कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सहज योग ७. रसनी ॥ ११ ॥
सतवाँ योग सहज है मीता । सहज भावसो सबही जीता ॥ एक विचार प्रेम उपजावे । पाँचै इन्द्री सहज समावे ॥ १ ॥ निरलोभी होय लोभ भुलावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥ निरल्लेप कितहुँ नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागै ॥ सहज ध्यान रहै लौलाई । सहजे सहजे पार लगाई ॥ ३ ॥ जा घट ज्ञान सहज समावे । सहजे माया आप भुलावे ॥ सहजे परिचय आतम होई । ब्रह्मरूपमें सहज समोई ॥ ४ ॥ सहज समाधि भले जग जाने । गुरु प्रतापते सहज पिछाने ॥ जप तप योग सहजमें आवे । काया कष्ट न कबहुँ करावे ॥ ५ ॥ आतम परिचय सहजहिं पावे । खुले नैन सो दरस करावे ॥ विना सहज दूसर कछु नहीं । सहजेमें सब रहा समाई ॥ ६ ॥ सहज योग जो कोई धरै । आप तरे औ जगको तारे ॥ सहजहिं आतम ब्रह्म प्रकाशा ॥ सहजे जीव मुझान विलासा ॥ ७ ॥ विना सहज नहीं भव पारा । विना सहज बूढे भव धारा ॥ कहे कवीर सुनो नर लोई । सहजे सहज भया सब कोई ॥ ८ ॥
समौ-सब जग झूठा जानिके, गहे नाम सत सार ।
सहजे सहजे प्रकट भया, सतगुरु शब्द सम्हार ॥ ११ ॥
शून्य योग ८ । रसनी ॥ १२ ॥
आठम योग शून्य है नीके । विना नाम जप लागु सुफीके ॥ सहजे नाम विदेह समावे । विना नाम कहाँ सुख पावे ॥ १ ॥ शून्यहिते सब जग उपराजा । शून्यहिते भव शब्द अवाजा ॥ शून्य सहज एक नाम विराजे । अनहद बाजा बाजन बाजे ॥ २ ॥ सहज शून्य जो लावे ध्याना । अलख लखे आप बलवाना ॥ नाम सहज शून्यमें होई । अलखहिं लखे आप है सोई ॥ ४ ॥