कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
विवेकयोग ३ रमनी ॥७॥
तीजो योग विवेक कहावे । विन विवेक कोइ पार न पावे ॥ जाके समाधान मन होई । भली बुरी कहि जावे कोई ॥ १ ॥ समदर्शी सम ज्ञान विचारे । सब घट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति गहै सो नाम समाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ २ ॥ जाके शान्ति होय घट माहीं । कोइ कछु कहो क्रोध मन नाहीं ॥ सोइ विवेकी सत पद जाने । सबहीं आतम एक पिछाने ॥ ३ ॥
समौ—जब लग नहीं विवेक मन, तब लग लगै न तीर ।
भवसागर नामी तरे, अस कथि कहैं कवीर ॥ ७ ॥
शील योग ४ रमनी ॥८॥
चौथा योग शील कहि दीन्हा । बिना शील साहब नहिं चीन्हा ॥ निर्मल सोचहिं सोच विचारे । सुच रुच दया धरम डर धारे ॥ १ ॥ मनको संयम करै जो जानी । पांचो पकड़ि एक घर आनी ॥ सत्यशब्द भासे संसारा । सतही ते उतरे भवपारा ॥ २ ॥ होय सरोतर सत्य बखाने । भावे भला बुरा कोइ मानै ॥ बुरा कर्म ते लजा करई । बिना विचार नहीं पगु धरई ॥ ३ ॥ जो काहुको होय उपकारा । मन बच कर्म करै उपचारा ॥ शीलवान जग अस बुधि पाई । आपन दिसि वह चूके नाहीं ॥ ४ ॥ शील पाइ इन्द्री निज साधे । गुरुगम पन्थ नाम अवराधे ॥ जियत मरै सोई शिलवन्ता । शब्द विचारि गहै मगु कन्ता ॥ ५ ॥
समौ—शील छमा जब ऊपजे, अलख दृष्टि तब होय ।
बिना शील पहुँचे नहीं, कोटि कथै जो कोय ॥ ८ ॥
संतोषयोग ५ रमनी ॥९॥
पंचवों योग संतोष बखाना । विन संतोष बूढे अज्ञाना ॥ मानो नहीं रंक औ राजा । होय अमान नहिं काहुसो काजा ॥ १ ॥ नर्क स्वर्ग बंछे नहिं कोई । होय अबंछक साहिब सोई ॥ मन