कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
सत्तनाम है सबतें न्यारा । निर्गुन सर्गुन शब्द पसारा ॥ निर्गुन बीज सर्गुन फल फूला । साखा ज्ञान नाम है मूला ॥ ८ ॥ मूल गहेते सब सुख पावै । डाल पातमें मूल गँवावै ॥ सतगुरु कही नाम पहिचानी । निर्गुन सर्गुन भेद बखानी ॥ ९ ॥
दोहा-नाम सत्त संसारमें, और सकल है पोच ।
कहना सुनना देखना, करना सोच असोच ॥ ३ ॥
सबही झूठ झूठ कर जाना । सत्त नामको सत कर माना ॥ निस बासर इक पल नहिं न्यारा । जाने सतगुरु जानन हारा ॥ १० ॥ सुरत निरत ले राखै जहवाँ । पहुँचै अजर अमर घर तहवाँ ॥ सत्तलोकको देय पयाना । चार मुक्ति पावै निर्वाना ॥ ११ ॥
दोहा-सत्तलोकै सब लोक पति, सदा समीप प्रमान ।
परमजोतसो जोत मिलि, प्रेम सरूप समान ॥ ५ ॥
अंस नामतें फिर फिर आवै । पूरन नाम परमपद पावै ॥ नहिं आवै नहिं जाय सो प्रानी । सत्यनामकी जेहि गति जानी ॥ १२ ॥ सत्तनाममें रहै समाई । जुग जुग राज करै अधिकाई ॥ सत्तलोकमें जाय समाना । सत्त पुरुषसों भया मिलाना ॥ १३ ॥ हंस सुजान हंसही पावा । जोग संतायन भया मिलावा ॥ हंस सुघर दरस दिखलावा । जनम जनमकी भूख मिटावा ॥ १४ ॥ सुरत सुहागिन भइ आगे ठाढी । प्रेम सुभाव प्रीति अति बाढी ॥ पुहुपदीपमें जाय समाना । बास सुवास चहुँ दिस आना ॥ १५ ॥
दोहा-सुख सागर सुख बिलसई, मानसरोवर न्हाय ।
कोट काम-सी कामिनी, देखत नैन अघाय ॥ ६ ॥
सुरति नाम सुनै जब काना । हंसा पावै पद निर्वाना ॥ अब तो कृपा करी गुरु देवा । तातें सुफल भई सब सेवा ॥ १६ ॥ नाम दान अब लेय सुभागी । सत्त नाम पावै बड़ भागी ॥ मन बच