कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
बनाया। बलिराजापै दान दिवाया ॥ कर्म अहूठ नापि पग लीन्ह। तीने पग तीनों पुर कीन्ह। ॥ आधा पाँव कर्म अधिकारी। बाँधि नृपति पतालहिं डारी ॥ जहाँ लगि जीव जन्तु उत्पानी। तहाँ लगि कर्म राय परवानी ॥ कर्म फाँसते कोइ न छूटे। कर्म फाँस सबहिन घर लूटे ॥
सा०—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतो करो उपाय।
सद्गुरु मिले तो ऊबै, नहिं तो परलय जाय ॥ ३ ॥
रमैनी ४ ॥
जो कुछ कर्म जगतमें करई। करि करि कर्म बहुरि भव परई ॥ एक न होय यज्ञ व्रत ठाना। एक न पाप पुण्य पहिचाना ॥ एक कर्म कुल लीन्ह उठाई। कर्म अकर्म न जाने भाई ॥ एक छापा और तिलक बनावे। पहिरि मेखला साधु कहावे ॥ वैष्णव होय करै षट्कर्म। वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥ कथा पुराण सुनै चित लाई। कर्महि सुमिरे बहु विधि भाई ॥ विष्णु सुमिरि तप बहु विधि कियो। सो निःकर्म विष्णु नहिं भयो ॥ कर्मक डोरि बँधा संसारा। क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥ एक अभंग एकादशि करई। तन छूटे वैकुण्ठहिं तरई ॥ यह वैकुण्ठ न इस्थिर होई। अन्त कर्मगति परलय सोई ॥ करै कर्म वैकुण्ठहिं जाई। कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥ योगी योग कर्मको साधे। किरिया कर्म पवन आराधे ॥ योगी कर्म पवनको किरिया। भुगतै कर्म देह पुनि धरिया ॥ संन्यासी जो बन बन फिरहीं। होय निःकर्म कर्म फिर परहीं ॥ जीयत दग्ध देहको करई। जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥ कोई नम्र कोई वज्र कछोटा। भरमत फिरि सहै पग ठोटा ॥ राजद्वार पावे अवतारा। भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥ पण्डित जन सब कर्म बखाने। नख शिख कर्मफाँस अरुझाने ॥