कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
नहि बंधु औ नारी । सदा अखंडित अगम अपारी ॥७॥ करता कछु खावै नहि पीवै । करता कबहुँ मरे न जीवै ॥ करताके कुछ रूप न रेषा । करताके कुछ बरन न भेषा ॥ ८ ॥ जाके जात गोत कछु नाही । महिमा बरनि न जाय मो पाहीं ॥ रूप अरूप नहीं तेहि नाँव । बर्न अबर्न नहीं तेहि ठाँव ॥ ९ ॥
दोहा-कहै कवीर बिचार के, जाके बरन न गाँव ।
निराकार और निर्गुना, है पूरन सब ठाँव ॥ २ ॥
करता कृत्रिम बाजी लाई । ओंकार तैं सृष्टि उपाई ॥ पांच तत्त्व तीन गुन साजा । ताते सब कृत्रिम उपराजा ॥ १० ॥ कृत्रिम धर्ती कृत्रिम अकाश । कृत्रिम चंदूर परकाश ॥ कृत्रिम पांच तत्त्व गुन तीनी । कृत्रिम सृष्टि जो माया कीनी ॥ ११ ॥ कृत्रिम आदि अंत मध तारा । कृत्रिम अंध रूप उजियारा ॥ कृत्रिम सर्गुन सकल पसारा ॥ कृत्रिम कहिये दस औतारा ॥ ॥१२॥ कृत्रिम कंस कृत्रिम बलि बावन । कृत्रिम रघुपति कृत्रिम रावन ॥ कृत्रिम कच्छ मच्छ बाराहा । कृत्रिम भादों फागुन माहा ॥ ॥ १३ ॥ कृत्रिम सहर समुद्र तरंगा । कृत्रिम सरसुति जमुना गंगा ॥ कृत्रिम स्मृति वेद पुराना । कृत्रिम काजी कितेब कुराना ॥ ॥ १४ ॥ कृत्रिम जोग जोगावत पूजा । कृत्रिम देवी देव जो दूजा ॥ कृत्रिम पाप पुत्र गुर सीखा । कृत्रिम पढना गुनना लीखा ॥१५॥
दोहा-कहैं कवीर बिचारके, कृत्रिम करता नहि होय ।
यह बाजी सब कृत्रिम है, साँच सुनो सब कोय ॥
करता एक और सब बाजी । ना कोई पीर मसायख काजी ॥ बाजी ब्रह्मा विष्णु महेसा । बाजी इन्द्र औ चन्द्र गनेसा ॥१६॥ बाजी जल थल सकल जहाना । बाजी जानो जर्मों असमाना ॥ बाजी बरनो स्मृति वेदा । बाजीगरका लखै न भेदा ॥ १७ ॥ बाजी सिद्ध साधक गुर सीखा । जहाँ तहाँ यह बाजी दीखा ॥