भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 399

शब्दावली

(३८५)

तुम लीन उबारी ॥ २ ॥ अब चौका भेद कहो सुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुख धामी ॥ जो तुम कहौ करौ मैं सोई । तामहँ फेर न परिहैं कोई ॥ ३ ॥

कबीर वचन ।

गेही भक्ति आरति आने । प्रति पाख आरती ठाने ॥ प्रति पाख आरति नहीं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥ ४ ॥ पाख दिवस नहीं होवे साजू । प्रति पूनोकर आरति काजू ॥ पूनो पान लेइ धर्मदासा । पावे सिष होय सुख बासा ॥ ५ ॥ चन्द्र कला बोडस पुर आवे । ताहि समय परवाना पावे ॥ यथाशक्ति सेवा सहिदाना । हंसा पहुँचे लोक ठिकाना ॥ ६ ॥

धर्मदास वचन ।

धर्मनि विनय करी कर जोरी । होइ प्रभु अब दयाल बहोरी ॥ आरति चौका किहि विधि होई । काकासाज लगे प्रभु सोई ॥ ७ ॥

कबीर वचन ।

आरति साज धर्मनि सुनो, तुमसे कहौ बखान ।

विधि विधान ते जो करे, पावे सुक्ति ठिकान ॥ १ ॥

धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भाग चले जमराजा ॥ सात हाथको वस्तर लाओ । स्वंत चँदेवा वस्त्र तनाओ ॥ १ ॥ घर आँगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ । तापर आँटाको चौक पुराओ । सवा सेर तन्दुल लै आओ ॥ २ ॥ स्वेत सिंधासन तहां विछायी । नाना सुगन्ध धरू तहँ लायी ॥ स्वेतै मिठाई स्वेतै पाना । पूंगी फल स्वेतहिं परमाना ॥ ३ ॥ लौंग इलायची कपूर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥ जिब पीछे नरियर लै आओ । यह सब साज सु आनि धराओ ॥ ४ ॥ संत साधु को बैठक दीजौ । यथा शक्ति सन्मान सु कीजौ ॥ करि

कबीरपंथी- शब्दावली १३