कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
ओंकारा । केवल ब्रह्म वेद सो न्यारा ॥ ६ ॥ षट दर्शन जहँ कोह न देखा । वह यकतार सुरति सो पेखा ॥ जाको गुरु यकतार लखाया । पहुँचा धाम बहुरि नहि आया ॥ ७ ॥ जैसे सरिता सिन्धु समाई । ऐसे हंसे सुरति मिलाई ॥ है यकतार सजीवन बूटी । बिन यकतार बात सब झूठी ॥ ८ ॥ बात कहूँ तो कोइ न मानै । जिन देखा सोई पहिचानै ॥ पूरब जन्म भक्ति परगटाई । सो यकतारहि लखै बनाई ॥ ९ ॥ छर अच्छर दोनों ते न्यारा । है यकतार सकल आधार ॥ है सब रस पर जिह्वा नहि आवे । बैठि निरंतर नाद बजावे ॥ १० ॥ जप तप और अनेक दृढावे । बिन यकतार मुक्ति नहि पावे ॥ जप तप व्रत खीन होय जाई । बिन यकतार न हंसा पाई ॥ ११ ॥
समौ-सतगुरु सो साँचा रहै, सुरति रहै यकतार । कहै कवीर धर्मदास सो, पहुँचे लोक मंझार ॥
रमनी-ज्ञान विरह ॥
लागी चोट शब्दकी तनमें । गिरह नहिँ चैन चैन नहिँ बनमें ॥ सूरा खेत जबै मंडाना । ना जानू को रहै निदाना ॥ १ ॥ दूँदत फिहँ पीव नहिँ पाऊँ । औषधि मूल कहाँ घसि लाऊँ ॥ तुमसे वैद न हमसे रोगी । बिन दीदार क्यों जिये वियोगी ॥ २ ॥ एकहि रंग रंगी सब नारी । ना जानू को पियकी प्यारी ॥ कहै कवीर कोइ गुरुमुख पावे । बिन दरस न दीदार दिखावे ॥ ३ ॥
समौ-साधु हमारे शिरधनी, हम साधुनकी खेह । रोम रोममें रमि रहा, ज्यों बादलमें मेह ॥
रमनी षट दर्शन ।
बंदा ! दरसे सब घट माहीं । अंधरे अंखिया सूझत नाहीं ॥ या घट चन्दा या घट सूरा । या घट बाजै अनहदू तूरा ॥ १ ॥ या घट मथुरा या घट काशी । या घट पूरि रहा अविनाशी ॥