कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 968 में से
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(४१९)
मुक्ता कौन ?
सो मुक्ता जो मनका धीरा । आप आपनी चीन्है पीरा ॥ सहज झून्धमें रहे समाई । सो मुक्ता विहिश्त को जाई ॥२॥
दुर्वेग कौन ?
सोई दुर्वेग जो दिलका सुरा । घट परचेमें देखे नूरा ॥ ज्ञान ध्यानकी बातें करई । सो दुर्वेग जगतमें तरई ॥३॥
शेष कौन ?
सोई शेष जो शेखी धरई । घट परिचय कर मन सो तरई ॥ मनसा मार करै पिसमाना । मन जीते सो शेख बखाना ॥४॥
फकीर कौन ?
सोई फकीर जो फांके काला । इन्द्री जिह्वा एकहि नाला ॥ इन्द्री जिह्वा दोष परहरई । काया खोज अलह चित धरई ॥५॥
पठान कौन ?
सो पठान जो परमादहिं तोरे । अलख पुरुष घट माहिं निहोरे ॥ निरगुन कालसे तिनका तूरा । सोई पठान जगतमें सुरा ॥६॥
सव्यद कौन ?
सो सव्यद जो सरा विचारे । वेद कितेबसे रहे निनारे । वेद कितेब दोनों परिहरई । निर्गुण नाम निरंतर धरई ॥७॥
काफिर कौन ?
सो काफिर कदी न लौलावे । दुनिया त्याग नहीं मन भावे । घटको छाडि अनत नहिं जाई । विचमें सुवे लखे न खुदाई ॥८॥
हिन्दू कौन ?
सोई हिन्दू जो हिरदय समाना । पाप छोडि करै पुण्य निधाना ॥ निरगुन नाम निरंतर ध्यावे । जरा मरणमें बहुरि न आवे ॥९॥
ब्राह्मण कौन ?
सोई ब्राह्मण जो ब्रह्म पहिचाना । जीव शीवमें रहे समाना ॥ तीन लोकमें ब्रह्म परचाना । ब्रह्म छाडि पूजे नहिं आना ॥१०॥