कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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चले न चरखा बजै न ताती । अम्बर चौर पहिरे बहु भांती ॥ बरषै न मेघ चुवै नहिं पानी । शीतल सुरति अमी भरि आनी ॥२॥ चंद न सूर दिवस नहिं राती । कुल नहिं भेद वरन नहिं जाती ॥ रोग न दोष जहँ शोक न संतापा । कहै कवीर जहँ समरथ आपा ॥३॥
साखी-सुरति समानो निरतमें, निरत रही निरधार । सुरति निरति परचा भया, तब पाया दीदार ॥
रमैनी गुरुकी ॥
गुरु सम दाता कोड़ नहिं भाई । मुक्तिक मार्ग दियो बताई ॥ गुरु विन हिरदय ज्ञान न आवे । ज्यों कस्तूरी मिरग भुलावे ॥ गुरु विनु मिटै न अपनो आपा । भरम जेवरी बाँध्यो साँपा ॥ गुरु विनु केहरि कूपहिं पडिया । गुरु विनु गज छायाहिं लडिया ॥ गुरु विन स्वान देखि बहु भेखा । मन्दिर एक काँचको देखा ॥ चहुँ दिसि दीखै अपनी छाया । भूँकत भूँकत प्राण गँवाया ॥ गुरु विन मुवा नलनी सो बंधा । गुरु विन कपि पडो सो फंदा ॥ कहैं कवीर भरम्यो संसारा । गुरु विन सतगुरु किम उत्तै पारा ॥
साखी-भरम जेवरी गज बंध्यो, फिर जन्मे मर जाय । कहै कवीर सतगुरु मिलै, तब सतलोक सिधाय ॥
रमैनी-विरह शर्ता ॥
तैं कहैं जाने बिरहकी बाती । प्रेम न उपजे तेरी छाती ॥ जैसी प्रीति मच्छ जो कीन्हा । जलते विछुडे जीवहिं दीन्हा ॥ ऐसी प्रीति मच्छीकी जानी । सूवा पीछे माँग्यो पानी ॥ धन सरवर जहँ काली माटी । प्रीतम बिछुडे छाती फाटी ॥ कब तोर हाड रु माँस सुखाया । कब तोर नयनन लोहू आया ॥ कब तैंने प्रेम पियाला पीया । कब तैं पिय मार्ग सिर दीया ॥ कहैं कवीर योही तन खोया ॥ पाँव पसार पेट भर सोया ॥