भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पुनि सतगुरु सह संतन बैठारे । नाना भाँति करे जेवनारे ॥ महा- प्रसाद पुनि संतन लीजे । युग बन्ध मिलि सो सेवा कीजे ॥ २ ॥ बितु सेवा नहिं जीव उबारा । ताते तन मन संतन वारा ॥ तनसे सेव करे बहु भांती । मनसे त्यागे भेद विजाती ॥ ३ ॥ गुरु संत सब इक सम जाने । माने वचन कवीर परमाने ॥ कहै कवीर हम साधु सरूपा । हमहीं गुरु हंसन कर भूपा ॥ ४ ॥ मोमें गुरुमें अरु संतन भाई । रंक्क भेद न जाने कोई ॥ भेद करे सो भवमें डूबे । जमकर मार पड़े सो खावे ॥ ५ ॥ साधु सोई जो सीधा चाले । है निर्पच्छ सत्य प्रतिपाले ॥ संत सोई जो सत मत जाने । काल दिशा को नाहिं परमाने ॥ ६ ॥ गुरु सोई जो सत परखावे । असत छुड़ाई लोक पठावे ॥ सो संत गुरु भेद नहिं भाई । साधु स्वरूप हमहीं निरमाई ॥ ७ ॥

धर्मदास तुम पूछिया, चौका विधि विस्तार ।

सो मैं तुमसे भाषिया, अब का करहु विचार ॥ ४ ॥

सुनत बचन धर्मनि निज बोले । अस संशय मम हिय महँ डोले ॥ कलक जीव रंक बहु होई । इतना साज न साजे सोई ॥ १ ॥ ताकर निरणय कहिये स्वामी । किहिं विधि तरे जीव अनुगामी ॥ सकलो जीव तुम्हारे देवा । कैसे कहौं करै सब सेवा ॥ २ ॥ धर्मनि सुनौ रंक परभाऊ । छठै मास आरति लौ लाऊ ॥ छठै मास नहिं आरति भेवा । वरष माँहिं गुरु चौका सेवा ॥ ३ ॥ सम्भवत माहिं चूक जो जायी । तबै संत साकट ठहरायी ॥ सम्भवत माहिं आरती करई । ताकर जीव धोख नहिं परई ॥ ४ ॥ नाम कवीर जपे लौ लाई । तुमरो नाम कहै गोहराई ॥ तुमरी चाल चले धर्मदास । संतहिं सेवे भक्ति पिपासु ॥ ५ ॥ व्रत अखंडित गुरु पद गहई । गुरु पद प्रीति होई निस्तरई ॥ ऐसी धारन रंक

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