कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
रखना, गाफिल न होना, प्रमादमें न भूलना, ३ सावधान मन इन्द्री आदि सबोंपर सदा दृष्टि रखना, जिसमें ये ठगने न पावें। ४ सारग्राही-कैसा भी प्रसंग उलटा-सुलटा सम्मुख आकर उपस्थित हो उसमेंसे उत्तम सार ले लेना ॥
(४) शील परीक्षा ।
शुचि साधन संयम करन, श्रवण करन गुरु वानि । विनय वचन सब सो कहै, रूप आपनो जानि ॥४॥
भावार्थ-जिसमें शील आता है-उसमें चार गुण आकर वास करते हैं। १ पवित्रता-भीतर बाहर दोनों प्रकारसे पवित्र रहता है। २ संयम-शारीरिक मानसिक जितने कार्य हैं सब नियम पूर्वक करता है। ३ गुरुकी वाणी और उपदेशमें श्रद्धा (विश्वास) रखता है। ४ नम्रता-सबके साथ कोमलतासे वरतता है।
५ संतोष परीक्षा ॥ ४ ॥
संतोष परीक्षा सुनि लीजे । अयाची अमानी मन दीजे ॥ स्थिर वाच्छा नहि करई । सो संतोषी संत उच्चरई ॥५॥
भावार्थ-जिसके हृदयमें संतोषका वास होता है वह- १ अयाँची-अर्थात् यथा प्राप्त संतुष्ट रहकर उसीमें निर्वाह कर लेता है किसीसे याचना करनेकी इच्छा नहीं रखता। २ अमानी-मिथ्या अभिमान कर आप दुःखी नहीं होता; दूसरोंको भी दुःखी नहीं करना। ३ स्थिर-अर्थात् सदा धैर्यके साथ अपना सब कार्य करता है कभी घबराता नहीं। ४ अबाँछित-यथा प्राप्तमें संतुष्ट रहनेवाला अधिककी वांछाही क्यों करेगा।
६ निर्वर परीक्षा ४.
सुहिरदयता शीतलता, समता जान सुजान । सुखदाई सब जीवको, निरवैरी पहिचान ॥ ६ ॥ भावार्थ-निर्वैरता जिसमें आती है वह- १ सुहृद होजाता है