कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
॥१७॥ अन्तर लागी करमकी टाटी । दशो दिशा सुरत जो फाटी । धोखा चिन्तामें दिन बीता । कहैं कवीर यों रहिगा रीता ॥१८॥ जाग शिताबी अब का सोवे । टाला-टूलीमें दिन खोवे । छाड़ि अनेक एकको धावे । कहैं कवीर निर्भय होय जावे ॥१९॥ बाँका गढको बेगइ लीजे । पीछे नहीं पयाना कीजे । सन्मुख जूझे सोई सुरा । कहैं कवीर साहेबका पूरा ॥२०॥ आठपहर जो मान पुकारे । घटका बैरी चुनचुन मारे । अगम पंथका नाम बोहारे । कहैं कवीर नहि जमके सारे ॥२१॥ हिंदू तुरुक दोऊ सो न्यारा । मुखसो बचन कहे नहि खारा । राह ऊजडकी लीजे भाई । कहैं कवीर झांखा नहि खाई ॥२२॥ छन्द व्याधिसो न्यारा रहना । निशिदिन साहिबसाहिब कहना । कहैं कवीर समझकर देखो । आन बसी सो नाहि न लेखो ॥२३॥ सार शब्दका थाला झेलै । निर्भय होय जगतमें खेलै ॥ कहैं कवीर क्या संशय कीया । नाम पियाला भरभर पीया ॥२४॥ शून्य मँडलमें तारी लागी । सूती सुरति भडक दै जागी ॥ कहैं कवीर पियासो लागी । मनकी दुविधा तबहीं आगी ॥२५॥
सा०-डोरी लागी डर मिटा, सुरत रही गरनाय । सुरत सुहागिन हो रही, पर घर परत न जाय ॥
इति श्री शब्द पारखा सम्पूर्ण ।
सत्यनाम ।
॥ सर्वांगवत्तीसी रमैनी ॥
काबी कौन ?
सोइ काजी जो होय समाना । दिल दरिआवमें रहे समाना ॥ परम जोतिपर आसन करई । सो काजी भवसागर तरई ॥१॥