भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 473

कर्म चित्त निश्चय राखै । गुरुके शब्द अमीरस चाखै ॥ १७ ॥ आदि अंत वहाँ भेदै पावै । पवन आड़में ले बैठावै ॥ सब जग झूठ नाम इक साँचा । श्वास श्वासमें साचा राचा ॥ १८ ॥ झूठा जान जगत सुख भोगा । साँचा साधू नाम सँजोगा ॥ यह तन माटी इन्द्री छारी । सत्तनाम साँचा अधिकारी ॥ १९ ॥ नाम प्रताप जुगे जुग भाखी । साध संत ले हिरदे राखी ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर । सत्यनाम है जगत उजागर ॥ २० ॥

दोहा-महिमा बड़ी जो साध की, जाके नाम अधार ।

सतगुर केरी दया ते, उतरे भव जल पार ॥ ७ ॥

निरख प्रबोधको रत्ननी ॥ ३ ॥

प्रथम एक जो आपै आप । निराकार निर्गुन निर्जाप ॥ नहिं तब भूमि पवन अकासा । नहिं तब पावक नीर निवासा ॥ १ ॥ नहिं तब पांच तत्त्व गुन तीनी । नहिं तब सृष्टी माया कीनी ॥ नहिं तब आदि अंत मध धारा । नहिं तब अंध धुंध उजियारा ॥ २ ॥ नहिं तब ब्रह्मा विष्णु महेसा । नहिं तब सूरज चाँद गनेशा ॥ नहिं तब मच्छ कच्छ बाराहा । नहिं तब भादों फागुन माहा ॥ ३ ॥ नहिं तब कंस कृष्ण बलि बावन । नहिं तब रघुपति नहिं तब रावन ॥ नहिं तब सरगुन सकल पसारा । नहिं तब धारे दस औतारा ॥ ४ ॥ नहिं तब सरसृति जमुना गंगा । नहिं तब सागर समुद्र तरंगा ॥ नहिं तब तीरथ व्रत जग पूजा । नहिं तब देव दैत अरु दूजा ॥ ५ ॥ नहिं तब पाप पुत्र गुर सीखा । नहिं तब पठना गुनना लीखा ॥ नहिं तब विद्या वेद पुराना । नहिं तब हते कितेब कुराना ॥ ६ ॥

दोहा-कहैं कवीर विचारके, तब कुछ किरतम नाहिं ।

परमपुरुष तहैं आपही, अगम अगोचर माहिं ॥ १ ॥ करता एक अगम है आप । वाके कोई माय न बाप ॥ करताके