कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथो—
दीन भुलाय ॥ कोई काहूका कहा न मान । जो जेहि भावे तहैं अरुज्ञान ॥ परे जीव तेहि यमकी धार । जौलौ पावे शब्द न सार ॥ जीव दुँसह दुख देखि दयाल । तब प्रेरी प्रभु परख रिसाल ॥
परखाये प्रभु एक को, जामें चार प्रकार ।
काल संधि झाँई लखी, लखी शैब्व मत सार ॥ १० ॥
प्रथमे एक शब्द आरूढ । तेहि तक कर्म करे बहु सूढ ॥ ब्रह्मभरम होय सब (जग) में पैठा । निरमल होय फिरे बहु ऐंठा ॥ भरम सनातन गावे पाँचैं । अटकिर है नर भवकी खौंच ॥ आगे पीछे दहिने बांये । भरम रहा है चहुँ दिशि छाये ॥ उठी भर्म नर फिरे उदास । घरको त्यागि कियो वनवास ॥ भरम बढी शिर केश बढावे । तके गगन कोइ बांह उठावे ॥ दे तारी कर नाशा गहै । भरमिक गुरु बतावे लहै ॥ भरम बढो अरु धूमन लागे । विनु गुरु पारख कहु को जागे ॥
कहैं कवीर पुकारके, गहहु शरण तजि मान ।
परखाये गुरु भरमको, वानि खानि सहिदान ॥ ११ ॥
भरम जीव परमात्म माया । भरम देह औ भरम निर्काया ॥ अनहद नाद औ ज्योति प्रकास । आदि अंतलौ भरमहिं भास ॥ इत उत करे भरम निरमौन । भरम मान औ भरम अमान ॥ कोहं जगत कहाँसे भया । ई सब भरम अती निरमया ॥ प्रलंय चारि भ्रम पुण्य औ पाप । मन्त्र जाप पूजा भ्रम थाप ॥
❁ वाट वाट सब भर्म है, माया रची बनाय ।
भेद बिना भरमें सकल, गुरु बिन कहाँ लखाय ॥ १२ ॥
❁ बाप पूत दोउ भरम है, माया रची बनाय ।
भेद बिना भरमें सकल, गुरु बिन कहाँ लखाय ॥
७३ कंस गया. ७४ कठिन. ७५ शब्द. ७६ पांचतत्व ७७ कीचड पंक कांदो. ७८ निराकार ७९ हित्त.
८० नित्य प्रलय १ नैमित्तिक प्रलय २ महाप्रलय ३ आत्म्यतिक प्रलय ४।