भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी-

विकार मात्रुका चिदाकाश परवानी । मारग मीन अगोचर सुद्व्रा वेद अथर्वन जानी ॥ ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति ततु वायु । आश्रय लोक विदेहानंद मुक्ति साजोजि बतायु ॥ नृणै प्रकरशिक तुरी अवस्था प्रत्यज्ञात्मतु अभिमानी । शीव अहंकार महाकारण तन इहो कवीर बखानी ॥ ४ ॥

संतो सुनौ कैवल देह बखाना ।

केवल सकल देहका साक्षी भ्रमर गुफा अस्थाना ॥ निराकाश औ लोक निराश्रय निर्णय ज्ञान वसेखा । सूक्ष्म वेद है उनमुनि सुद्व्रा उनमुन बाणी लेखा ॥ ब्रह्मानंद कहीं हंकारा ब्रह्मज्ञानको माना । पूर्ण बोध अवस्था कहिये ज्योतिस्वरूपी जाना ॥ पुण्य गिरी अरु चारुमात्रुका निरंजन अभिमानी । परमारथ पंचम पद गायत्री परामुक्ति पहिचानी ॥ सदाशीव औ मार्ग सिखा है लहै संत मत धीरा । कालातीत कला सम्पूर्ण केवल कहै कवीरा ॥ ५ ॥

संतो सुनौ हंस तन व्याना ।

अबरण बरण रूप नहिं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥ नहिं ऊपजै नहिं विनशै कबहुं नहिं आवै नहिं जाहीं । इच्छ अनिच्छ न दृष्ट अदृष्टी नहिं बाहर नहिं माहीं ॥ मै तू रहित न करता भोगता नहीं मान अपमाना । नहीं ब्रह्म नहिं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जाना ॥ मन बुधि गुन इन्द्रिय नहिं जाना अलख अकह निर्बाना । अकल अनोह अनादि अभेदा निगम नीति फिरि जाना ॥ तत्त्व रहित रवि चंद्र न तारा नहिं देवी नहिं देवा । स्वयं सिद्धि परकाशक सोई नहिं स्वामी नहिं सेवा ॥ हंस देह विज्ञान भाव यह सकल वासना त्यागे । नहिं आगे नहिं पाछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥ निज प्रकाशमें आप अपनपौ भूलि गये विज्ञानी । उनमत बाल पिशाच मूक जड़ दशा पांच इह लानी ॥ खोये