भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(४१०)

कवीरपंथी—

जैहँवांसे सब प्रगटे, सो हम समझत नाहिं । यह अज्ञान है मानुषा, सो गुरु ब्रह्म कहि ताहिं ॥३०॥ ब्रह्मा विचारे ब्रह्मको, पारख गुरु प्रसँाद । रहितँ रहे पद परखिके, जिवसो होय अँवाद ॥ ३१ ॥

इति मूल रमैनी—शब्दकुंजी समाप्ता ॥

वाणी जेती जगतमें, सबमें ताला दीन । विनु सतगुरु कृपा कोई, पावे नाहीं चीन ॥ १ ॥ सतगुरु कवीर कृपा करी, चाबी दीन्ह रसाल । वाणी कुलुफ याते खुले, पावे भेद विसाल ॥२॥ वाणी विविधि जगतमें, काल जाल प्रचंड । सत्य भेद किमि पावई, भूले जीव परखंड ॥३॥ याते सतगुरु कृपा करी, जीव उबारन हेतु । मूल रमैनी प्रगट करी, दीन्हा भवको सेतु ॥ ४ ॥ कठिन शब्द जेते रहे, टिप्पणी करि बनाय । बाकी अब कछु होय जो, दीजो संत जनाय ॥५॥ गुरुथल होतौँ जानिये, शिवहँर जन्म स्थान । युगलानन्द मम नाम है, जानो संत सुजान ॥ ६ ॥

इति मूलरमैनी प्रसिद्ध अक्षरखण्डकी रमैनी स्वामी श्रीयुगलानन्द

बिहारीद्वारा संशोधित समाप्ता ।

आदि वाणीका शब्द ।

“बलिहारी अपने साहबकी जिन यह ज्युति बनायी । उनकी शोभा केहि विधि कहिये मोसों कही न जायी ॥ बिना ज्योतिकी जहँ उजियारी सो दरशे वह दीपा । निरते हंस करै कौतूहल वोही पुरुष समीपा ॥ झलके पदुम नाना विधि वानी माथे छत्र विराजै । कोटिन भानु चन्द्र तारागण एक फुचरियन छाजे ॥ कर गहि बिहँसि जबै मुख बोले तब हँसा सुख पावै । वंश अंश जिन बूझ विचारी सो जीवन मुक्तावै ॥ चौदह लोक वेदका मण्डल तहँ लग काल दोहाई । लाक वेद जिन फंदा काटी ते वहि लोक

१६८ जहाँसे. १६९ दया, कृपा. १७० अलग. १७१ बाद रहित. १७२ जिला सारन डा० घ० कुबाह कोटके इलाकेमें और हथुआसे पांच कोस उत्तर पर है. १७३ बिहार प्रान्तके मुजफ्फरपुर जिलेमें राजस्थानहै.