कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(४३१)
स्थिर करि प्रेम उपजावे । अनहद शब्द सुने चित लावे ॥ २ ॥ जो कछु कर्म योगते आवे । जानि प्रारब्ध शीस चढावे ॥ मनमें छोभ न लावे कबहीं । जो कछु आवे सह ले सबहीं ॥ ३ ॥ होनी होय टले नहिं काहू । करि असंतोष मिले का लाहू ॥ संतोषी हो ऐसी मति राखे । निराश वचन कबहुं नहिं भाखे ॥ ४ ॥ सोई योग संतोष कमावे । काल जाल ते जीव छुडावे ॥ विन संतोष काल सुख जाई । पाई संतोष काल बहाई ॥ ५ ॥
समौ-निरमल शब्द प्रकाश करि, रह सुख सेज समय । सत्यनाम संतोष विन, सत्यलोक नहिं जाय ॥९॥
निरवर योग ६ रमैनी ॥ १० ॥
छठवें योग है निरवैरा । जासे जगमें होय निवेरा ॥ सब घट भीतर एक करि जाने । होय सुहृद प्रेमहि परमाने ॥ १ ॥ सुखदाई सबहिनको भावे । जल सरूप होय अग्नि बुझावे ॥ शीतल होय सबहिनको भावे । समता होय तुरमता पावे ॥ २ ॥ निरवैरी निहकाम रहावे । साई सेती नेह लगावे ॥ साईके सबही जग माहीं । कापर दाय़ा कापर नाहीं ॥ ३ ॥ अपनो रूप जगत विखराना । कोहे आपन कोहै आना ॥ कासन बैर करो मोर भाई । अपनहि रूप रहा जग छाई ॥ ४ ॥ अपनो दांत जीभको काटे । तो कहैं कोई जीभ कहैं छांटे ॥ आपन अंगुरी आंख गडावे । तो कहैं अंगुरी काटि गिरावे ॥ ५ ॥ एकहि आतम सकल समाना । मायाके गुण आनहि आना ॥ अहै निजरूप सकलमें एकै । जो वस काशी सो बस मकै ॥ ६ ॥ मायावश हो सब जग भूला । मोर तोरके गर्वहिं फूला ॥ निरवैरी निहकाम सु होवे । सतगुरु ज्ञान बैर सब खोवे ॥ ७ ॥
समौ-कंचन कांच है एक सम, दुष्ट मित्र सब एक । दूजा भाव न जानई, एक नामकी टेक ॥ १० ॥