भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400

(३८६)

कवीरपंथी—

आरति सतगुरु लौ लाओ । भावभक्ति बहु प्रीति बढाओ ॥६॥ चरण धोइ चरणामृत लीजो । शरधा सहित सुपूजन कीजो ॥ विनु शरधा नहिं आरति कीजे । अनशरधा तहैं काल भनीजे ॥ ६ ॥ अनशरधा अगुवानी जहैंवाँ । काल बसे नहिं सतगुरु तहैंवाँ ॥ शरधा प्रेम बसे जेहि ठाकैं । सोई जानो सतगुरु गाकैं ॥ ७ ॥

कहैं कवीर धर्मनि सुनो, शरधाको व्यवहार ।

विनु शरधा नहिं पाइये, सत् लोक निज द्वार ॥ २ ॥

शरधा ते सतगुरु सन्माने । यथाशक्ति द्रव्य लेह आने ॥ नाना वासन वस्त्र विधाना । सोना रूपा बहुविधि नाना ॥ १ ॥ कपट छोड़ि शक्ति निज देखे । परमार्थ स्वार्थ बहुविधि पेखे ॥ गुरु पूजा संतन सनमाना । पहिलि विधि आरति कर जाना ॥ २ ॥ नारि पुरुष सबहीं इकठाईं । ले नरियर सब सन्मुख आईं ॥ सह मरजाद सु सीस चढावे । सतगुरु ध्यान मगन हूँ जावे ॥ ३ ॥ सतगुरु आज्ञा देह चढाईं । इक टक दृष्टि गुरु पहुँ लाईं ॥ मोरत नरियर बास उडावे । जमका पला तुरत छुट जावे ॥ ४ ॥ साँचा सतगुरु साँचा चेला । साँचहिं साँच भया इक मेला ॥ घटका परिचय सतगुरु देवे । देही देह परख कर लेवे ॥ ५ ॥ दूजा मेटि एक लौ लावे । देखत काल तुरत मरिजावे ॥ काल दयाल को जाने भेवा । जो सतगुरु सोई निज देवा ॥ ६ ॥ पूजा दूजा काल पसारा । बिना एक नहिं होय उबारा ॥ चौका आरति भेद बतावे । छाड़ि अनेक एक लौ लावे ॥ ७ ॥

कह कवीर धर्मनि सुनो, यह चौका बिस्तार ।

गुरु कृपासे छूटईं, ततछन काल पसार ॥ ३ ॥

पान प्रसाद गुरु ते पाईं । सह परिवार भक्ति चित लाईं ॥ आरति ज्योति घरे घर फेरे । कंटक काल सबहिं खदेरे ॥ १ ॥