भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(४४२)

कवीरपंथी-

अनूपा ॥ बिछरन मिलन होय कछु केरा । जैसे सोवै सुपना तेरा ॥ सोवे जहाँ तहाँ उठि जागे । पंछी मनि राह उठि लागे ॥ आगे पीछे मध्यम कोई । ऐसा सहज सरूपी होई ॥

साखी-सहज सरूपी होय रहै, दिलकी दुविधा जाय । अकह कवीरा क्या कहै, उलटि कालको खाय ॥

रमनी-कालजीत ॥

काल न आवे निहचल होई । अब यह जतन करो सब कोई ॥ निहचल चित्त न कबहुँ चलावे । ताको काल न कबहुँ सतावे ॥ परगट कहा तब है जग माहीं । जागे जाकूँ सूझे नाहीं ॥ जो कोइ चेतन होय करि जागे । ताके तसकर कबहुँ न लागे ॥ कलह कल्पना सब विधि खोई । निहचे सहज सरूपी होइ ॥ इच्छा ते जग जीवत नाई । ब्रह्म अनिच्छित गहै चित लाई ॥ कारज कारनकी यह बाता । माया माहीं ब्रह्म समाता ॥ माया माहीं ब्रह्म फंदाया । ताते पुरुष प्रकृति कहाया । अच्छर है इक और अनूपा ॥ पारब्रह्म अन इच्छित रूपा । पूर्ण ब्रह्मते न्यारा होई । परमहंसनको प्यारा सोई ॥ हंसदसा होय जु भाई । ताको काल कबहुँ नहिं खाई ॥

साखी-काल काल सबही कहे, काल न जाने कोय ।

जेती मनकी कल्पना, काल कहावै सोय ॥

रमनी-निर्वाणपद ।

ऐसा ब्रह्म विचारो भाई । शब्द उठै धुनि कहाँ समाई ॥ काष्ठ मथि २ अगिन उपाई । उलटि अग्नि काष्ठको खाई ॥ दोनों नास भयो इक ठाऊँ । उड़ गइ भसम धरेका नाऊँ ॥ भस्म भई उड़ कहवों गई । सो गति याकी ऐसी भई ॥ सुए जीव जइहो जाहाँ । जीवतही ले राखो ताहाँ ॥ जैसो केल कदली खंद । ऐसा पारब्रह्म गोविन्द ॥ खोजत खोजत पायो ठौर । मैं जानो कछु आगे और ॥ नहिं कछु नहिं कछु नहिं कछु सोई । पंछी पीछे खोज न होई ॥