कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(४३०)
कवीरपंथी—
विवेकयोग ३ रमनी ॥७॥
तीजो योग विवेक कहावे । विन विवेक कोइ पार न पावे ॥ जाके समाधान मन होई । भली बुरी कहि जावे कोई ॥ १ ॥ समदर्शी सम ज्ञान विचारे । सब घट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति गहै सो नाम समाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ २ ॥ जाके शान्ति होय घट माहीं । कोइ कछु कहो क्रोध मन नाहीं ॥ सोइ विवेकी सत पद जाने । सबहीं आतम एक पिछाने ॥ ३ ॥
समौ—जब लग नहीं विवेक मन, तब लग लगै न तीर ।
भवसागर नामी तरे, अस कथि कहैं कवीर ॥ ७ ॥
शील योग ४ रमनी ॥८॥
चौथा योग शील कहि दीन्हा । बिना शील साहब नहिं चीन्हा ॥ निर्मल सोचहिं सोच विचारे । सुच रुच दया धरम डर धारे ॥ १ ॥ मनको संयम करै जो जानी । पांचो पकड़ि एक घर आनी ॥ सत्यशब्द भासे संसारा । सतही ते उतरे भवपारा ॥ २ ॥ होय सरोतर सत्य बखाने । भावे भला बुरा कोइ मानै ॥ बुरा कर्म ते लजा करई । बिना विचार नहीं पगु धरई ॥ ३ ॥ जो काहुको होय उपकारा । मन बच कर्म करै उपचारा ॥ शीलवान जग अस बुधि पाई । आपन दिसि वह चूके नाहीं ॥ ४ ॥ शील पाइ इन्द्री निज साधे । गुरुगम पन्थ नाम अवराधे ॥ जियत मरै सोई शिलवन्ता । शब्द विचारि गहै मगु कन्ता ॥ ५ ॥
समौ—शील छमा जब ऊपजे, अलख दृष्टि तब होय ।
बिना शील पहुँचे नहीं, कोटि कथै जो कोय ॥ ८ ॥
संतोषयोग ५ रमनी ॥९॥
पंचवों योग संतोष बखाना । विन संतोष बूढे अज्ञाना ॥ मानो नहीं रंक औ राजा । होय अमान नहिं काहुसो काजा ॥ १ ॥ नर्क स्वर्ग बंछे नहिं कोई । होय अबंछक साहिब सोई ॥ मन
शब्दावली
(४३१)
स्थिर करि प्रेम उपजावे । अनहद शब्द सुने चित लावे ॥ २ ॥ जो कछु कर्म योगते आवे । जानि प्रारब्ध शीस चढावे ॥ मनमें छोभ न लावे कबहीं । जो कछु आवे सह ले सबहीं ॥ ३ ॥ होनी होय टले नहिं काहू । करि असंतोष मिले का लाहू ॥ संतोषी हो ऐसी मति राखे । निराश वचन कबहुं नहिं भाखे ॥ ४ ॥ सोई योग संतोष कमावे । काल जाल ते जीव छुडावे ॥ विन संतोष काल सुख जाई । पाई संतोष काल बहाई ॥ ५ ॥
समौ-निरमल शब्द प्रकाश करि, रह सुख सेज समय । सत्यनाम संतोष विन, सत्यलोक नहिं जाय ॥९॥
निरवर योग ६ रमैनी ॥ १० ॥
छठवें योग है निरवैरा । जासे जगमें होय निवेरा ॥ सब घट भीतर एक करि जाने । होय सुहृद प्रेमहि परमाने ॥ १ ॥ सुखदाई सबहिनको भावे । जल सरूप होय अग्नि बुझावे ॥ शीतल होय सबहिनको भावे । समता होय तुरमता पावे ॥ २ ॥ निरवैरी निहकाम रहावे । साई सेती नेह लगावे ॥ साईके सबही जग माहीं । कापर दाय़ा कापर नाहीं ॥ ३ ॥ अपनो रूप जगत विखराना । कोहे आपन कोहै आना ॥ कासन बैर करो मोर भाई । अपनहि रूप रहा जग छाई ॥ ४ ॥ अपनो दांत जीभको काटे । तो कहैं कोई जीभ कहैं छांटे ॥ आपन अंगुरी आंख गडावे । तो कहैं अंगुरी काटि गिरावे ॥ ५ ॥ एकहि आतम सकल समाना । मायाके गुण आनहि आना ॥ अहै निजरूप सकलमें एकै । जो वस काशी सो बस मकै ॥ ६ ॥ मायावश हो सब जग भूला । मोर तोरके गर्वहिं फूला ॥ निरवैरी निहकाम सु होवे । सतगुरु ज्ञान बैर सब खोवे ॥ ७ ॥
समौ-कंचन कांच है एक सम, दुष्ट मित्र सब एक । दूजा भाव न जानई, एक नामकी टेक ॥ १० ॥
(४३२)
कवीरपंथी—
सहज योग ७. रसनी ॥ ११ ॥
सतवाँ योग सहज है मीता । सहज भावसो सबही जीता ॥ एक विचार प्रेम उपजावे । पाँचै इन्द्री सहज समावे ॥ १ ॥ निरलोभी होय लोभ भुलावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥ निरल्लेप कितहुँ नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागै ॥ सहज ध्यान रहै लौलाई । सहजे सहजे पार लगाई ॥ ३ ॥ जा घट ज्ञान सहज समावे । सहजे माया आप भुलावे ॥ सहजे परिचय आतम होई । ब्रह्मरूपमें सहज समोई ॥ ४ ॥ सहज समाधि भले जग जाने । गुरु प्रतापते सहज पिछाने ॥ जप तप योग सहजमें आवे । काया कष्ट न कबहुँ करावे ॥ ५ ॥ आतम परिचय सहजहिं पावे । खुले नैन सो दरस करावे ॥ विना सहज दूसर कछु नहीं । सहजेमें सब रहा समाई ॥ ६ ॥ सहज योग जो कोई धरै । आप तरे औ जगको तारे ॥ सहजहिं आतम ब्रह्म प्रकाशा ॥ सहजे जीव मुझान विलासा ॥ ७ ॥ विना सहज नहीं भव पारा । विना सहज बूढे भव धारा ॥ कहे कवीर सुनो नर लोई । सहजे सहज भया सब कोई ॥ ८ ॥
समौ-सब जग झूठा जानिके, गहे नाम सत सार ।
सहजे सहजे प्रकट भया, सतगुरु शब्द सम्हार ॥ ११ ॥
शून्य योग ८ । रसनी ॥ १२ ॥
आठम योग शून्य है नीके । विना नाम जप लागु सुफीके ॥ सहजे नाम विदेह समावे । विना नाम कहाँ सुख पावे ॥ १ ॥ शून्यहिते सब जग उपराजा । शून्यहिते भव शब्द अवाजा ॥ शून्य सहज एक नाम विराजे । अनहद बाजा बाजन बाजे ॥ २ ॥ सहज शून्य जो लावे ध्याना । अलख लखे आप बलवाना ॥ नाम सहज शून्यमें होई । अलखहिं लखे आप है सोई ॥ ४ ॥
शब्दावली
(४३३)
सहज शून्य जो ध्यान लगावे । भौजल तरत वार नहीं लावे ॥ सुराते शब्दमें सहज समावे । सहज समाधि परमपद पावे ॥६॥ जब लग नाम विदेह न आवे । तब लग सहज समाधि न पावे ॥ ध्यान विदेह औ ज्ञान विदेहा । सहज समाधिमें चहिये एहा ॥६॥ ध्यान विदेह लखे जब प्रानी । विदेह नाम मिले परमानी ॥ काया नाम सबे जग जाने । नाम विदेह विरले पहिचाने ॥ ७ ॥
समौ-ज्ञान विचार विवेकसो, शील संतोष समय ।
नाम गहे निरभय रहै, सहज सतलोक समय ॥ १२ ॥
शब्द सनेही होय रहै, जगते रहै उदास ।
सुख सागरमें घर करै, सत्य नाम विश्वास ॥
अब्दांगयोगका सार (१) ज्ञान परीक्षा साखी ।
ज्ञानी लक्षण चार हैं, सुनि त्यागो विस्माद ।
निरालंब निहभ्रमपुनि, निर्वासिक निहस्वाद ॥ १ ॥
भावार्थ-ज्ञानकी परीक्षा चार गुणोंसे होती है-
१ निरालम्ब, २ निःभ्रम, ३ निर्वासना, ४ निःस्वाद ॥
(२) विचार परीक्षा ।
विचार परीक्षा चार है, निर्मोही निरबन्द ।
निःशंक निरावरण सोई, छुटे कालको फन्द ॥ २ ॥
भावार्थ-विचार योगकी प्राप्ति इन चार लक्षणोंसे जानी जाती है-१ निर्मोही होवे, २ निर्वन्ध हो, ३ निःशंक हो, ४ निरावरण अर्थात् आत्मरूपमें सन्देह न हो ॥
(३) विवेक परीक्षा ।
सर्वज्ञी सुचेत होय, सावधान मन मार ।
सार आही सुजानिये, विवेक परीक्षा चार ॥ ३ ॥
भावार्थ-१ सर्वज्ञी अर्थात् किसी बातको सुनतेही उसकी तहको पहुँच जाना । २ सुचेत अर्थात् सदा हृदयका जाग्रत
(४३४)
कवीरपंथी-
रखना, गाफिल न होना, प्रमादमें न भूलना, ३ सावधान मन इन्द्री आदि सबोंपर सदा दृष्टि रखना, जिसमें ये ठगने न पावें। ४ सारग्राही-कैसा भी प्रसंग उलटा-सुलटा सम्मुख आकर उपस्थित हो उसमेंसे उत्तम सार ले लेना ॥
(४) शील परीक्षा ।
शुचि साधन संयम करन, श्रवण करन गुरु वानि । विनय वचन सब सो कहै, रूप आपनो जानि ॥४॥
भावार्थ-जिसमें शील आता है-उसमें चार गुण आकर वास करते हैं। १ पवित्रता-भीतर बाहर दोनों प्रकारसे पवित्र रहता है। २ संयम-शारीरिक मानसिक जितने कार्य हैं सब नियम पूर्वक करता है। ३ गुरुकी वाणी और उपदेशमें श्रद्धा (विश्वास) रखता है। ४ नम्रता-सबके साथ कोमलतासे वरतता है।
५ संतोष परीक्षा ॥ ४ ॥
संतोष परीक्षा सुनि लीजे । अयाची अमानी मन दीजे ॥ स्थिर वाच्छा नहि करई । सो संतोषी संत उच्चरई ॥५॥
भावार्थ-जिसके हृदयमें संतोषका वास होता है वह- १ अयाँची-अर्थात् यथा प्राप्त संतुष्ट रहकर उसीमें निर्वाह कर लेता है किसीसे याचना करनेकी इच्छा नहीं रखता। २ अमानी-मिथ्या अभिमान कर आप दुःखी नहीं होता; दूसरोंको भी दुःखी नहीं करना। ३ स्थिर-अर्थात् सदा धैर्यके साथ अपना सब कार्य करता है कभी घबराता नहीं। ४ अबाँछित-यथा प्राप्तमें संतुष्ट रहनेवाला अधिककी वांछाही क्यों करेगा।
६ निर्वर परीक्षा ४.
सुहिरदयता शीतलता, समता जान सुजान । सुखदाई सब जीवको, निरवैरी पहिचान ॥ ६ ॥ भावार्थ-निर्वैरता जिसमें आती है वह- १ सुहृद होजाता है
शब्दावली
(४३५)
किसीके साथ किसी अवस्थामें भी छल कपटका वर्ताव नहीं करता । २ शीतलता-अर्थात् सदा शान्त अकोध रहता है । ३ समता-धारण करता है अर्थात् सब जीवोंके सुख दुःखोंको अपने आत्माके समानही समझकर उनसे समानता वरतता है । ४ सुखदाई-सबके लिये सुखदाई होता है अर्थात् कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे किसीको दुःख होवे ।
७ सहज परीक्षा ४.
निह प्रपंच निहतरंग रु, निर्द्भन्द निरलेप । चारौ लक्षण सहजके, मिटे सकल विशेष ॥ ७ ॥
भावार्थ-सहजयोग अर्थात् सहज वृत्तिको धारण करनेवालोंमें चार गुण स्वभावसेही वास करते हैं । १ निष्प्रपंचता-सहज वृत्तिवाला पुरुष प्रपंचमें कभी नहीं फँसता-जहाँ कहीं प्रपंचकी वृद्धि देखता है आप वहाँसे खसक जाता है । २ निहतरङ्ग-नाना प्रकारके मनके तरङ्गोंसे अपनेको बचा रखता है । ३ निर्द्भन्द-द्रन्दसे अलग रहता है । ४ निलैप-सदा सबमें रहते हुए भी निलैप-रहता है ।
“सब संग रसिये सब संग बसिये सबका लीजे नाम । हाँजी हाँजी सबकी कीजे. रहिये अपने ठाम ॥”
८ शून्य ।
लव धीरज अरु ध्यान जो, मिली समाधि है चार । ये लक्षण हैं शून्यके, किये संत प्रचार ॥ ८ ॥
भावार्थ-शून्य अथवा समाधिवानके ४ लक्षण हैं । १ लव-एक ओर वृत्ति लगी रहै. २ धीर्य-जिस काममें लगे दृढ होकर लगे. ३-ध्यान-जिधर वृत्ति जाय उधरही तन्मय हो जावे. ४-समाधि-ध्येय वस्तुमें ऐसा निमग्न हो जाना कि, जुदाई जान न पड़े ॥
(४३६)
कवीरपंथी-
समौ-ये बत्तिस जब ऊगहीं, तैतीसो छिप जाय । कहै कवीर सुनु गोरखा, आवा गमन नसाय ॥
इति अष्टाङ्ग योगकी रमनी ॥
रमनी--करीमकी हिकमत ॥
वाह करीम वलि हिकमत तेरी । खाक एक सूरत बहुतेरी ॥ औघे बासन नीर जमाया । जतन जतन करि नूर उपाया ॥ १ ॥ आप मनीका सकल पसारा । हिन्दू तुरुक कोई नहि न्यारा ॥ दम दम करि बोले सब कोई । दमके भीतर हरदम होई ॥ २ ॥ बाहर दमको लखै जो कोई । ताको आवा-गमन न होई ॥ दम लखिया जिन लखिया नामा । दम छूटा पाये निज ठामा ॥ ३ ॥ पीर पैगम्बर शेख मुलाना । तुम्हरी सिफत सुनि भै दिवाना ॥ कहै कवीर वह साहब न्यारा । यार वाः यार वाः यार हमारा ॥ ४ ॥
रमनी--काया मसजिद ॥
यार वा यार वा यार हमारा । सब जीवनका प्रान अधारा ॥ काया मसजिद अजब सँवारी । दोय खम्भा दस लगी किवारी ॥ १ ॥ ता भीतर होय बंग निमाजा । हरदम इरदम हरदम साजा ॥ एक मसजिद दसो दरवाजा । मन मुछा तहैं पठै निमाजा ॥ २ ॥ ज्ञान करद मौन दिल पकरी । बिस्मिल कीन्हो पांचो बकरी ॥ पांच चोर करै कुफराना । मारी सबदसूँ किया छिमाना ॥ ३ ॥ पांच पीर बसे इक थाना । शब्द अनाहद घुरै निशाना ॥ कहैं कवीर अजब कछु देखा । नूर नाम सत साहब पेखा ॥ ४ ॥
रमनी--मन ॥
मनकी मूठ लखै जो कोई । सो जन संत पारखी होई ॥ नगन मगन बकला कंद खाई । देखि दिसा मनको पतियाई ॥ १ ॥ बहु विधि बकता चतुर परवाना । अलप अहारी काया खीना ॥ बहु बुधिमान प्रेम हित रोवै । रंचक चाह रसातल बोवै ॥ २ ॥
शब्दावली
(४३७)
ताके फंद परे जो कोई । रंचक सुख दुख बहुते होई ॥ कहै कवीर सोई निज दासा । जाको पारबल्लकी आसा ॥ ३ ॥
साखी-जो तू चाहे मुड़झको, मति कछु राखे आस । मुड़झ सरीखा होय रहो, सब कुछ तेरे पास ॥
रमैनी-मन राजा ॥
मन राजा संग पवन वजीरा । चित चंचल निश्चल नहि थीरा ॥ पांच मवासो त्रिगुण खाई । पांच पचीस जिनके संग भाई ॥ तैंतीसो मिलि द्रन्द्र मचावैं । मन राजाको नाच नचावैं ॥ ज्ञान सूरमा बीडा लीन्हा । तैंतीसों पर डेरा दीन्हा ॥२॥ पांच मवासी मिलिया आई । मन राजा पर फिरी दुहाई ॥ जोग जुगतका लशकर साजा । गगन दमामा निरभय बाजा ॥ ३ ॥ झलकत चन्दा जोति अपारा । मिटिगा तिमिर भया उजियारा ॥ गुरु परताप सकल बस हूआ । नहीं कोइ जूझा नहि कोइ मूआ ॥४॥ आप आपमें सबही जाना । जिन जाना तिन निजके माना ॥ कहैं कवीर या पद को बूझे । आपा मिटे तबही घर सूझे ॥५॥
साखी-ऐसी बानी बोलिये, मनका आपा खोय । या आपाको डार दे, दया करै सब कोय ॥
रमैनी-कथता बकता ॥
कथता बकता श्रोता सोई । आप विचारे ज्ञानी होई ॥ चंचल चपल बुधिका बेला । अगिन पवन पानीका मेला ॥ १ ॥ नव दरवाजा दसूं दुवारा । बूझहु ज्ञानी ज्ञान विचारा ॥ माटीका गौन पवनका सूआ । पांच तत्त्वले परगट हूआ ॥ २ ॥ काया माटी बोले पवना । बूझे पण्डित सूवा कौना ॥ मुई सुरति बाद अहं- कारा । एक न सूवा बोलन हारा ॥ ३ ॥ जिस कारन तप तीरथ जाहीं । रतन पदारथ है घर माहीं ॥ पठ पठ पंडित वेद बखाना ।
(४३८)
कवीरपंथी-
भीतर होती वस्तु न जाना ॥ ४ ॥ हूँ न मरूँ मेरी मरै बलाय । बोलन हारा रहै समाय ॥ कहैं कवीर गुरु ब्रह्म बताया । मरता जीता नजर न आया ॥ ५ ॥
सा०-राम मरै तो हम मरै, नातर मरे बलाय । अविनासीको चीगुटा, मरे न मारा जाय ॥
रमनी । बोलना ।
बोलना कहा कहिये रे भाई । बोलत बोलत तत्त्व नसाई ॥ १ ॥ बोलत बोलत बढै विकारा । चित्त बोलेका होय विचारा ॥ २ ॥ संत मिलै कछु कहिँ कहिये । मिलै असंत मौन होय रहिये ॥ ३ ॥ ज्ञानी सो बोले हितकारी । मूरख सो बोले झखमारी ॥ ४ ॥ कहैं कवीर आधा घट डोलै । भरा होय तो मुखों न बोले ॥ ५ ॥
सा०-बोली तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल । हिये तराजू तौलके, तब मुख बाहर खोल ॥
रमनी सातगुक्की ।
गुरु गुरु कहत सकल संसारा । गुरु सोइ जिन तत्त्व विचारा ॥१॥ प्रथम गुरु हैं माता पिता । रज वीरजके जो हैं दाता ॥२॥ दूसर गुरु है मनसा दाई । गर्भवासको बंध छुड़ाई ॥ ३ ॥ तीसर गुरु जिन धरिया नामा । लेले नाम पुकारे गामा ॥ ४ ॥ चौथे गुरु जिन दीच्छा दीन्हा । जग व्यवहार रीति सब कीन्हा ॥ ५ ॥ पांचे गुरु जिन वैष्णव कीन्हा । रामनामको सुमिरन दीन्हा ॥ ६ ॥ छठे गुरु जिन भ्रम गढ तोडा । दुविधा मेटि एकसों जोडा ॥ ७ ॥ सातम गुरु सत शब्द लखाया । जहाँका तत ले तहाँ समाया ॥ साखी-सात गुरु संसारमें, सेवक सब संसार । सतगुरु सोई जानिये, भव जल तारे पार ॥
रमनी निर्वाण देश ॥
हंस वा दिस करहु पयाना । जा देस बसै पुरुष पुराना ॥ हल न चले जहाँ बहै न कुदारा । अमृत भोजन करै अहारा ॥ १ ॥
शब्दावली
(४३९)
चले न चरखा बजै न ताती । अम्बर चौर पहिरे बहु भांती ॥ बरषै न मेघ चुवै नहिं पानी । शीतल सुरति अमी भरि आनी ॥२॥ चंद न सूर दिवस नहिं राती । कुल नहिं भेद वरन नहिं जाती ॥ रोग न दोष जहँ शोक न संतापा । कहै कवीर जहँ समरथ आपा ॥३॥
साखी-सुरति समानो निरतमें, निरत रही निरधार । सुरति निरति परचा भया, तब पाया दीदार ॥
रमैनी गुरुकी ॥
गुरु सम दाता कोड़ नहिं भाई । मुक्तिक मार्ग दियो बताई ॥ गुरु विन हिरदय ज्ञान न आवे । ज्यों कस्तूरी मिरग भुलावे ॥ गुरु विनु मिटै न अपनो आपा । भरम जेवरी बाँध्यो साँपा ॥ गुरु विनु केहरि कूपहिं पडिया । गुरु विनु गज छायाहिं लडिया ॥ गुरु विन स्वान देखि बहु भेखा । मन्दिर एक काँचको देखा ॥ चहुँ दिसि दीखै अपनी छाया । भूँकत भूँकत प्राण गँवाया ॥ गुरु विन मुवा नलनी सो बंधा । गुरु विन कपि पडो सो फंदा ॥ कहैं कवीर भरम्यो संसारा । गुरु विन सतगुरु किम उत्तै पारा ॥
साखी-भरम जेवरी गज बंध्यो, फिर जन्मे मर जाय । कहै कवीर सतगुरु मिलै, तब सतलोक सिधाय ॥
रमैनी-विरह शर्ता ॥
तैं कहैं जाने बिरहकी बाती । प्रेम न उपजे तेरी छाती ॥ जैसी प्रीति मच्छ जो कीन्हा । जलते विछुडे जीवहिं दीन्हा ॥ ऐसी प्रीति मच्छीकी जानी । सूवा पीछे माँग्यो पानी ॥ धन सरवर जहँ काली माटी । प्रीतम बिछुडे छाती फाटी ॥ कब तोर हाड रु माँस सुखाया । कब तोर नयनन लोहू आया ॥ कब तैंने प्रेम पियाला पीया । कब तैं पिय मार्ग सिर दीया ॥ कहैं कवीर योही तन खोया ॥ पाँव पसार पेट भर सोया ॥
(४४०)
कवीरपंथी-
सा०-जब लग विरह उपजे नहीं, तब लग नहिं पहिचान । प्रेम परगटचो जब अंगमें, मन तब किया कुरबान ॥
रसनी-गुरुटककी ॥
जाको टेक एक गुरु दाता । ताको और कछु न सुहाता ॥ पय जो बिगडा माखन होई । बिगडे छाँछ कहै नहिं कोई ॥ पतिव्रताको लाँछन होई । गनिका बिगडे कहत न कोई ॥ सूरा भागा आप विगोई । कायर भागा कहै न कोई ॥ नटनी नाचै आपा खोई । देखन हार पड़े नहिं कोई ॥ भूला मनको जो समुझावे । आदि अंत सोइ संत कहावे ॥ कहैं कवीर हम एता कहिया । सांच माने सो नरकहिं गइया ॥
सा०-डालकी चूकी बांदरी, शब्दका चूका हंस । कहैं कवीर धर्मदास सो, दोऊ निरफल वंस ॥
रसनी-गुरु महिमा ॥
सतगुरु बोले अमृत वानी । गुरु विन मुक्ति नहीं रे प्रानी ॥ गुरु हैं आदि अंतके दाता । गुरु है मुक्ति पदारथ आता ॥ गंगा काशी अस्थाना । चारि वेद गुरु गमते जाना ॥ गुरु है सुरसरि निर्मल धारा । विनु गुरु घटना हो उजियारा ॥ अडसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आवे । गुरुकी दया घर बैठहिं पावे ॥ गुरु कहै सोई पुन करिये । मातु पिता दोऊ कुल तरिये ॥ गुरु पारस परसे नर लोई । लोहते कंचन होय सोई ॥ शुक देव गुरु जनक बिदेही । वो भी गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु प्रह्लाद पठाये । भक्ति हेतु जिन दर्शन पाये । कागभुसुंड शम्भु गुरु कीन्हा ॥ अगम निगम सबही कहि दीन्हा । ब्रह्मा गुरु अग्निको कीन्हा ॥ होम यज्ञ जिन आज्ञा दीन्हा ॥ वशिष्ठ गुरु किया रघुनाथा । पाइ दरस तब भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरना । पाइ भक्ति तब तारन तरना ॥ नारद दिच्छा धिमर सो पायो । चौरासी सो
शब्दावली
(४४१)
तुरत छुडायो ॥ गुरु कहै सोई है साँचा । विनु पगिचय सेवक है काँचा ॥ कहै कवीर गुरु आपु अकेला । दश औतार गुरुका चेला ॥ साखी-राम कृष्ण ते को बडा, उनहु तो गुरु कीन । तीन लोकके वै धनी, गुरु आगे आधीन ॥
रमनी—गुलाहाकी ॥
जुलहा कहि कहि जग भरमाया । मो जुलहेका मरम न पाया ॥ समझ विना जिव भरम भुलाना । विनही सूत न पसारे ताना ॥ धरनि अकास बिच खाड खुदाई । चन्द सुर दोय नली भराई ॥ आदि नामका पूरन पूरा । चेतहु अंधा पथ है दूरा ॥ सूत कुसूत बुने नर कोरी । वाको सुरति निरति है जोरी ॥ हम षट दर्शन हम षट भेखा । हमही तत्व अनूप अलेखा ॥ हम हैं सकल सकल हम माहीं । हमते और दूसरा नाही ॥ सबही कर्म हमारा कहिया । हम करमनते न्यारा रहिया ॥ निरगुन सगुन खेल हमारा । हमरा चौदह लोक पसारा ॥ बन्दीछोर है विरद हमारा । हमही बन्दी छुडावन हारा ॥ जुग जुग बन्द छुडावन आये । ताते बंदीछोर कहाये ॥ कहै कवीर हम अगम अपारी । स्वसम नली सो एक हमारी ॥
रमनी—स्वरूप महिमा ॥
जीवत जीव जागनी ठानै । माया ब्रह्म दोऊ पहिचाने ॥ तीन सुरूप एकहि देखा । ताको निहचल विज्ञान विसेखा ॥ माया ब्रह्म दोऊते न्यारा । आगे पारब्रह्म उजियारा ॥ विज्ञानीको कोइ नहि पावे । वाहि स्वरूप नजर नहि आवे ॥ तूनकी ओट पहाड़ लुकाना । ऐसे ताहि दूर मति जाना ॥ है हममें हमही सा देखा । निज सुरूपको यही विशेषा ॥ आवे कहीं कहुँ नहि जाई । समुन्द्र लहरि समुन्द्र समाई ॥ ज्यों बालक खेले फिरकाई । देखि परे तो सकल फिराई ॥ जो हिरदामें होय रहे थीरा । ताका विनसे नाहि शरीरा ॥ चंचल निहचल यहि रूपा । निरखे देखि यहि वस्तु
(४४२)
कवीरपंथी-
अनूपा ॥ बिछरन मिलन होय कछु केरा । जैसे सोवै सुपना तेरा ॥ सोवे जहाँ तहाँ उठि जागे । पंछी मनि राह उठि लागे ॥ आगे पीछे मध्यम कोई । ऐसा सहज सरूपी होई ॥
साखी-सहज सरूपी होय रहै, दिलकी दुविधा जाय । अकह कवीरा क्या कहै, उलटि कालको खाय ॥
रमनी-कालजीत ॥
काल न आवे निहचल होई । अब यह जतन करो सब कोई ॥ निहचल चित्त न कबहुँ चलावे । ताको काल न कबहुँ सतावे ॥ परगट कहा तब है जग माहीं । जागे जाकूँ सूझे नाहीं ॥ जो कोइ चेतन होय करि जागे । ताके तसकर कबहुँ न लागे ॥ कलह कल्पना सब विधि खोई । निहचे सहज सरूपी होइ ॥ इच्छा ते जग जीवत नाई । ब्रह्म अनिच्छित गहै चित लाई ॥ कारज कारनकी यह बाता । माया माहीं ब्रह्म समाता ॥ माया माहीं ब्रह्म फंदाया । ताते पुरुष प्रकृति कहाया । अच्छर है इक और अनूपा ॥ पारब्रह्म अन इच्छित रूपा । पूर्ण ब्रह्मते न्यारा होई । परमहंसनको प्यारा सोई ॥ हंसदसा होय जु भाई । ताको काल कबहुँ नहिं खाई ॥
साखी-काल काल सबही कहे, काल न जाने कोय ।
जेती मनकी कल्पना, काल कहावै सोय ॥
रमनी-निर्वाणपद ।
ऐसा ब्रह्म विचारो भाई । शब्द उठै धुनि कहाँ समाई ॥ काष्ठ मथि २ अगिन उपाई । उलटि अग्नि काष्ठको खाई ॥ दोनों नास भयो इक ठाऊँ । उड़ गइ भसम धरेका नाऊँ ॥ भस्म भई उड़ कहवों गई । सो गति याकी ऐसी भई ॥ सुए जीव जइहो जाहाँ । जीवतही ले राखो ताहाँ ॥ जैसो केल कदली खंद । ऐसा पारब्रह्म गोविन्द ॥ खोजत खोजत पायो ठौर । मैं जानो कछु आगे और ॥ नहिं कछु नहिं कछु नहिं कछु सोई । पंछी पीछे खोज न होई ॥
शब्दावली
(४४३)
दास कवीर तहां लौलीन । आगे पन्थ न पीछे चीन ॥
सा०—सबही घर है गांवमें, गाँव कौन घर माहिं ।
ऐसे सब जग ब्रह्ममें, न्यारो कितहुँ नाहिं ॥
सत्यनाथ ।
रमैनी—स्वरूप पहिचान ॥
आपने रूप राम हम पाये । ताते जीवन मुक्ति घर आये ॥ तब हम भक्ति कीन हरि केरी । आसा राखी मनसा घेरी ॥ आसा मनसा भई निरासा । छुट गये बन्धन भये खुलासा ॥ तब हम योगयुक्ति चित धरते । अष्ट कला मन पवना भरते ॥ अब हम पायो अपना भेव । आपुहि कर्ता आपुहि देव ॥ तब हम जान्यो यह अब जानी । अन जानेसे करी पहिचानी ॥ गयो भरम मन बव्यो हुलास । सहजहिं राम कवीरा दास ॥
सा०—अर्थ धर्म अरु काम तजि, देह काल सिर धूर ।
संशय नाहीं मुक्तिमें, ब्रह्म रहा भरपूर ॥
रमैनी एकतार ।
भजि यकतार भ्रममति भूलो । है यकतार सबनको दूलो ॥ बिन यकतार कस पतिवरता । एक पिया विन सबै अविस्था ॥ १॥ राम राम कहि भक्ति दिठावे । बिन यकतार राम कहँ पावे ॥ भागवत सौ पुरान उचारे । निगम चारि सुनि श्रुति विचारे ॥२॥ वेद पढै पढि अरथ बतावे । विन यकतार थाह नहिं पावै ॥ बिन अंकूर बीज नहिं ऊगे । विन यकतार हंस कहँ पूगे ॥ ३ ॥ बिन यकतार भक्ति क्या कीजे । गुरु प्रताप अमीरस पीजे ॥ रंकार जहँ अनहद गाजे । ता ऊपर यकतार विराजे ॥४॥ इंगला पिंगला सुषमन साधै । ले उदान पौन तहँ बांधे ॥ अरधै उरधै सुरति लगावे । विन यकतार पीव नहिं पावै ॥ ५ ॥ वेद पुरान अरु शास्तर सोधै । अर्थ करि करि मन परबोधै ॥ जहँलग वेद तहांलग
(४४४)
कवीरपंथी-
ओंकारा । केवल ब्रह्म वेद सो न्यारा ॥ ६ ॥ षट दर्शन जहँ कोह न देखा । वह यकतार सुरति सो पेखा ॥ जाको गुरु यकतार लखाया । पहुँचा धाम बहुरि नहि आया ॥ ७ ॥ जैसे सरिता सिन्धु समाई । ऐसे हंसे सुरति मिलाई ॥ है यकतार सजीवन बूटी । बिन यकतार बात सब झूठी ॥ ८ ॥ बात कहूँ तो कोइ न मानै । जिन देखा सोई पहिचानै ॥ पूरब जन्म भक्ति परगटाई । सो यकतारहि लखै बनाई ॥ ९ ॥ छर अच्छर दोनों ते न्यारा । है यकतार सकल आधार ॥ है सब रस पर जिह्वा नहि आवे । बैठि निरंतर नाद बजावे ॥ १० ॥ जप तप और अनेक दृढावे । बिन यकतार मुक्ति नहि पावे ॥ जप तप व्रत खीन होय जाई । बिन यकतार न हंसा पाई ॥ ११ ॥
समौ-सतगुरु सो साँचा रहै, सुरति रहै यकतार । कहै कवीर धर्मदास सो, पहुँचे लोक मंझार ॥
रमनी-ज्ञान विरह ॥
लागी चोट शब्दकी तनमें । गिरह नहिँ चैन चैन नहिँ बनमें ॥ सूरा खेत जबै मंडाना । ना जानू को रहै निदाना ॥ १ ॥ दूँदत फिहँ पीव नहिँ पाऊँ । औषधि मूल कहाँ घसि लाऊँ ॥ तुमसे वैद न हमसे रोगी । बिन दीदार क्यों जिये वियोगी ॥ २ ॥ एकहि रंग रंगी सब नारी । ना जानू को पियकी प्यारी ॥ कहै कवीर कोइ गुरुमुख पावे । बिन दरस न दीदार दिखावे ॥ ३ ॥
समौ-साधु हमारे शिरधनी, हम साधुनकी खेह । रोम रोममें रमि रहा, ज्यों बादलमें मेह ॥
रमनी षट दर्शन ।
बंदा ! दरसे सब घट माहीं । अंधरे अंखिया सूझत नाहीं ॥ या घट चन्दा या घट सूरा । या घट बाजै अनहदू तूरा ॥ १ ॥ या घट मथुरा या घट काशी । या घट पूरि रहा अविनाशी ॥
शब्दावली
(४४५)
या घट भीतर दस दरवाजा । पांच प्रधान छठी मन राजा ॥ २ ॥ या घट भीतर सोलह खाई । चक्र फिरे गढ मुसौ न जाई ॥ या घट भीतर धोबि पुरानी । कपडा धोवे विनु सिल पानी ॥ ३ ॥ धोयलेरे धोबिया मधुरिसि धारा । उत्तम निर्मल घाट हमारा ॥ कहै कवीर कोइ धोवे विचारी । जो धोवे सो उत्तरे पारी ॥ ४ ॥ समौ-घटहीमें सबहीं बसैं, जह लगि ज्ञान विलास । सब ऊपर साहब धनी, घटहीमें निज बास ॥
रमैनी—योग भोगकी ॥
दुनिया दिवानी हमहुं दिवाना । हमरे तो है अनहद ज्ञाना ॥ दुनिया पट पटंबर भोगी । हम तो ज्ञान पदार्थ योगी ॥ १ ॥ दुनिया चाहे हस्ती घोडा । हम पाय पियादे गढ तोडा ॥ दुनिया चाहे विषरा प्याला । हम तो नाम सदा मतवाला ॥ २ ॥ दुनिया अपने मारग जाई । हम तो सतकी राह चलाई ॥ कहैं कवीर हम पाई छाहीं । जीवतके संग सुवाके माहीं ॥ ३ ॥
साखी—हम वासी वहि देशके, पार ब्रह्मका खेल । दीपक पाया गैवका, बिन बाती बिन तेल ॥
आदि रमैनी ।
आदि रमैनी कहूँ विचारी । सुनियो संतो कथा निनारी ॥ युग छत्तीस छयानवे लाखा । अरब कोटि सत सुकृत भाखा ॥ १ ॥ जब नहिं होते शून्य बिस्मूत्रा । जब नहिं होते पाप औ पुत्रा ॥ न था वेद अरु ना थी बानी । ना था ब्रह्मा नहिं थी ब्रह्मानी ॥ २ ॥ ना था पवन नहीं था पानी । ना थी माया अकथ कहानी ॥ ना थी धरती नहीं अकासा । जब नहिं होता तत्त्व विलासा ॥ ३ ॥ जब नहिं होता तुरुक औ हिन्दू । माताका रक्त पिताका बिन्दू ॥ जब नहिं होता गाय कसाई । कहो विसमिछाह किन फरमाई ॥ ४ ॥ जब नहिं होता भादू माहा । कच्छ मच्छ नहीं बाराहा ॥ जब
(४४६)
कवीरपंथी—
नहिं होते रघुपति रावन । जब नहिं होते कृष्ण बलि बावन ॥ ५ ॥ जब नहिं होते शम्भु गौर । जब नहिं होते दश औतारा ॥ जब नहिं होते कूर्म औ शेष । जब नहिं शारद गौरि गणेशा ॥ ६ ॥ जब नहिं होते निरंजन राया । जिन जीवन कहैं बांधि झुलाया ॥ तेतीस कोट देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥ ७ ॥
समौ-कहैं कविर कछु ना होता, होता आप अलेख । तबका आप कवीर है, धरि धरि खेले भेख ॥
रमनी-एक ओंकार ॥
ऐसा ज्ञान विचारै कोई । सो नर जीवन मुक्तता होई ॥ पाँच तत्त्व गुण तीनों सोई । अविगत सो सब परगट होई ॥ १ ॥ बोलनहारा कहैं सो हूआ । कैसे उपजा कैसे मूआ ॥ पवनकी गाँठ सहज बनि आई । ताका बना बगूला भाई ॥ २ ॥ खुलि गइ गाँठ खोज नहिं पाया । पवनक पुतला पवन समाया ॥ जैसे बादल होत अकारा । तैसे दरसे यह संसारा ॥ ३ ॥ मिट गया बादल रहा अकासा । ऐसे आतमको न विनासा ॥ इस बहुरंगीका पार न पाया । कहैं कवीर गुरु भेद लखाया ॥ ४ ॥ पाया भेद भया उजियारा । साहब दरस्यो पार ओंकारा ॥ यही ज्ञान रतन है भाई । जो पावै सुख विलसे आई ॥ ५ ॥
साखी-ज्ञान रतनकी कोठरी, चुपकर दीजे ताल । पारिख आगे खोलिये, शीतल बचन रिसाल ॥
रमनी-गुरु महिमा ॥
गुरु मिले तो सत्य लखावे । बिन गुरु अन्त न कोऊ पावे ॥ जिन गुरुकी कीन्ही परतीती । एक नाम कर भवजल जीती ॥ १ ॥ गुरु प्रेमते जीव मराला । गुरु स्नेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु परगट गुरु गुप्त अधारा ॥ २ ॥ गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थल महाँ कीन निवासा ॥ चन्द सूर
शब्दावली
(४४७)
गुरु सब संसारा । गुरु विन होय न कोइ व्यवहारा ॥ ३ ॥ गुरु ब्रह्मा औ विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥ चर अचर जहां लगि सब देखा । गुरु विन कछु और नहिं पेखा ॥४॥ उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्है गुरु बरिष्ठा ॥ ये सब जीव गुरु मय जानो । गुरुसे भिन्न और नहिं मानो ॥ ५ ॥ गुप्त प्रगट सबही जग जाया । सबहीमें है सतगुरुकी छाया ॥ कहैं कवीर सो हंस पियारा । यही भांतिते गुरु दरश निहारा ॥ ६ ॥
सा०-सो गुरु निसिदिन बंदिषे, जासो पढ़ये नाम । नाम विना घट अंध है, ज्यों दीपक विन धाम ॥
रत्नो-गृहो रहनी ॥
गृही भाव भक्ति जो साधे । संत साधु सेवा अचराधे ॥ चर तजि बाहर कबहुँ न जाई । गुरु गम भक्ति करै लौलाई ॥ १ ॥ भक्ति करै निर्भय सहदानी । गुरु अरु साधु एक करि जानी ॥ जहां साधु तहैं सतगुरु वासा । जहैं सतगुरु तहैं मुक्ति निवासा ॥ २ ॥ जहां मुक्ति तहैं लोक उजागर । जहां लोक तहैं रह सुख सागर ॥ जहां सुख सागर तहां कवीर । भक्ति मध्य बाहर औ तीर ॥ ३ ॥ जहां मध्य तहैं पुरुष अमान । जहैं बाहर तहैं हंस सुजान ॥ जहां तीर तहैं निर्मल धीर । जहां मरन नहिं व्यापै पीर ॥ ४ ॥ जहां पीर तहैं संशय धीर । संशय मध्य असंशय नीर ॥ जहां नीर तहैं सुख संतोखा । जरा मरण नहिं व्यापै धोखा ॥५॥ जहां धोख तहैं आवै धीर । जहां धीर तहैं गहिर गंभीर ॥ जहां गंभीर तहां स्थिर होइ । जहां थीर तहैं लहरि न कोइ ॥ ६ ॥ लहरि नहीं तहैं आपै आप । आपा मेटि मिटै संताप ॥ आपा मेटे ममिता खोइ । भाव भक्ति करि मानुष होइ ॥ ७ ॥ मानुष होय गहै निरवाना । पावै सत्य सही अस्थाना ॥ मानुष पद छोड़े व्यवहारा । ताते फिरि आवै संसारा ॥ ८ ॥ संसार आइके भक्ति
(४४८)
कवीरपंथी-
कमाई । भक्ति कमाय भक्त कहाई ॥ भक्त कहाइके रहै उदासा । सत्य गुरु मिलै सत्य विश्वासा ॥ ९ ॥ सतगुरु मिलै तो संशय भागे । सो फिरि बहुरि अंक नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥ १० ॥ सतगुरु पाय दुसर घर नाही । आवागमन रहित घर जाहीं ॥ कहैं कवीर सत्य करि माने । साधु गुरु नहीं अन्तर जाने ॥ ११ ॥
सा०-साधु बड़े परमार्थी, चन ज्यों बरषे आय । तपन बुझावैं औरकी, अपनो पारस लाय ॥
रमनी-वैरागी (साधु) रहनी ॥
वैरागी उनमुन घर करई । हर्ष शोक कछु चित्त न धरई ॥ रुखा सूखा करै अहारा । निसि दिन आतम तत्त्व सम्हारा ॥ १ ॥ विकसित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥ रहिता रहै बहै नहीं कबहीं । सो वैरागी पावे हमहीं ॥ २ ॥ हमें पाय हमहीं अस होई । आवागमन मिटावे सोई ॥ आवा-गमन मिटावै काई । रहैं अधीन तत्त्व समाई ॥ ३ ॥ काया धरि काया कहैं बोधे । आवागमन रहित तत सोधे ॥ जीवत मरे मरे पुनि जीवैं । उनमुनि बसे महा रस पीवैं ॥ ४ ॥ महाशून्यमो रहै समाई । मरै न जिवे आवे न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हम मिलि रहै हमहि अस होई ॥ ५ ॥ भीतर रहनी कहा बनायी । बाहर रहनी देहुँ बतायी ॥ वैरागी आसन दृढ होई । रहै अजाँच जाँचे नहीं कोई ॥ ६ ॥ वैरागी अस चाल चलावे । तजै अखज तव हंस कहावे ॥ मद्य मांसके निकट न जाई । करै अहार सो काल कसाई ॥ ७ ॥ प्रेम भक्ति आने उर माहीं । द्रोह घात दिसि चित्तवै नाही ॥ जीव दया राखे हिय जानी । मन वच कर्म घात नहीं आनी ॥ ८ ॥ हंस दशा धरि पंथ चलावे । श्रवनि कण्ठी तिलक लगावे ॥ क्रोध
शब्दावली
(४४९)
कपट सब देह बहाई । क्षमा गंगमें पैठि नहाई ॥१॥ विन जाँचे जो कहु आवे । रूखा सुखा ना विलगावे ॥ गृही भक्ति जो सेवा लावे । ताको देखि न मोह बढावे ॥ १० ॥ वर्तमान वरते सो साधा । अधिक चहै तो होय व्याघा ॥ छाड़ि उपाधि रहै लवलीना । कहै कवीर सो हंस परवीना ॥ ११ ॥
सा०-संत सराहिये ताहिको, जाको सतगुरु टेक ।
टेक निवाहे देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥
रसनी ॥ गुरु शिष्य अविकारी ॥
साहब सेवक एकै होई । सदा बसंत खेले सब कोई ॥ गुरु शिष्य एक जब होई । चिन्ह न परे एककी दोई ॥ १ ॥ साहब सेवक वरण दुहेला । एकै वरण गुरु औ चेला ॥ जैसे फूल बास कहैं तोरी । पाछे तिल संग तेहि जोरी ॥ २ ॥ पाछे फूल सुवासहिं देई । तिल तजि तेल बास गहि लेई ॥ ऐसे गुरु शब्द जो देई । चेला गहे निज हेतु विलोई ॥ ३ ॥ विना प्रेम जिव होय अनेरा । पाछे परे कालके घेरा ॥ गुरु सुवास है फूल सनेही । तिल अनुमान शिष्यकी देही ॥ ४ ॥ प्रेम भक्ति जो गुरु बतावे । करि विश्वास शिष्य तेहि धावे ॥ गुरु शिष्य भेद नहिं ताही । जोइ गुरु सोइ शिष्य निवाही ॥ ५ ॥ गुरु पूरा शिष सूरा होई । तबहि काल रहै मुख गोई ॥ शेष विना गुरु छूटे नाहीं । फिरि फिरि परिहैं भोचक माहीं ॥ ६ ॥ सतगुरु सो सतभाव बतावे । शिष, सोई जो प्रेम लगावे ॥ तीनों लोक एक होय जाई । गुरु शिष अलग होय नहिं भाई ॥ ७ ॥
सा०-गुरु समाना शिष्यमें, शिष कर लीया नेह ।
विलगाये विलगे नहीं, एक प्रान दुइ देह ॥
कर्म बण्डकी रसनी १ ।
कर्म कथा अब कहूँ बखानी । जौन फाँस अटके नर प्रानी ॥
कवीरपंथी शब्दावली १५