भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

शब्दावली

(४४३)

दास कवीर तहां लौलीन । आगे पन्थ न पीछे चीन ॥

सा०—सबही घर है गांवमें, गाँव कौन घर माहिं ।

ऐसे सब जग ब्रह्ममें, न्यारो कितहुँ नाहिं ॥

सत्यनाथ ।

रमैनी—स्वरूप पहिचान ॥

आपने रूप राम हम पाये । ताते जीवन मुक्ति घर आये ॥ तब हम भक्ति कीन हरि केरी । आसा राखी मनसा घेरी ॥ आसा मनसा भई निरासा । छुट गये बन्धन भये खुलासा ॥ तब हम योगयुक्ति चित धरते । अष्ट कला मन पवना भरते ॥ अब हम पायो अपना भेव । आपुहि कर्ता आपुहि देव ॥ तब हम जान्यो यह अब जानी । अन जानेसे करी पहिचानी ॥ गयो भरम मन बव्यो हुलास । सहजहिं राम कवीरा दास ॥

सा०—अर्थ धर्म अरु काम तजि, देह काल सिर धूर ।

संशय नाहीं मुक्तिमें, ब्रह्म रहा भरपूर ॥

रमैनी एकतार ।

भजि यकतार भ्रममति भूलो । है यकतार सबनको दूलो ॥ बिन यकतार कस पतिवरता । एक पिया विन सबै अविस्था ॥ १॥ राम राम कहि भक्ति दिठावे । बिन यकतार राम कहँ पावे ॥ भागवत सौ पुरान उचारे । निगम चारि सुनि श्रुति विचारे ॥२॥ वेद पढै पढि अरथ बतावे । विन यकतार थाह नहिं पावै ॥ बिन अंकूर बीज नहिं ऊगे । विन यकतार हंस कहँ पूगे ॥ ३ ॥ बिन यकतार भक्ति क्या कीजे । गुरु प्रताप अमीरस पीजे ॥ रंकार जहँ अनहद गाजे । ता ऊपर यकतार विराजे ॥४॥ इंगला पिंगला सुषमन साधै । ले उदान पौन तहँ बांधे ॥ अरधै उरधै सुरति लगावे । विन यकतार पीव नहिं पावै ॥ ५ ॥ वेद पुरान अरु शास्तर सोधै । अर्थ करि करि मन परबोधै ॥ जहँलग वेद तहांलग