे । विन यकतार थाह नहिं पावै ॥ बिन अंकूर बीज नहिं ऊगे । विन यकतार हंस कहँ पूगे ॥ ३ ॥ बिन यकतार भक्ति क्या कीजे । गुरु प्रताप अमीरस पीजे ॥ रंकार जहँ अनहद गाजे । ता ऊपर यकतार विराजे ॥४॥ इंगला पिंगला सुषमन साधै । ले उदान पौन तहँ बांधे ॥ अरधै उरधै सुरति लगावे । विन यकतार पीव नहिं पावै ॥ ५ ॥ वेद पुरान अरु शास्तर सोधै । अर्थ करि करि मन परबोधै ॥ जहँलग वेद तहांलग