भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४३७)

ताके फंद परे जो कोई । रंचक सुख दुख बहुते होई ॥ कहै कवीर सोई निज दासा । जाको पारबल्लकी आसा ॥ ३ ॥

साखी-जो तू चाहे मुड़झको, मति कछु राखे आस । मुड़झ सरीखा होय रहो, सब कुछ तेरे पास ॥

रमैनी-मन राजा ॥

मन राजा संग पवन वजीरा । चित चंचल निश्चल नहि थीरा ॥ पांच मवासो त्रिगुण खाई । पांच पचीस जिनके संग भाई ॥ तैंतीसो मिलि द्रन्द्र मचावैं । मन राजाको नाच नचावैं ॥ ज्ञान सूरमा बीडा लीन्हा । तैंतीसों पर डेरा दीन्हा ॥२॥ पांच मवासी मिलिया आई । मन राजा पर फिरी दुहाई ॥ जोग जुगतका लशकर साजा । गगन दमामा निरभय बाजा ॥ ३ ॥ झलकत चन्दा जोति अपारा । मिटिगा तिमिर भया उजियारा ॥ गुरु परताप सकल बस हूआ । नहीं कोइ जूझा नहि कोइ मूआ ॥४॥ आप आपमें सबही जाना । जिन जाना तिन निजके माना ॥ कहैं कवीर या पद को बूझे । आपा मिटे तबही घर सूझे ॥५॥

साखी-ऐसी बानी बोलिये, मनका आपा खोय । या आपाको डार दे, दया करै सब कोय ॥

रमैनी-कथता बकता ॥

कथता बकता श्रोता सोई । आप विचारे ज्ञानी होई ॥ चंचल चपल बुधिका बेला । अगिन पवन पानीका मेला ॥ १ ॥ नव दरवाजा दसूं दुवारा । बूझहु ज्ञानी ज्ञान विचारा ॥ माटीका गौन पवनका सूआ । पांच तत्त्वले परगट हूआ ॥ २ ॥ काया माटी बोले पवना । बूझे पण्डित सूवा कौना ॥ मुई सुरति बाद अहं- कारा । एक न सूवा बोलन हारा ॥ ३ ॥ जिस कारन तप तीरथ जाहीं । रतन पदारथ है घर माहीं ॥ पठ पठ पंडित वेद बखाना ।