कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
धै कुतका करे दम कारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १२ ॥ भक्त होयकर मठी बँधावै । नर नारी सो नेह लगावै ॥ पाछे करै माया विस्ताग । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १३ ॥ किरतनिया जो किरतन करई । करि किरतन भवबिच परई ॥ किरतन करै औ हाथ पसारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १४ ॥ भोपा होय करि संख बजावै । दाढी मूँछा घोंट सुड़ावै ॥ उभा पेटको करत पुकारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १५ ॥ जोत जगावै पाव पुजावै । सती धामको राह बतावै ॥ जीव सतावै करै विभिचारा । रामरहा उनहू ते न्यारा ॥ १६ ॥ सुरा होय सुरापन करई । सेर अन्न कुल कारण मरई ॥ कहा भयो जो धरलिया धारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १७ ॥ दाता दान देह कर भूला । दान देइके मनमें फूला ॥ ऐसा है सत धर्म हमारा । राम रहा उनहू ते न्यारा ॥ १८ ॥ सती होयके सत जो करई । सुरदा संग जीवत मरई ॥ कामस्वाद कियो विभिचारा । रामरहा उनहू ते न्यारा ॥ १९ ॥ भरमत भरमत सब भरमाई । राम भक्ति कोउ विरले पाई ॥ प्रेमभक्ति सब ऊपर राजे । अखण्ड राम तहैं अटल विराजे ॥ २० ॥ ऐसी भक्ति करै जो कोई । सतगुरु शब्दमें रहै समोई ॥ आन शब्दसो रहै निनारा । सो भगता कहिये ततसारा ॥ २१ ॥ कहैं कवीर दिया बतलाई । होती गुप्त परगट दिखलाई ॥ सत्यनाम सुमरे जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ २२ ॥
इति राम परबकी रमनी ॥
निरख परमोधकी रमनी ।
निरगुन दाता हरता करता । सब जग विनसे आपहि रहता ॥ सदा सर्वदा अविचल सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ १ ॥ कहा बखानू हूँ गुण तेरा । उस्तुति करत थका मन मेरा ॥ जिह्वा