कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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किसीके साथ किसी अवस्थामें भी छल कपटका वर्ताव नहीं करता । २ शीतलता-अर्थात् सदा शान्त अकोध रहता है । ३ समता-धारण करता है अर्थात् सब जीवोंके सुख दुःखोंको अपने आत्माके समानही समझकर उनसे समानता वरतता है । ४ सुखदाई-सबके लिये सुखदाई होता है अर्थात् कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे किसीको दुःख होवे ।
७ सहज परीक्षा ४.
निह प्रपंच निहतरंग रु, निर्द्भन्द निरलेप । चारौ लक्षण सहजके, मिटे सकल विशेष ॥ ७ ॥
भावार्थ-सहजयोग अर्थात् सहज वृत्तिको धारण करनेवालोंमें चार गुण स्वभावसेही वास करते हैं । १ निष्प्रपंचता-सहज वृत्तिवाला पुरुष प्रपंचमें कभी नहीं फँसता-जहाँ कहीं प्रपंचकी वृद्धि देखता है आप वहाँसे खसक जाता है । २ निहतरङ्ग-नाना प्रकारके मनके तरङ्गोंसे अपनेको बचा रखता है । ३ निर्द्भन्द-द्रन्दसे अलग रहता है । ४ निलैप-सदा सबमें रहते हुए भी निलैप-रहता है ।
“सब संग रसिये सब संग बसिये सबका लीजे नाम । हाँजी हाँजी सबकी कीजे. रहिये अपने ठाम ॥”
८ शून्य ।
लव धीरज अरु ध्यान जो, मिली समाधि है चार । ये लक्षण हैं शून्यके, किये संत प्रचार ॥ ८ ॥
भावार्थ-शून्य अथवा समाधिवानके ४ लक्षण हैं । १ लव-एक ओर वृत्ति लगी रहै. २ धीर्य-जिस काममें लगे दृढ होकर लगे. ३-ध्यान-जिधर वृत्ति जाय उधरही तन्मय हो जावे. ४-समाधि-ध्येय वस्तुमें ऐसा निमग्न हो जाना कि, जुदाई जान न पड़े ॥