भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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अस्थाना । मुक्ति श्लोक प्रथम पद गायत्री ब्रह्मा वेद बखाना ॥ पृथ्वी तत्त्व खेचरी मुद्रा मग पीपल घट कासा । क्षय निर्णय बङ्गवाग्नि दशेन्द्रि देव चतुर्दश बासा ॥ और अहे ऋग्वेद बतायू अर्द्ध शुक्ति संचारा । सत्यलोक विषयका अभिमानी विषयानंद हंकारा ॥ आदि अंत औ मध्य शब्द या लखे कोइ बुधिवीरा । कहै कवीर सुनो हो संतो इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥

संतौ सूक्ष्म देह प्रमाना ।

सूक्ष्म देह अंगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥ श्वेत वर्ण ओंकार मात्रुका सतो गुण विष्णु देवा । ऊर्ध्व सुन्न औ यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहेवा ॥ मुक्ति समीप लोक वैकुण्ठ पालन किरिया राखी । मार्ग बिहंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥ आव तत्त्व कोहं हंकारा मंदाअग्नी कहिये । पंच प्राण द्वितीया पद गायत्री मध्यम बाणी लहिये ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गंध मन बुद्धि चित हंकारा । कहै कवीर सुनौ भाइ संता यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥

संतौ कारण देह सरेखा ।

आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारा वर्ण परेखा ॥ मध्य शून्य मकार मात्रुका हृदया सो अस्थाना । महदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ती जाना ॥ उदराग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कंठ स्थानी । कपि मारग तृतीय पद गायत्री अहे प्राज्ञ अभिमानी ॥ सामवेद पश्यन्ती वाचा मुक्त स्वरूप बखानी । तेज तत्त्व अद्वैतानन्दं अहंकार निरबानी ॥ अहे विशुद्ध महात्म जामे तामे कछु न समाई । कारण देह इती सम्पूर्ण कहै कवीर बुझाई ॥ ३ ॥

सन्तो महकारण तन जाना ।

नील वरण औ ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥ नाभि स्थान

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