कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कर्म धर्मकी युक्ति बतावै । दान पुण्य बहु विधि अरथावै ॥ वज्र दान लै जन्म गँवावै । होई ऊंट बहु भार लदावै ॥ एक जो करै बरत अवतारा । होइ है सूकर थान सियारा ॥ सूकर थान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होइ हैं सुकता ॥
सा०-बहु बन्धनसे बाँधिया, एक विचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावै पीव ॥
संज्ञी ॥५॥
शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस सुकताओं ॥ निरालम्ब अवलम्ब न जानै । शब्द निरन्तर भेद बखानै ॥ पाप पुण्यकी छोड़े आसा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥ रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निस्तत्त्व समाई ॥ तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको देइ भजाई ॥ सुख सम्पति नहिं विपत्ति विचारे । काम क्रोध तृष्णा परजारे ॥ किया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरुवारे ॥ सो ग्रहे जो निग्रह काया । अभिअन्तरकी मेटे माया ॥ शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥ ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरण परछाले ॥ गहे तत्त्व निस्तत्त्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥ सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥ धन यौवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥ चहुँदिशि मंसा पवन कलोलै । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोलै ॥ उनमुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्त्वभेद निहतत्त्वहिं लहई ॥ जो कोइ आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥ मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरुगम लूटे ज्ञान भँडारा ॥ शूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥ दुखिया होय रेन दिन रोई । भोगी भोग करै सुख सोई ॥ दुख सुख भोग सोग सम जाने । भली बुगी कछु मन नहिं आने ॥ भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय