भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कर्म अकर्म मध्य दिखलावे ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥ अक्षरसागर निर्भय वानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥ गोरख भरथरि गोपी चन्दा । कर्म फाँस सबही पुनी फन्दा ॥ सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥ कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहाँ लग वेद व्यास कछु भाषा ॥ दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥ कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥ अक्षर सागर मूल भैंडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥ अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥

सा०-कर्महिं डोर चारो युग, सुनो सन्त सब दास ।

तत्त्वभेद निहतत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥

खंनो ॥ ३ ॥

सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारण कर्म नन्द घर गाजा ॥ एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥ कारण कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥ जहाँ तहाँ गोरस जाय चुरावा । जहाँ जहाँ कर्म तहाँ ले खावा ॥ कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥ कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥ कर्महि कारण तहाँ सिधारा । कारण कर्म पिवे विषधारा ॥ मारि ताहि कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोरचो संसारा ॥ कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्हो हाथा ॥ कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फाँस सबही आधीना ॥ कुब्जा कछु कर्म जो कीन्हा । कारण कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥ कर्म पताल कालेश्वर नाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥ यज्ञ अश्वमेध करत बलि राजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥ कर्महि वामन रूप

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