भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४२९)

दीसा । अष्टांगयोग सांख्य जो जाने । और लच्छन बत्तीस पिछाने ॥ २ ॥ प्रथम योग ज्ञान बखाना । दूसर विचार कहै परमाना ॥ तीसर योग विवेकहिं जाने । चौथा योग शील परधाने ॥ ३ ॥ पँचवां योग संतोष बखाना । योग निरवैर छठवहिं माना ॥ सतवाँ सहज योग है भाई । अठवाँ शून्य एक लौलाई ॥ ४ ॥

समौ-तेई भवसागर तरे, या करनी निज सार । सत क्रिया सतसो गहै, सत्यनाम आधार ॥ ४ ॥

ज्ञानयोग १ रमैनी ॥ ५ ॥

प्रथम योग ज्ञान है भाई । तेहिते सुख परमपद पाई ॥ निरालंब अलब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥ १ ॥ करम भरम तजि साहब जाने । भली बुरी कछु चित्त न आने ॥ निरवासिक वास नहिं कोई । जड़ल वस्ती एके होई ॥ २ ॥ होय निरभय रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥ द्वैत विचार न मनमें आवे । आतमरूप सदा दरसावे ॥ ३ ॥

समौ-एक नामको जानिके, दूजा देह बहाय ।

तीरथ वरत जप तप नहीं, आतम ब्रह्म समाय ॥ ५ ॥

विचारयोग २ रमैनी ॥ ६ ॥

दूजा योग विचार सम्हारे । निरमोही होय आप विचारे ॥ लै निरद्वन्द्व रहै जगमाहीं । जगके सुखसों लागे नाहीं ॥ १ ॥ मातु पिता सुत नारि निभावे । काम क्रोध मद लोभ भुलावे ॥ होय निशंक शब्द सो लागे । अनहद सुनै आतमा जागे ॥ २ ॥ देह अदेह करै निरुवारा । देही छोड़ विदेह पैसारा ॥ देह छोड़ विदेह समाना । हँसा पावे पद निर्वाना ॥ ३ ॥

समौ-जो कुछ करे सुविचारके, पाप पुन्य ते न्यार ।

नाम कवीरा जानिके, जाय पुरुष दरबार ॥ ६ ॥