कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
चारों खानि कर्म अधिकाई । चहुँ खानि मिलि कर्म टढाई ॥ कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चन्द्र शूर प्रकाशा ॥ कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महिते भौ गौरि गणेशा ॥ सात बार पन्द्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥ कर्महि ले वसुदेव घर आवा । कर्महि यमुदा गोद खिलावा ॥ कर्महिते वन गऊ चराई । कर्महि गोपी केलि कराई ॥ कौशिल्या तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥ कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह वनवासा ॥ कर्म जाय जब धनुष चढावा । कर्महि जनकसुता सिर नावा ॥ कर्महि हरचो सीता कई आई । दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥ कर्म रेखते कोइ न सुकता । लछमन राम करम फल भुगता ॥ कर्मसाग बांधेउ तहिया । कर्महि जल जीवन दुख सहिया ॥ रुद्र राम कर्म कीन्ह लडाई । भला मिलाप हना भेट चढाई ॥ कर्मरेख नहि मिटे मिटाई । जीव पपील लङ्का होय आई ॥ कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति विभीषण भयो ॥ कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहाँ राम कहँ रावण राजा ॥ कर्मरेख सबहिन पर होई । देखो शुद्ध विलोय विलोई ॥ कर्मरेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥
कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।
विन अक्षर कोइ ना छूटे, अक्षर अगम अगाध ॥ १ ॥
रमनी ॥ २ ॥
सागर है भवसागर धारा । नहि कछु सूझे वार न पारा ॥ तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥ कर्म रेख बंधा सब कोई । खानी बानी देखि विलोई ॥ वेद कितेब कर्महीं गाय। कर्महिको निःकर्म बताया ॥ सद्गुरु मिले तो भेद बतावे ।