भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(४३९)

चले न चरखा बजै न ताती । अम्बर चौर पहिरे बहु भांती ॥ बरषै न मेघ चुवै नहिं पानी । शीतल सुरति अमी भरि आनी ॥२॥ चंद न सूर दिवस नहिं राती । कुल नहिं भेद वरन नहिं जाती ॥ रोग न दोष जहँ शोक न संतापा । कहै कवीर जहँ समरथ आपा ॥३॥

साखी-सुरति समानो निरतमें, निरत रही निरधार । सुरति निरति परचा भया, तब पाया दीदार ॥

रमैनी गुरुकी ॥

गुरु सम दाता कोड़ नहिं भाई । मुक्तिक मार्ग दियो बताई ॥ गुरु विन हिरदय ज्ञान न आवे । ज्यों कस्तूरी मिरग भुलावे ॥ गुरु विनु मिटै न अपनो आपा । भरम जेवरी बाँध्यो साँपा ॥ गुरु विनु केहरि कूपहिं पडिया । गुरु विनु गज छायाहिं लडिया ॥ गुरु विन स्वान देखि बहु भेखा । मन्दिर एक काँचको देखा ॥ चहुँ दिसि दीखै अपनी छाया । भूँकत भूँकत प्राण गँवाया ॥ गुरु विन मुवा नलनी सो बंधा । गुरु विन कपि पडो सो फंदा ॥ कहैं कवीर भरम्यो संसारा । गुरु विन सतगुरु किम उत्तै पारा ॥

साखी-भरम जेवरी गज बंध्यो, फिर जन्मे मर जाय । कहै कवीर सतगुरु मिलै, तब सतलोक सिधाय ॥

रमैनी-विरह शर्ता ॥

तैं कहैं जाने बिरहकी बाती । प्रेम न उपजे तेरी छाती ॥ जैसी प्रीति मच्छ जो कीन्हा । जलते विछुडे जीवहिं दीन्हा ॥ ऐसी प्रीति मच्छीकी जानी । सूवा पीछे माँग्यो पानी ॥ धन सरवर जहँ काली माटी । प्रीतम बिछुडे छाती फाटी ॥ कब तोर हाड रु माँस सुखाया । कब तोर नयनन लोहू आया ॥ कब तैंने प्रेम पियाला पीया । कब तैं पिय मार्ग सिर दीया ॥ कहैं कवीर योही तन खोया ॥ पाँव पसार पेट भर सोया ॥

(४४०)

कवीरपंथी-

सा०-जब लग विरह उपजे नहीं, तब लग नहिं पहिचान । प्रेम परगटचो जब अंगमें, मन तब किया कुरबान ॥

रसनी-गुरुटककी ॥

जाको टेक एक गुरु दाता । ताको और कछु न सुहाता ॥ पय जो बिगडा माखन होई । बिगडे छाँछ कहै नहिं कोई ॥ पतिव्रताको लाँछन होई । गनिका बिगडे कहत न कोई ॥ सूरा भागा आप विगोई । कायर भागा कहै न कोई ॥ नटनी नाचै आपा खोई । देखन हार पड़े नहिं कोई ॥ भूला मनको जो समुझावे । आदि अंत सोइ संत कहावे ॥ कहैं कवीर हम एता कहिया । सांच माने सो नरकहिं गइया ॥

सा०-डालकी चूकी बांदरी, शब्दका चूका हंस । कहैं कवीर धर्मदास सो, दोऊ निरफल वंस ॥

रसनी-गुरु महिमा ॥

सतगुरु बोले अमृत वानी । गुरु विन मुक्ति नहीं रे प्रानी ॥ गुरु हैं आदि अंतके दाता । गुरु है मुक्ति पदारथ आता ॥ गंगा काशी अस्थाना । चारि वेद गुरु गमते जाना ॥ गुरु है सुरसरि निर्मल धारा । विनु गुरु घटना हो उजियारा ॥ अडसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आवे । गुरुकी दया घर बैठहिं पावे ॥ गुरु कहै सोई पुन करिये । मातु पिता दोऊ कुल तरिये ॥ गुरु पारस परसे नर लोई । लोहते कंचन होय सोई ॥ शुक देव गुरु जनक बिदेही । वो भी गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु प्रह्लाद पठाये । भक्ति हेतु जिन दर्शन पाये । कागभुसुंड शम्भु गुरु कीन्हा ॥ अगम निगम सबही कहि दीन्हा । ब्रह्मा गुरु अग्निको कीन्हा ॥ होम यज्ञ जिन आज्ञा दीन्हा ॥ वशिष्ठ गुरु किया रघुनाथा । पाइ दरस तब भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरना । पाइ भक्ति तब तारन तरना ॥ नारद दिच्छा धिमर सो पायो । चौरासी सो

शब्दावली

(४४१)

तुरत छुडायो ॥ गुरु कहै सोई है साँचा । विनु पगिचय सेवक है काँचा ॥ कहै कवीर गुरु आपु अकेला । दश औतार गुरुका चेला ॥ साखी-राम कृष्ण ते को बडा, उनहु तो गुरु कीन । तीन लोकके वै धनी, गुरु आगे आधीन ॥

रमनी—गुलाहाकी ॥

जुलहा कहि कहि जग भरमाया । मो जुलहेका मरम न पाया ॥ समझ विना जिव भरम भुलाना । विनही सूत न पसारे ताना ॥ धरनि अकास बिच खाड खुदाई । चन्द सुर दोय नली भराई ॥ आदि नामका पूरन पूरा । चेतहु अंधा पथ है दूरा ॥ सूत कुसूत बुने नर कोरी । वाको सुरति निरति है जोरी ॥ हम षट दर्शन हम षट भेखा । हमही तत्व अनूप अलेखा ॥ हम हैं सकल सकल हम माहीं । हमते और दूसरा नाही ॥ सबही कर्म हमारा कहिया । हम करमनते न्यारा रहिया ॥ निरगुन सगुन खेल हमारा । हमरा चौदह लोक पसारा ॥ बन्दीछोर है विरद हमारा । हमही बन्दी छुडावन हारा ॥ जुग जुग बन्द छुडावन आये । ताते बंदीछोर कहाये ॥ कहै कवीर हम अगम अपारी । स्वसम नली सो एक हमारी ॥

रमनी—स्वरूप महिमा ॥

जीवत जीव जागनी ठानै । माया ब्रह्म दोऊ पहिचाने ॥ तीन सुरूप एकहि देखा । ताको निहचल विज्ञान विसेखा ॥ माया ब्रह्म दोऊते न्यारा । आगे पारब्रह्म उजियारा ॥ विज्ञानीको कोइ नहि पावे । वाहि स्वरूप नजर नहि आवे ॥ तूनकी ओट पहाड़ लुकाना । ऐसे ताहि दूर मति जाना ॥ है हममें हमही सा देखा । निज सुरूपको यही विशेषा ॥ आवे कहीं कहुँ नहि जाई । समुन्द्र लहरि समुन्द्र समाई ॥ ज्यों बालक खेले फिरकाई । देखि परे तो सकल फिराई ॥ जो हिरदामें होय रहे थीरा । ताका विनसे नाहि शरीरा ॥ चंचल निहचल यहि रूपा । निरखे देखि यहि वस्तु

(४४२)

कवीरपंथी-

अनूपा ॥ बिछरन मिलन होय कछु केरा । जैसे सोवै सुपना तेरा ॥ सोवे जहाँ तहाँ उठि जागे । पंछी मनि राह उठि लागे ॥ आगे पीछे मध्यम कोई । ऐसा सहज सरूपी होई ॥

साखी-सहज सरूपी होय रहै, दिलकी दुविधा जाय । अकह कवीरा क्या कहै, उलटि कालको खाय ॥

रमनी-कालजीत ॥

काल न आवे निहचल होई । अब यह जतन करो सब कोई ॥ निहचल चित्त न कबहुँ चलावे । ताको काल न कबहुँ सतावे ॥ परगट कहा तब है जग माहीं । जागे जाकूँ सूझे नाहीं ॥ जो कोइ चेतन होय करि जागे । ताके तसकर कबहुँ न लागे ॥ कलह कल्पना सब विधि खोई । निहचे सहज सरूपी होइ ॥ इच्छा ते जग जीवत नाई । ब्रह्म अनिच्छित गहै चित लाई ॥ कारज कारनकी यह बाता । माया माहीं ब्रह्म समाता ॥ माया माहीं ब्रह्म फंदाया । ताते पुरुष प्रकृति कहाया । अच्छर है इक और अनूपा ॥ पारब्रह्म अन इच्छित रूपा । पूर्ण ब्रह्मते न्यारा होई । परमहंसनको प्यारा सोई ॥ हंसदसा होय जु भाई । ताको काल कबहुँ नहिं खाई ॥

साखी-काल काल सबही कहे, काल न जाने कोय ।

जेती मनकी कल्पना, काल कहावै सोय ॥

रमनी-निर्वाणपद ।

ऐसा ब्रह्म विचारो भाई । शब्द उठै धुनि कहाँ समाई ॥ काष्ठ मथि २ अगिन उपाई । उलटि अग्नि काष्ठको खाई ॥ दोनों नास भयो इक ठाऊँ । उड़ गइ भसम धरेका नाऊँ ॥ भस्म भई उड़ कहवों गई । सो गति याकी ऐसी भई ॥ सुए जीव जइहो जाहाँ । जीवतही ले राखो ताहाँ ॥ जैसो केल कदली खंद । ऐसा पारब्रह्म गोविन्द ॥ खोजत खोजत पायो ठौर । मैं जानो कछु आगे और ॥ नहिं कछु नहिं कछु नहिं कछु सोई । पंछी पीछे खोज न होई ॥

शब्दावली

(४४३)

दास कवीर तहां लौलीन । आगे पन्थ न पीछे चीन ॥

सा०—सबही घर है गांवमें, गाँव कौन घर माहिं ।

ऐसे सब जग ब्रह्ममें, न्यारो कितहुँ नाहिं ॥

सत्यनाथ ।

रमैनी—स्वरूप पहिचान ॥

आपने रूप राम हम पाये । ताते जीवन मुक्ति घर आये ॥ तब हम भक्ति कीन हरि केरी । आसा राखी मनसा घेरी ॥ आसा मनसा भई निरासा । छुट गये बन्धन भये खुलासा ॥ तब हम योगयुक्ति चित धरते । अष्ट कला मन पवना भरते ॥ अब हम पायो अपना भेव । आपुहि कर्ता आपुहि देव ॥ तब हम जान्यो यह अब जानी । अन जानेसे करी पहिचानी ॥ गयो भरम मन बव्यो हुलास । सहजहिं राम कवीरा दास ॥

सा०—अर्थ धर्म अरु काम तजि, देह काल सिर धूर ।

संशय नाहीं मुक्तिमें, ब्रह्म रहा भरपूर ॥

रमैनी एकतार ।

भजि यकतार भ्रममति भूलो । है यकतार सबनको दूलो ॥ बिन यकतार कस पतिवरता । एक पिया विन सबै अविस्था ॥ १॥ राम राम कहि भक्ति दिठावे । बिन यकतार राम कहँ पावे ॥ भागवत सौ पुरान उचारे । निगम चारि सुनि श्रुति विचारे ॥२॥ वेद पढै पढि अरथ बतावे । विन यकतार थाह नहिं पावै ॥ बिन अंकूर बीज नहिं ऊगे । विन यकतार हंस कहँ पूगे ॥ ३ ॥ बिन यकतार भक्ति क्या कीजे । गुरु प्रताप अमीरस पीजे ॥ रंकार जहँ अनहद गाजे । ता ऊपर यकतार विराजे ॥४॥ इंगला पिंगला सुषमन साधै । ले उदान पौन तहँ बांधे ॥ अरधै उरधै सुरति लगावे । विन यकतार पीव नहिं पावै ॥ ५ ॥ वेद पुरान अरु शास्तर सोधै । अर्थ करि करि मन परबोधै ॥ जहँलग वेद तहांलग

(४४४)

कवीरपंथी-

ओंकारा । केवल ब्रह्म वेद सो न्यारा ॥ ६ ॥ षट दर्शन जहँ कोह न देखा । वह यकतार सुरति सो पेखा ॥ जाको गुरु यकतार लखाया । पहुँचा धाम बहुरि नहि आया ॥ ७ ॥ जैसे सरिता सिन्धु समाई । ऐसे हंसे सुरति मिलाई ॥ है यकतार सजीवन बूटी । बिन यकतार बात सब झूठी ॥ ८ ॥ बात कहूँ तो कोइ न मानै । जिन देखा सोई पहिचानै ॥ पूरब जन्म भक्ति परगटाई । सो यकतारहि लखै बनाई ॥ ९ ॥ छर अच्छर दोनों ते न्यारा । है यकतार सकल आधार ॥ है सब रस पर जिह्वा नहि आवे । बैठि निरंतर नाद बजावे ॥ १० ॥ जप तप और अनेक दृढावे । बिन यकतार मुक्ति नहि पावे ॥ जप तप व्रत खीन होय जाई । बिन यकतार न हंसा पाई ॥ ११ ॥

समौ-सतगुरु सो साँचा रहै, सुरति रहै यकतार । कहै कवीर धर्मदास सो, पहुँचे लोक मंझार ॥

रमनी-ज्ञान विरह ॥

लागी चोट शब्दकी तनमें । गिरह नहिँ चैन चैन नहिँ बनमें ॥ सूरा खेत जबै मंडाना । ना जानू को रहै निदाना ॥ १ ॥ दूँदत फिहँ पीव नहिँ पाऊँ । औषधि मूल कहाँ घसि लाऊँ ॥ तुमसे वैद न हमसे रोगी । बिन दीदार क्यों जिये वियोगी ॥ २ ॥ एकहि रंग रंगी सब नारी । ना जानू को पियकी प्यारी ॥ कहै कवीर कोइ गुरुमुख पावे । बिन दरस न दीदार दिखावे ॥ ३ ॥

समौ-साधु हमारे शिरधनी, हम साधुनकी खेह । रोम रोममें रमि रहा, ज्यों बादलमें मेह ॥

रमनी षट दर्शन ।

बंदा ! दरसे सब घट माहीं । अंधरे अंखिया सूझत नाहीं ॥ या घट चन्दा या घट सूरा । या घट बाजै अनहदू तूरा ॥ १ ॥ या घट मथुरा या घट काशी । या घट पूरि रहा अविनाशी ॥

शब्दावली

(४४५)

या घट भीतर दस दरवाजा । पांच प्रधान छठी मन राजा ॥ २ ॥ या घट भीतर सोलह खाई । चक्र फिरे गढ मुसौ न जाई ॥ या घट भीतर धोबि पुरानी । कपडा धोवे विनु सिल पानी ॥ ३ ॥ धोयलेरे धोबिया मधुरिसि धारा । उत्तम निर्मल घाट हमारा ॥ कहै कवीर कोइ धोवे विचारी । जो धोवे सो उत्तरे पारी ॥ ४ ॥ समौ-घटहीमें सबहीं बसैं, जह लगि ज्ञान विलास । सब ऊपर साहब धनी, घटहीमें निज बास ॥

रमैनी—योग भोगकी ॥

दुनिया दिवानी हमहुं दिवाना । हमरे तो है अनहद ज्ञाना ॥ दुनिया पट पटंबर भोगी । हम तो ज्ञान पदार्थ योगी ॥ १ ॥ दुनिया चाहे हस्ती घोडा । हम पाय पियादे गढ तोडा ॥ दुनिया चाहे विषरा प्याला । हम तो नाम सदा मतवाला ॥ २ ॥ दुनिया अपने मारग जाई । हम तो सतकी राह चलाई ॥ कहैं कवीर हम पाई छाहीं । जीवतके संग सुवाके माहीं ॥ ३ ॥

साखी—हम वासी वहि देशके, पार ब्रह्मका खेल । दीपक पाया गैवका, बिन बाती बिन तेल ॥

आदि रमैनी ।

आदि रमैनी कहूँ विचारी । सुनियो संतो कथा निनारी ॥ युग छत्तीस छयानवे लाखा । अरब कोटि सत सुकृत भाखा ॥ १ ॥ जब नहिं होते शून्य बिस्मूत्रा । जब नहिं होते पाप औ पुत्रा ॥ न था वेद अरु ना थी बानी । ना था ब्रह्मा नहिं थी ब्रह्मानी ॥ २ ॥ ना था पवन नहीं था पानी । ना थी माया अकथ कहानी ॥ ना थी धरती नहीं अकासा । जब नहिं होता तत्त्व विलासा ॥ ३ ॥ जब नहिं होता तुरुक औ हिन्दू । माताका रक्त पिताका बिन्दू ॥ जब नहिं होता गाय कसाई । कहो विसमिछाह किन फरमाई ॥ ४ ॥ जब नहिं होता भादू माहा । कच्छ मच्छ नहीं बाराहा ॥ जब

(४४६)

कवीरपंथी—

नहिं होते रघुपति रावन । जब नहिं होते कृष्ण बलि बावन ॥ ५ ॥ जब नहिं होते शम्भु गौर । जब नहिं होते दश औतारा ॥ जब नहिं होते कूर्म औ शेष । जब नहिं शारद गौरि गणेशा ॥ ६ ॥ जब नहिं होते निरंजन राया । जिन जीवन कहैं बांधि झुलाया ॥ तेतीस कोट देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥ ७ ॥

समौ-कहैं कविर कछु ना होता, होता आप अलेख । तबका आप कवीर है, धरि धरि खेले भेख ॥

रमनी-एक ओंकार ॥

ऐसा ज्ञान विचारै कोई । सो नर जीवन मुक्तता होई ॥ पाँच तत्त्व गुण तीनों सोई । अविगत सो सब परगट होई ॥ १ ॥ बोलनहारा कहैं सो हूआ । कैसे उपजा कैसे मूआ ॥ पवनकी गाँठ सहज बनि आई । ताका बना बगूला भाई ॥ २ ॥ खुलि गइ गाँठ खोज नहिं पाया । पवनक पुतला पवन समाया ॥ जैसे बादल होत अकारा । तैसे दरसे यह संसारा ॥ ३ ॥ मिट गया बादल रहा अकासा । ऐसे आतमको न विनासा ॥ इस बहुरंगीका पार न पाया । कहैं कवीर गुरु भेद लखाया ॥ ४ ॥ पाया भेद भया उजियारा । साहब दरस्यो पार ओंकारा ॥ यही ज्ञान रतन है भाई । जो पावै सुख विलसे आई ॥ ५ ॥

साखी-ज्ञान रतनकी कोठरी, चुपकर दीजे ताल । पारिख आगे खोलिये, शीतल बचन रिसाल ॥

रमनी-गुरु महिमा ॥

गुरु मिले तो सत्य लखावे । बिन गुरु अन्त न कोऊ पावे ॥ जिन गुरुकी कीन्ही परतीती । एक नाम कर भवजल जीती ॥ १ ॥ गुरु प्रेमते जीव मराला । गुरु स्नेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु परगट गुरु गुप्त अधारा ॥ २ ॥ गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थल महाँ कीन निवासा ॥ चन्द सूर

शब्दावली

(४४७)

गुरु सब संसारा । गुरु विन होय न कोइ व्यवहारा ॥ ३ ॥ गुरु ब्रह्मा औ विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥ चर अचर जहां लगि सब देखा । गुरु विन कछु और नहिं पेखा ॥४॥ उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्है गुरु बरिष्ठा ॥ ये सब जीव गुरु मय जानो । गुरुसे भिन्न और नहिं मानो ॥ ५ ॥ गुप्त प्रगट सबही जग जाया । सबहीमें है सतगुरुकी छाया ॥ कहैं कवीर सो हंस पियारा । यही भांतिते गुरु दरश निहारा ॥ ६ ॥

सा०-सो गुरु निसिदिन बंदिषे, जासो पढ़ये नाम । नाम विना घट अंध है, ज्यों दीपक विन धाम ॥

रत्नो-गृहो रहनी ॥

गृही भाव भक्ति जो साधे । संत साधु सेवा अचराधे ॥ चर तजि बाहर कबहुँ न जाई । गुरु गम भक्ति करै लौलाई ॥ १ ॥ भक्ति करै निर्भय सहदानी । गुरु अरु साधु एक करि जानी ॥ जहां साधु तहैं सतगुरु वासा । जहैं सतगुरु तहैं मुक्ति निवासा ॥ २ ॥ जहां मुक्ति तहैं लोक उजागर । जहां लोक तहैं रह सुख सागर ॥ जहां सुख सागर तहां कवीर । भक्ति मध्य बाहर औ तीर ॥ ३ ॥ जहां मध्य तहैं पुरुष अमान । जहैं बाहर तहैं हंस सुजान ॥ जहां तीर तहैं निर्मल धीर । जहां मरन नहिं व्यापै पीर ॥ ४ ॥ जहां पीर तहैं संशय धीर । संशय मध्य असंशय नीर ॥ जहां नीर तहैं सुख संतोखा । जरा मरण नहिं व्यापै धोखा ॥५॥ जहां धोख तहैं आवै धीर । जहां धीर तहैं गहिर गंभीर ॥ जहां गंभीर तहां स्थिर होइ । जहां थीर तहैं लहरि न कोइ ॥ ६ ॥ लहरि नहीं तहैं आपै आप । आपा मेटि मिटै संताप ॥ आपा मेटे ममिता खोइ । भाव भक्ति करि मानुष होइ ॥ ७ ॥ मानुष होय गहै निरवाना । पावै सत्य सही अस्थाना ॥ मानुष पद छोड़े व्यवहारा । ताते फिरि आवै संसारा ॥ ८ ॥ संसार आइके भक्ति

(४४८)

कवीरपंथी-

कमाई । भक्ति कमाय भक्त कहाई ॥ भक्त कहाइके रहै उदासा । सत्य गुरु मिलै सत्य विश्वासा ॥ ९ ॥ सतगुरु मिलै तो संशय भागे । सो फिरि बहुरि अंक नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥ १० ॥ सतगुरु पाय दुसर घर नाही । आवागमन रहित घर जाहीं ॥ कहैं कवीर सत्य करि माने । साधु गुरु नहीं अन्तर जाने ॥ ११ ॥

सा०-साधु बड़े परमार्थी, चन ज्यों बरषे आय । तपन बुझावैं औरकी, अपनो पारस लाय ॥

रमनी-वैरागी (साधु) रहनी ॥

वैरागी उनमुन घर करई । हर्ष शोक कछु चित्त न धरई ॥ रुखा सूखा करै अहारा । निसि दिन आतम तत्त्व सम्हारा ॥ १ ॥ विकसित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥ रहिता रहै बहै नहीं कबहीं । सो वैरागी पावे हमहीं ॥ २ ॥ हमें पाय हमहीं अस होई । आवागमन मिटावे सोई ॥ आवा-गमन मिटावै काई । रहैं अधीन तत्त्व समाई ॥ ३ ॥ काया धरि काया कहैं बोधे । आवागमन रहित तत सोधे ॥ जीवत मरे मरे पुनि जीवैं । उनमुनि बसे महा रस पीवैं ॥ ४ ॥ महाशून्यमो रहै समाई । मरै न जिवे आवे न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हम मिलि रहै हमहि अस होई ॥ ५ ॥ भीतर रहनी कहा बनायी । बाहर रहनी देहुँ बतायी ॥ वैरागी आसन दृढ होई । रहै अजाँच जाँचे नहीं कोई ॥ ६ ॥ वैरागी अस चाल चलावे । तजै अखज तव हंस कहावे ॥ मद्य मांसके निकट न जाई । करै अहार सो काल कसाई ॥ ७ ॥ प्रेम भक्ति आने उर माहीं । द्रोह घात दिसि चित्तवै नाही ॥ जीव दया राखे हिय जानी । मन वच कर्म घात नहीं आनी ॥ ८ ॥ हंस दशा धरि पंथ चलावे । श्रवनि कण्ठी तिलक लगावे ॥ क्रोध

शब्दावली

(४४९)

कपट सब देह बहाई । क्षमा गंगमें पैठि नहाई ॥१॥ विन जाँचे जो कहु आवे । रूखा सुखा ना विलगावे ॥ गृही भक्ति जो सेवा लावे । ताको देखि न मोह बढावे ॥ १० ॥ वर्तमान वरते सो साधा । अधिक चहै तो होय व्याघा ॥ छाड़ि उपाधि रहै लवलीना । कहै कवीर सो हंस परवीना ॥ ११ ॥

सा०-संत सराहिये ताहिको, जाको सतगुरु टेक ।

टेक निवाहे देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥

रसनी ॥ गुरु शिष्य अविकारी ॥

साहब सेवक एकै होई । सदा बसंत खेले सब कोई ॥ गुरु शिष्य एक जब होई । चिन्ह न परे एककी दोई ॥ १ ॥ साहब सेवक वरण दुहेला । एकै वरण गुरु औ चेला ॥ जैसे फूल बास कहैं तोरी । पाछे तिल संग तेहि जोरी ॥ २ ॥ पाछे फूल सुवासहिं देई । तिल तजि तेल बास गहि लेई ॥ ऐसे गुरु शब्द जो देई । चेला गहे निज हेतु विलोई ॥ ३ ॥ विना प्रेम जिव होय अनेरा । पाछे परे कालके घेरा ॥ गुरु सुवास है फूल सनेही । तिल अनुमान शिष्यकी देही ॥ ४ ॥ प्रेम भक्ति जो गुरु बतावे । करि विश्वास शिष्य तेहि धावे ॥ गुरु शिष्य भेद नहिं ताही । जोइ गुरु सोइ शिष्य निवाही ॥ ५ ॥ गुरु पूरा शिष सूरा होई । तबहि काल रहै मुख गोई ॥ शेष विना गुरु छूटे नाहीं । फिरि फिरि परिहैं भोचक माहीं ॥ ६ ॥ सतगुरु सो सतभाव बतावे । शिष, सोई जो प्रेम लगावे ॥ तीनों लोक एक होय जाई । गुरु शिष अलग होय नहिं भाई ॥ ७ ॥

सा०-गुरु समाना शिष्यमें, शिष कर लीया नेह ।

विलगाये विलगे नहीं, एक प्रान दुइ देह ॥

कर्म बण्डकी रसनी १ ।

कर्म कथा अब कहूँ बखानी । जौन फाँस अटके नर प्रानी ॥

कवीरपंथी शब्दावली १५

(४५०)

कवीरपंथी-

चारों खानि कर्म अधिकाई । चहुँ खानि मिलि कर्म टढाई ॥ कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चन्द्र शूर प्रकाशा ॥ कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महिते भौ गौरि गणेशा ॥ सात बार पन्द्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥ कर्महि ले वसुदेव घर आवा । कर्महि यमुदा गोद खिलावा ॥ कर्महिते वन गऊ चराई । कर्महि गोपी केलि कराई ॥ कौशिल्या तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥ कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह वनवासा ॥ कर्म जाय जब धनुष चढावा । कर्महि जनकसुता सिर नावा ॥ कर्महि हरचो सीता कई आई । दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥ कर्म रेखते कोइ न सुकता । लछमन राम करम फल भुगता ॥ कर्मसाग बांधेउ तहिया । कर्महि जल जीवन दुख सहिया ॥ रुद्र राम कर्म कीन्ह लडाई । भला मिलाप हना भेट चढाई ॥ कर्मरेख नहि मिटे मिटाई । जीव पपील लङ्का होय आई ॥ कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति विभीषण भयो ॥ कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहाँ राम कहँ रावण राजा ॥ कर्मरेख सबहिन पर होई । देखो शुद्ध विलोय विलोई ॥ कर्मरेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥

कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।

विन अक्षर कोइ ना छूटे, अक्षर अगम अगाध ॥ १ ॥

रमनी ॥ २ ॥

सागर है भवसागर धारा । नहि कछु सूझे वार न पारा ॥ तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥ कर्म रेख बंधा सब कोई । खानी बानी देखि विलोई ॥ वेद कितेब कर्महीं गाय। कर्महिको निःकर्म बताया ॥ सद्गुरु मिले तो भेद बतावे ।

शब्दावली

(४५१)

कर्म अकर्म मध्य दिखलावे ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥ अक्षरसागर निर्भय वानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥ गोरख भरथरि गोपी चन्दा । कर्म फाँस सबही पुनी फन्दा ॥ सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥ कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहाँ लग वेद व्यास कछु भाषा ॥ दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥ कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥ अक्षर सागर मूल भैंडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥ अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥

सा०-कर्महिं डोर चारो युग, सुनो सन्त सब दास ।

तत्त्वभेद निहतत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥

खंनो ॥ ३ ॥

सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारण कर्म नन्द घर गाजा ॥ एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥ कारण कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥ जहाँ तहाँ गोरस जाय चुरावा । जहाँ जहाँ कर्म तहाँ ले खावा ॥ कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥ कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥ कर्महि कारण तहाँ सिधारा । कारण कर्म पिवे विषधारा ॥ मारि ताहि कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोरचो संसारा ॥ कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्हो हाथा ॥ कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फाँस सबही आधीना ॥ कुब्जा कछु कर्म जो कीन्हा । कारण कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥ कर्म पताल कालेश्वर नाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥ यज्ञ अश्वमेध करत बलि राजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥ कर्महि वामन रूप

(४५२)

कबीरपंथी—

बनाया। बलिराजापै दान दिवाया ॥ कर्म अहूठ नापि पग लीन्ह। तीने पग तीनों पुर कीन्ह। ॥ आधा पाँव कर्म अधिकारी। बाँधि नृपति पतालहिं डारी ॥ जहाँ लगि जीव जन्तु उत्पानी। तहाँ लगि कर्म राय परवानी ॥ कर्म फाँसते कोइ न छूटे। कर्म फाँस सबहिन घर लूटे ॥

सा०—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतो करो उपाय।

सद्गुरु मिले तो ऊबै, नहिं तो परलय जाय ॥ ३ ॥

रमैनी ४ ॥

जो कुछ कर्म जगतमें करई। करि करि कर्म बहुरि भव परई ॥ एक न होय यज्ञ व्रत ठाना। एक न पाप पुण्य पहिचाना ॥ एक कर्म कुल लीन्ह उठाई। कर्म अकर्म न जाने भाई ॥ एक छापा और तिलक बनावे। पहिरि मेखला साधु कहावे ॥ वैष्णव होय करै षट्कर्म। वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥ कथा पुराण सुनै चित लाई। कर्महि सुमिरे बहु विधि भाई ॥ विष्णु सुमिरि तप बहु विधि कियो। सो निःकर्म विष्णु नहिं भयो ॥ कर्मक डोरि बँधा संसारा। क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥ एक अभंग एकादशि करई। तन छूटे वैकुण्ठहिं तरई ॥ यह वैकुण्ठ न इस्थिर होई। अन्त कर्मगति परलय सोई ॥ करै कर्म वैकुण्ठहिं जाई। कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥ योगी योग कर्मको साधे। किरिया कर्म पवन आराधे ॥ योगी कर्म पवनको किरिया। भुगतै कर्म देह पुनि धरिया ॥ संन्यासी जो बन बन फिरहीं। होय निःकर्म कर्म फिर परहीं ॥ जीयत दग्ध देहको करई। जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥ कोई नम्र कोई वज्र कछोटा। भरमत फिरि सहै पग ठोटा ॥ राजद्वार पावे अवतारा। भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥ पण्डित जन सब कर्म बखाने। नख शिख कर्मफाँस अरुझाने ॥

शब्दावली

(४५३)

कर्म धर्मकी युक्ति बतावै । दान पुण्य बहु विधि अरथावै ॥ वज्र दान लै जन्म गँवावै । होई ऊंट बहु भार लदावै ॥ एक जो करै बरत अवतारा । होइ है सूकर थान सियारा ॥ सूकर थान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होइ हैं सुकता ॥

सा०-बहु बन्धनसे बाँधिया, एक विचारा जीव ।

जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावै पीव ॥

संज्ञी ॥५॥

शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस सुकताओं ॥ निरालम्ब अवलम्ब न जानै । शब्द निरन्तर भेद बखानै ॥ पाप पुण्यकी छोड़े आसा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥ रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निस्तत्त्व समाई ॥ तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको देइ भजाई ॥ सुख सम्पति नहिं विपत्ति विचारे । काम क्रोध तृष्णा परजारे ॥ किया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरुवारे ॥ सो ग्रहे जो निग्रह काया । अभिअन्तरकी मेटे माया ॥ शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥ ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरण परछाले ॥ गहे तत्त्व निस्तत्त्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥ सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥ धन यौवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥ चहुँदिशि मंसा पवन कलोलै । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोलै ॥ उनमुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्त्वभेद निहतत्त्वहिं लहई ॥ जो कोइ आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥ मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरुगम लूटे ज्ञान भँडारा ॥ शूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥ दुखिया होय रेन दिन रोई । भोगी भोग करै सुख सोई ॥ दुख सुख भोग सोग सम जाने । भली बुगी कछु मन नहिं आने ॥ भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय

( ४५४ )

कबीररचनी-

पावे वह बैरागा ॥ सींगी अच्छय रैन दिन बाजे । सिद्ध साधु तहँ आसन छाजे ॥

सा०-आसन साथै आपमें, आपा डारे खोय ।

कहैं कवीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥ ६ ॥

इति कर्मवण्डकी रमनी ।

सत्यनाम ।

अथ पंच' देहकी निर्णय ॥

एक जीवको स्वतः पद, बुद्धि आँति सो काल । काल होइ यह काल रचि, तामें भये बिहाल ॥ १ ॥ बीहालेको मतो जो, देउँ सकल बतलाय । जाते पारख प्रौढ लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥२॥ करि अनुमान जो शून्य भो, सूझे कतहूँ नाहिं । आपु आप बिसरो जबै, तन विज्ञान कहि ताहि ॥ ३ ॥ ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान । प्रतिबिंबित झाई लखै, साक्षी रूप बखान ॥ ४ ॥ साक्षी होय प्रकाश भो, महा कारण त्यहि नाम । मसुर प्रमाण सो विम्ब भो, नील बरण घनइयाम ॥ ५ ॥ बटयो विम्ब अध पर्व भो, शून्याकार स्वरूप । ताको कारण कहत हैं, महाँ अधियारी कूप ॥ ६ ॥ कारण सो आकार भो, श्वेत अँगुष्ठ प्रमान । वेद शास्त्र सब कहत हैं, सूक्ष्म रूप बखान ॥ ७ ॥ सूक्ष्म रूपते कर्म भो, कर्महिते यह अस्थूल । परा जीव या रहटमें, सहे घनेरी शूल ॥ ८ ॥

संतौ षट प्रकारकी देवी ॥

स्थूल सूक्ष्म कारण महाँ कारण केवल हंस कि लेही ॥ साटे तीन हाथ परमाना देह स्थूल बखानी । राता वर्ण बैखरी बाचा जागृत अवस्था जानी ॥ रजो गुणी ओंकार मात्रुका त्रिकुटी है

१ इस प्रन्यमें बटदेहका वर्णन है परन्तु इसका नाम पंचदेहका निर्णय है इसका कारण यह है कि, हंस देहको इसरी बेहोके साथ न मिलाकर अलग माना है । क्योंकि, वह बन्ध और मोक्षते परे मध्यकी भूमिका है ।

शब्दावली

(४५५)

अस्थाना । मुक्ति श्लोक प्रथम पद गायत्री ब्रह्मा वेद बखाना ॥ पृथ्वी तत्त्व खेचरी मुद्रा मग पीपल घट कासा । क्षय निर्णय बङ्गवाग्नि दशेन्द्रि देव चतुर्दश बासा ॥ और अहे ऋग्वेद बतायू अर्द्ध शुक्ति संचारा । सत्यलोक विषयका अभिमानी विषयानंद हंकारा ॥ आदि अंत औ मध्य शब्द या लखे कोइ बुधिवीरा । कहै कवीर सुनो हो संतो इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥

संतौ सूक्ष्म देह प्रमाना ।

सूक्ष्म देह अंगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥ श्वेत वर्ण ओंकार मात्रुका सतो गुण विष्णु देवा । ऊर्ध्व सुन्न औ यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहेवा ॥ मुक्ति समीप लोक वैकुण्ठ पालन किरिया राखी । मार्ग बिहंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥ आव तत्त्व कोहं हंकारा मंदाअग्नी कहिये । पंच प्राण द्वितीया पद गायत्री मध्यम बाणी लहिये ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गंध मन बुद्धि चित हंकारा । कहै कवीर सुनौ भाइ संता यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥

संतौ कारण देह सरेखा ।

आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारा वर्ण परेखा ॥ मध्य शून्य मकार मात्रुका हृदया सो अस्थाना । महदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ती जाना ॥ उदराग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कंठ स्थानी । कपि मारग तृतीय पद गायत्री अहे प्राज्ञ अभिमानी ॥ सामवेद पश्यन्ती वाचा मुक्त स्वरूप बखानी । तेज तत्त्व अद्वैतानन्दं अहंकार निरबानी ॥ अहे विशुद्ध महात्म जामे तामे कछु न समाई । कारण देह इती सम्पूर्ण कहै कवीर बुझाई ॥ ३ ॥

सन्तो महकारण तन जाना ।

नील वरण औ ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥ नाभि स्थान

(४५६)

कबीरपंथी-

विकार मात्रुका चिदाकाश परवानी । मारग मीन अगोचर सुद्व्रा वेद अथर्वन जानी ॥ ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति ततु वायु । आश्रय लोक विदेहानंद मुक्ति साजोजि बतायु ॥ नृणै प्रकरशिक तुरी अवस्था प्रत्यज्ञात्मतु अभिमानी । शीव अहंकार महाकारण तन इहो कवीर बखानी ॥ ४ ॥

संतो सुनौ कैवल देह बखाना ।

केवल सकल देहका साक्षी भ्रमर गुफा अस्थाना ॥ निराकाश औ लोक निराश्रय निर्णय ज्ञान वसेखा । सूक्ष्म वेद है उनमुनि सुद्व्रा उनमुन बाणी लेखा ॥ ब्रह्मानंद कहीं हंकारा ब्रह्मज्ञानको माना । पूर्ण बोध अवस्था कहिये ज्योतिस्वरूपी जाना ॥ पुण्य गिरी अरु चारुमात्रुका निरंजन अभिमानी । परमारथ पंचम पद गायत्री परामुक्ति पहिचानी ॥ सदाशीव औ मार्ग सिखा है लहै संत मत धीरा । कालातीत कला सम्पूर्ण केवल कहै कवीरा ॥ ५ ॥

संतो सुनौ हंस तन व्याना ।

अबरण बरण रूप नहिं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥ नहिं ऊपजै नहिं विनशै कबहुं नहिं आवै नहिं जाहीं । इच्छ अनिच्छ न दृष्ट अदृष्टी नहिं बाहर नहिं माहीं ॥ मै तू रहित न करता भोगता नहीं मान अपमाना । नहीं ब्रह्म नहिं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जाना ॥ मन बुधि गुन इन्द्रिय नहिं जाना अलख अकह निर्बाना । अकल अनोह अनादि अभेदा निगम नीति फिरि जाना ॥ तत्त्व रहित रवि चंद्र न तारा नहिं देवी नहिं देवा । स्वयं सिद्धि परकाशक सोई नहिं स्वामी नहिं सेवा ॥ हंस देह विज्ञान भाव यह सकल वासना त्यागे । नहिं आगे नहिं पाछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥ निज प्रकाशमें आप अपनपौ भूलि गये विज्ञानी । उनमत बाल पिशाच मूक जड़ दशा पांच इह लानी ॥ खोये

शब्दावली

(४५७)

आपु अपनपौ सब रस निज स्वरूप नहिं जाने । फिरि कैवल महकारण कारण सूक्ष्म स्थूल समाने ॥ स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण कैवल पुनि विज्ञाना । भये नष्ट ये हेर फेरमें कतौ नहीं कल्याना ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा । ज्यहिते आप अपनपौ जानो मेटो षटका रैसा ॥ ६ ॥

निरख प्रबोधको रसैनी ॥ २ ॥

अस सतगुर बोले सत बानी । धन धन सत नाम जिन जानी ॥ नाम प्रतीत भई सब संता । एक जानके मिटे अनंता ॥ १ ॥ अनंत नाम जब एक समाना । तब ही साध परमपद जाना ॥ बिरला संत परम गति जानै । एक अनंत सो कहा बखानै ॥ २ ॥ सबते न्यारा सबके माहीं । माहीं सतगुर दूजा नाहीं ॥ सत्तनाम जाके धन होई । धन जीवन ताहीको सोई ॥ ३ ॥

दोहा-जिनके धन सत्तनाम है, तिनका जीवन धन ।

तिनको सतगुरु तारहीं, बहुर न धरई तन्न ॥ १ ॥

सत्तनामकी महिमा जानै । मन बच करमै सरना आनै ॥ एक नाम मन बच कर लेई । बहुर न या भवजल पग देई ॥ ४ ॥ योग यज्ञ जप तप क्या करई । दान पुत्रतैं काज न सरई ॥ देवी देवा भूत परेता । नाम लेत भागैं तज खेता ॥ ५ ॥ टोना टामन पूजा पाती । नाम लेत सहजै तर जाती ॥ जो इच्छा आवै मन माहीं । पुरवै तुरत बिलम्ब कछु नाहीं ॥ ६ ॥ सो सत्तनाम हृदय अनुरागी । सो कहिये साँचा बैरागी ॥ जब लग नाम प्रतीत न करई । तब लग जनम जनम दुःख भरई ॥ ७ ॥

दोहा-कविरा महिमा नामकी, कहता कही न जाय ।

चार मुक्ति औ चार फल, और परमपद पाय ॥ २ ॥

निरख प्रबोधको पहली रसैनी पृष्ठ ५०८ में आ गयी है ।

(४५८)

कवीरपंथी-

सत्तनाम है सबतें न्यारा । निर्गुन सर्गुन शब्द पसारा ॥ निर्गुन बीज सर्गुन फल फूला । साखा ज्ञान नाम है मूला ॥ ८ ॥ मूल गहेते सब सुख पावै । डाल पातमें मूल गँवावै ॥ सतगुरु कही नाम पहिचानी । निर्गुन सर्गुन भेद बखानी ॥ ९ ॥

दोहा-नाम सत्त संसारमें, और सकल है पोच ।

कहना सुनना देखना, करना सोच असोच ॥ ३ ॥

सबही झूठ झूठ कर जाना । सत्त नामको सत कर माना ॥ निस बासर इक पल नहिं न्यारा । जाने सतगुरु जानन हारा ॥ १० ॥ सुरत निरत ले राखै जहवाँ । पहुँचै अजर अमर घर तहवाँ ॥ सत्तलोकको देय पयाना । चार मुक्ति पावै निर्वाना ॥ ११ ॥

दोहा-सत्तलोकै सब लोक पति, सदा समीप प्रमान ।

परमजोतसो जोत मिलि, प्रेम सरूप समान ॥ ५ ॥

अंस नामतें फिर फिर आवै । पूरन नाम परमपद पावै ॥ नहिं आवै नहिं जाय सो प्रानी । सत्यनामकी जेहि गति जानी ॥ १२ ॥ सत्तनाममें रहै समाई । जुग जुग राज करै अधिकाई ॥ सत्तलोकमें जाय समाना । सत्त पुरुषसों भया मिलाना ॥ १३ ॥ हंस सुजान हंसही पावा । जोग संतायन भया मिलावा ॥ हंस सुघर दरस दिखलावा । जनम जनमकी भूख मिटावा ॥ १४ ॥ सुरत सुहागिन भइ आगे ठाढी । प्रेम सुभाव प्रीति अति बाढी ॥ पुहुपदीपमें जाय समाना । बास सुवास चहुँ दिस आना ॥ १५ ॥

दोहा-सुख सागर सुख बिलसई, मानसरोवर न्हाय ।

कोट काम-सी कामिनी, देखत नैन अघाय ॥ ६ ॥

सुरति नाम सुनै जब काना । हंसा पावै पद निर्वाना ॥ अब तो कृपा करी गुरु देवा । तातें सुफल भई सब सेवा ॥ १६ ॥ नाम दान अब लेय सुभागी । सत्त नाम पावै बड़ भागी ॥ मन बच