भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 471

शब्दावली

(४५७)

आपु अपनपौ सब रस निज स्वरूप नहिं जाने । फिरि कैवल महकारण कारण सूक्ष्म स्थूल समाने ॥ स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण कैवल पुनि विज्ञाना । भये नष्ट ये हेर फेरमें कतौ नहीं कल्याना ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा । ज्यहिते आप अपनपौ जानो मेटो षटका रैसा ॥ ६ ॥

निरख प्रबोधको रसैनी ॥ २ ॥

अस सतगुर बोले सत बानी । धन धन सत नाम जिन जानी ॥ नाम प्रतीत भई सब संता । एक जानके मिटे अनंता ॥ १ ॥ अनंत नाम जब एक समाना । तब ही साध परमपद जाना ॥ बिरला संत परम गति जानै । एक अनंत सो कहा बखानै ॥ २ ॥ सबते न्यारा सबके माहीं । माहीं सतगुर दूजा नाहीं ॥ सत्तनाम जाके धन होई । धन जीवन ताहीको सोई ॥ ३ ॥

दोहा-जिनके धन सत्तनाम है, तिनका जीवन धन ।

तिनको सतगुरु तारहीं, बहुर न धरई तन्न ॥ १ ॥

सत्तनामकी महिमा जानै । मन बच करमै सरना आनै ॥ एक नाम मन बच कर लेई । बहुर न या भवजल पग देई ॥ ४ ॥ योग यज्ञ जप तप क्या करई । दान पुत्रतैं काज न सरई ॥ देवी देवा भूत परेता । नाम लेत भागैं तज खेता ॥ ५ ॥ टोना टामन पूजा पाती । नाम लेत सहजै तर जाती ॥ जो इच्छा आवै मन माहीं । पुरवै तुरत बिलम्ब कछु नाहीं ॥ ६ ॥ सो सत्तनाम हृदय अनुरागी । सो कहिये साँचा बैरागी ॥ जब लग नाम प्रतीत न करई । तब लग जनम जनम दुःख भरई ॥ ७ ॥

दोहा-कविरा महिमा नामकी, कहता कही न जाय ।

चार मुक्ति औ चार फल, और परमपद पाय ॥ २ ॥

निरख प्रबोधको पहली रसैनी पृष्ठ ५०८ में आ गयी है ।