कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सहज शून्य जो ध्यान लगावे । भौजल तरत वार नहीं लावे ॥ सुराते शब्दमें सहज समावे । सहज समाधि परमपद पावे ॥६॥ जब लग नाम विदेह न आवे । तब लग सहज समाधि न पावे ॥ ध्यान विदेह औ ज्ञान विदेहा । सहज समाधिमें चहिये एहा ॥६॥ ध्यान विदेह लखे जब प्रानी । विदेह नाम मिले परमानी ॥ काया नाम सबे जग जाने । नाम विदेह विरले पहिचाने ॥ ७ ॥
समौ-ज्ञान विचार विवेकसो, शील संतोष समय ।
नाम गहे निरभय रहै, सहज सतलोक समय ॥ १२ ॥
शब्द सनेही होय रहै, जगते रहै उदास ।
सुख सागरमें घर करै, सत्य नाम विश्वास ॥
अब्दांगयोगका सार (१) ज्ञान परीक्षा साखी ।
ज्ञानी लक्षण चार हैं, सुनि त्यागो विस्माद ।
निरालंब निहभ्रमपुनि, निर्वासिक निहस्वाद ॥ १ ॥
भावार्थ-ज्ञानकी परीक्षा चार गुणोंसे होती है-
१ निरालम्ब, २ निःभ्रम, ३ निर्वासना, ४ निःस्वाद ॥
(२) विचार परीक्षा ।
विचार परीक्षा चार है, निर्मोही निरबन्द ।
निःशंक निरावरण सोई, छुटे कालको फन्द ॥ २ ॥
भावार्थ-विचार योगकी प्राप्ति इन चार लक्षणोंसे जानी जाती है-१ निर्मोही होवे, २ निर्वन्ध हो, ३ निःशंक हो, ४ निरावरण अर्थात् आत्मरूपमें सन्देह न हो ॥
(३) विवेक परीक्षा ।
सर्वज्ञी सुचेत होय, सावधान मन मार ।
सार आही सुजानिये, विवेक परीक्षा चार ॥ ३ ॥
भावार्थ-१ सर्वज्ञी अर्थात् किसी बातको सुनतेही उसकी तहको पहुँच जाना । २ सुचेत अर्थात् सदा हृदयका जाग्रत